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मूल प्रवृत्ति आज भी नहीं बदली है।
आज शासन की ओर से यह दावा
किया जाता है कि किसी एक समुदाय के हित के लिए दूसरे
समुदाय का अहित नहीं किया जाएगा। लेकिन यह दावा करते
समय सरकार एक बात और जोड़ देती है। वह यह कि व्यापक
हितों को देखते हुए यदि किसी एक समुदाय के हितों को
नुक्सान पहुंचाना पड़ा तो उसमें कुछ भी अनुचित नहीं
है।
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उजागर हुआ सरकार का झूठ (रामबहादुर
राय
) तेरह
कमेटियां अब तक बन चुकी हैं।
जिस परियोजना पर इस समय काम हो रहा
है उस पर दो
2004 की सुनामी जैसी तबाही से
भविष्य में बचाव के लिए क्या इस परियोजना में कोई
उपाय किया गया है?
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जिम्मेदारी किसकी
?
(मनोज कुमार यादव)
इस रिपोर्ट के पश्चात वित्तमंत्री
टी.टी. कृष्णामचारी को त्यागपत्र देना पड़ा
था। अत: इसी
परम्परा का अनुसरण करते हुए
'अंबिका
सोनी
' को भी अधिकारियों की
त्रुटि का बहाना बनाने की जगह त्यागपत्र देकर अपने
संवैधानिक उत्तरदायित्व
को निभाना चाहिए। उनके लिए यही उचित होगा।
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मेरी लड़ाई
गरीबों को जमीन दिलाने की है। (पीवी राजगोपाल
)
गांधी
शांति प्रतिष्ठान,
नई दिल्ली के उपाध्यक्ष
और एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष
पीवी राजगोपाल देश के आठ राज्यों में पिछले बीस सालों से
जमीन के मसले पर अहिंसक संघर्ष करते आ रहे हैं। अब
उन्होंने अपने संघर्ष को राज्यों की राजधानियों की बजाय
राष्ट्रीय राजधानी
नई दिल्ली की ओर मोड़ दिया है
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भूमंडलीकरण की ज्वाला में विज्ञापन का बोलबाला
(प्रदीप
सिंह)
जरूरत
के अच्छे सामान को खरीदना बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। आज हम
उस सामान को भी खरीदने को बेबस हैं जिसकी हमें वास्तव में
कोई जरूरत नहीं है। आज उस सामान का बाजार में बोलबाला रहता
है,
जिसका विज्ञापन मशहूर सिने तारिका या मॉडल कर रही हो।
कंपनियां अपना माल बेचने के लिए उत्पाद आने के पहले से ही
प्रचार करने लगती हैं।
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देशव्यापी सत्याग्रह की ओर बढ़ते कदम
(प्रसून)
पचीस हजार वंचित जमीन के सवाल को लेकर ग्वालियार से
दिल्ली तक |
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पदयात्रा करते हुए तीस दीनों में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली
पहुंच कर राजघाट पर अनिश्चित काल के लिए धारने पर बैठ
जाएंगे और तभी वापस अपने घर लौटेंगे जब केंद्र सरकार उनकी
मांगों पर अमल करेगी
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विज्ञापन
का मायाजाल
(हिमांशु शेखर)
ब्लेड से लेकर ट्रक तक के विज्ञापन में नारी काया की माया
का सहारा लिया जा रहा है। उस वक्त तो विज्ञापनों के लिए
प्रिंट ही एकमात्र माध्यम
था। इलैक्ट्रानिक माध्यम
के आने के बाद नारी को और विकृत रूप में दिखाने की होड़ लग
गई।
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बाजार बनते
परिसर की चिंता
(विजय
कुमार
मिश्र)
उनकी
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फैशनपरस्ती का आलम यह है कि परिसर शिक्षा और ज्ञान के
केन्द्र से अधिक एक अजीबो-गरीब जीवन-शैली के
प्रदर्शन-केन्द्र के रूप में विकसित होने लगे हैं।
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देह
प्रदर्शन का पर्याय बनते विज्ञापन
(फिरदौस खान)
आज न जाने कितने ही ऐसे विज्ञापन हैं जिन्हें
परिवार के साथ बैठकर नहीं देखा जा सकता। अगर
किसी कार्यक्रम के बीच
'ब्रेक'
में कोई अश्लील विज्ञापन
आ जाए तो नजरें शर्म से झुक जाती हैं। परिजनों
के सामने शर्मिंदगी होती है।
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दर्द
दिल्ली के किसानों का
(गुंजन कुमार)
यहां
के
किसानों की जमीन से
'दिल्ली विकास प्राधिकरण'
(डीडीए)
अरबों रुपए कमा रहा है। जबकि जमीन
के
असली मालिक रिक्शा,
रेहड़ी चलाकर या बस कन्डक्टरी कर
अपना परिवार पालने
के
लिये मजबूर हैं।
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रामायण सत कोटी
अपारा
(सचिन कुमार जैन)
उनमें
अध्यात्म
रामायण,
आनन्द रामायण,
अद्भुत रामायण,
तथा तुलसीकृत रामचरित मानस
आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। रामकथा पर लिखे गये
ग्रन्थों की इस अधिकता
के कारण ही गोस्वामी तुलसीदास ने कहा था-'रामायण
सत कोटि अपारा'।
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