भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका
 

अक्टूबर, 2007

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मूल प्रवृत्ति आज भी नहीं बदली है आज शासन की ओर से यह दावा किया जाता है कि किसी एक समुदाय के हित के लिए दूसरे समुदाय का अहित नहीं किया जाएगा। लेकिन यह दावा करते समय सरकार एक बात और जोड़ देती है। वह यह कि व्यापक हितों को देखते हुए यदि किसी एक समुदाय के हितों को नुक्सान पहुंचाना पड़ा तो उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। >>> शेष पढ़ें

 

उजागर हुआ सरकार का झूठ (रामबहादुर राय )  तेरह कमेटियां अब तक बन चुकी हैं।  जिस परियोजना पर इस समय काम हो रहा है उस पर दो 2004 की सुनामी जैसी तबाही से भविष्य में बचाव के लिए क्या इस परियोजना में कोई उपाय किया गया है? >>> शेष पढ़ें

  +       तार-तार हो गई मर्यादा

 

जिम्मेदारी किसकी ? (मनोज कुमार यादव)  इस रिपोर्ट के पश्चात वित्तमंत्री टी.टी. कृष्णामचारी को त्यागपत्र देना पड़ा था। अत: इसी परम्परा का अनुसरण करते हुए 'अंबिका सोनी ' को भी अधिकारियों की त्रुटि का बहाना बनाने की जगह त्यागपत्र देकर अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व को निभाना चाहिए। उनके लिए यही उचित होगा। >>> शेष पढ़ें

मेरी लड़ाई गरीबों को जमीन दिलाने की है। (पीवी राजगोपाल ) गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली के उपाध्यक्ष और एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष पीवी राजगोपाल देश के आठ राज्यों में पिछले बीस सालों से जमीन के मसले पर अहिंसक संघर्ष करते आ रहे हैं। अब उन्होंने अपने संघर्ष को राज्यों की राजधानियों की बजाय राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली की ओर मोड़ दिया है  >>> शेष पढ़ें

भूमंडलीकरण की ज्वाला में विज्ञापन का बोलबाला (प्रदीप सिंह)  जरूरत के अच्छे सामान को खरीदना बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। आज हम उस सामान को भी खरीदने को बेबस हैं जिसकी हमें वास्तव में कोई जरूरत नहीं है। आज उस सामान का बाजार में बोलबाला रहता है, जिसका विज्ञापन मशहूर सिने तारिका या मॉडल कर रही हो। कंपनियां अपना माल बेचने के लिए उत्पाद आने के पहले से ही प्रचार करने लगती हैं।  >>> शेष पढ़ें

 
देशव्यापी सत्याग्रह की ओर बढ़ते कदम (प्रसून) पचीस हजार वंचित जमीन के सवाल को लेकर ग्वालियार से दिल्ली तक

पदयात्रा करते हुए तीस दीनों में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पहुंच कर राजघाट पर अनिश्चित काल के लिए धारने पर बैठ जाएंगे और तभी वापस अपने घर लौटेंगे जब केंद्र सरकार उनकी मांगों पर अमल करेगी  >>> शेष पढ़ें

विज्ञापन का मायाजाल (हिमांशु शेखर) ब्लेड से लेकर ट्रक तक के विज्ञापन में नारी काया की माया का सहारा लिया जा रहा है। उस वक्त तो विज्ञापनों के लिए प्रिंट ही एकमात्र माध्यम था। इलैक्ट्रानिक माध्यम के आने के बाद नारी को और विकृत रूप में दिखाने की होड़ लग गई।  >>> शेष पढ़ें
 +  ये pspo क्या है?
  +   व्हील-नीबू शक्ति या सिर्फ खुशबू?

बाजार बनते परिसर की चिंता (विजय कुमार मिश्र) उनकी
फैशनपरस्ती का आलम यह है कि परिसर शिक्षा और ज्ञान के केन्द्र से अधिक एक अजीबो-गरीब जीवन-शैली के प्रदर्शन-केन्द्र के रूप में विकसित होने लगे हैं। >>> शेष पढ़ें
 

देह प्रदर्शन का पर्याय बनते विज्ञापन (फिरदौस खान) आज न जाने कितने ही ऐसे विज्ञापन हैं जिन्हें परिवार के साथ बैठकर नहीं देखा जा सकता। अगर किसी कार्यक्रम के बीच 'ब्रेक' में कोई अश्लील विज्ञापन आ जाए तो नजरें शर्म से झुक जाती हैं। परिजनों के सामने शर्मिंदगी होती है। >>> शेष पढ़ें

दर्द दिल्ली के किसानों का (गुंजन कुमार) यहां के किसानों की जमीन से 'दिल्ली विकास प्राधिकरण' (डीडीए) अरबों रुपए कमा रहा है। जबकि जमीन के असली मालिक रिक्शा, रेहड़ी चलाकर या बस कन्डक्टरी कर अपना परिवार पालने के लिये मजबूर हैं। >>> शेष पढ़ें

 

रामायण सत कोटी अपारा (सचिन कुमार जैन)  उनमें अध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण, अद्भुत रामायण, तथा तुलसीकृत रामचरित मानस आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। रामकथा पर लिखे गये ग्रन्थों की इस अधिकता के कारण ही गोस्वामी तुलसीदास ने कहा था-'रामायण सत कोटि अपारा' >>> शेष पढ़ें

क्रिकेट किसके लिए है? (विजय सिंह बनकर ) जरा सोचिए कि राहुल द्रविड शून्य पर आउट होने पर भी मिस्टर भरोसेमंद रहते हैं, मास्टर ब्लास्टर के बल्ले से रन न निकले तब भी वे ब्लास्टर ही रहते हैं। सब मिलाकर गणित यह होता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कूड़ा-कचरा भारतीयों को बेचने वाले क्रिकेट खिलाड़ी मीडिया में किसी भी तरह छाये रहें। >>> शेष पढ़ें     

कहानी- इंटरब्यू (कीर्ति चौधरी) मैंने एम.ए के सर्टिफिकेट से पंखे का काम लेते हुए देखा-धुली साफ साड़ियों के पल्लुओं में शिकनें पड़ गई थीं। चेहरों का रूज पाउडर बह चला था। पसीने और गर्द से भरे उन सारे चेहरों के पीछे अब सिर्फ एक चेहरा झांक रहा था, बेकारी का। >>> शेष पढ़ें

 

गरीबी नहीं गरीबों की पहचान मिटायी जा रही है (प्रो योगेश चन्द्र शर्मा) पिछले दस सालों में सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पाई कि समाज के सभी गरीब परिवारों की पहचान मानवीय और न्यायपूर्ण तरीके से की जा सके। >>> शेष पढ़ें

इस अंक के अन्य लेख-

आवरण कथा

कैसे बोलें-बिन्दास ( आशीष कुमार 'अंशु') यह तो कंडोम कथा का एक पक्ष है। अब आइए आपका कथा के भारतीय-पक्ष से परिचय कराएं। वास्तव में बिन्दास बोल 'सेफ सेक्स' के पश्चिमी पैटर्न को वाया कंडोम भारत में लाने की साजिश जैसा ही है। हमें इस बात से संभल जाना चाहिए। >>> शेष पढ़ें

क्या यह संयोग है? ( विजय आनन्द)  भारत के नैतिक मूल्यों, गरिमा, आन-बान और शान को देखकर द्वेषवश इसका मूल नाम तिरस्कृत किया गया। >>> शेष पढ़ें

विविधा

त्तर चूहे खाकर बिल्ली हज को चली

ड़ॉ सीतेश आलोक

चलती चाकी देखके

आंसुओं से भरी रहीं मर्यादा पुरुषोत्तम की आंखे सूर्यकांत बाली भरतगाथा

कबीर पर अभिनव विमर्श

रंगमंच का इतिहास

हिंदू निशाने पर

  पुस्तक परिचय

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन, दिल्ली प्रांत द्वारा गोष्ठी का आयोजन

भा.प. ब्यूरों गतिविधि

और जन के आगे तंत्र हार गया

डा. अमित कुमार 'मुन्नू प्रतिनिधि, भा.. बिहार प्रदेश गतिविधि

गौ रक्षा के लिए आग आए सिवान के कार्यकर्ता

अनिल कु सिंह प्रतिनिधि, सिवान, बिहार गतिविधि

रचना और आंदोलन साथ-साथ

भा.प. ब्यूरों गतिविधि
अजूबों का मुल्क है हिन्दुस्तान अक्षय जैन दाल रोटी
कौन किसको प्रमोट कर रहा है?

मेरी बात सच निकली

ब्लाक का पन्ना

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन

स्थाई स्तंभ

संपादकीय

चलती चक्की देखकेे

भारतगाथा