भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका
 

नवम्बर,  2007

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मूल प्रवृत्ति आज भी नहीं बदली है शासन की ओर से यह दावा किया जाता है कि किसी एक समुदाय के हित के लिए दूसरे समुदाय का अहित नहीं किया जाएगा। लेकिन यह दावा करते समय सरकार एक बात और जोड़ देती है। वह यह कि व्यापक हितों को देखते हुए यदि किसी एक समुदाय के हितों को नुक्सान पहुंचाना पड़ा तो उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है।>>विस्तार

चावल निर्यात पर सरकार की किरकिरी (विद्यानंद आचार्य )"जब देश को गेहूं की जरूरत नहीं होती तो दोगुने से अधिक मूल्य पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से जानवरों के खाने लायक गेहूं का आयात कर लिया जाता है। और जब चावल निर्यात पर प्रतिबंध की जरूरत नहीं होती तो चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।">>विस्तार

 
 

मकबूल पर फिदा जामिया मिलिया (अरुण देव) जिस व्यक्ति पर देशभर में 9 मुकद्मे चल रहे हों, जिस व्यक्ति की गिरफ्तारी का आदेश जारी हुआ हो, जिस व्यक्ति की तलाश देश की अनेक अदालतों को हो, उसके सम्मान की घोषणा की जाती है और उस सम्मान समारोह में भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जैसे दिग्गज पहुंचते हैं। >>विस्तार

 
 

शोषण का मारा बचपन ( हिमांशु शेखर ) भारत में अठारह साल से कम उम्र वालों की संख्या 39 करोड़ 80 लाख है। इसमें से 21 करोड़ की उम्र चौदह साल से भी कम है। जाहिर है, यह काफी बड़ी संख्या है। देश के इस बड़े वर्ग की हालत में सुधार किए बगैर देश का समग्र विकास संभव नहीं है। >>विस्तार

 

जनादेश यात्र: दूर तक जाना है (चैतन्य प्रकाश)  "निराशा की गहरी खाई में गिरकर आत्महत्या की ओर अग्रसर होने की बजाय विद्रोह का रास्ता लाख दर्जा बेहतर है। नैराश्य को जीतने का इस परिस्थिति में और बेहतर रास्ता मिलना मुश्किल ही था। इन हजारों लोगों ने न केवल सत्ता और शासन के मनमाने रवैये को नकारा है, बल्कि स्वयं के भीतर से उठते नैराश्य की दासता सहने से भी इनकार किया है।">>विस्तार

 

सिर्फ उड़ीसा में 20 लाख हुए विस्थापित (रितेश पाठक) "जिस क्षेत्र में पोस्को परियोजना को मंजूरी दी गयी है वहां सिंचाई और पीने के पानी का अभाव है। वहां सिर्फ तीस प्रतिशत कृषि भूमि ही सिंचित है। सरकार और पोस्को प्रबंधन के बीच हुए हुए मसौदे के अनुसार परियोजना के लिए आवश्यक पानी स्थानीय स्रोतों से उपलब्ध कराया जाएगा। >>विस्तार
 +  सेज : भूमि अधिग्रहण का नवीनतम उपकरण
  +   कोयला खदानों से स्याह हुई जिंदगी

 

विकास या विकास का आतंक ( अमित भादुरी ) औद्योगीकरण के नाम पर जीविका का विनाश, गरीबों का विस्थापन, सिंचाई और बिजली उत्पाद के लिए बड़े-बड़े बांध, किसानों द्वारा आत्महत्याएं किए जाने के बावजूद भी खेती का निगमीकरण और बस्तियों को समाप्त कर शहरों के सुंदरीकरण तथा आधुनिकीकरण में प्रतिकूल विकास की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। >>विस्तार

परिचर्चा विकास और विस्थापन का सवाल जनादेश यात्रा ने हाल ही में दिल्ली में दस्तक दी। विस्थापितों के हक की लड़ाई को इस यात्रा ने दूर-दराज के इलाकों से लाकर दिल्ली पहुंचा दिया। जिन लोगों के हाथ में ताकत है, त्ता है, उन्होंने इस यात्रा को कितना महत्व दिया, अभी इसका स्पष्ट आकलन मुश्किल है। लेकिन, समाज के प्रबुद्ध लोग इस मुद्दे को लेकर आंदोलित दिखे। इनमें से कुछ लोगों से हमारे प्रतिनिधि आशीष कुमार "अंशु" ने बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश।>>विस्तार

 

कहानी पीली धातु (उर्मिला शिरीष) ''हमारा परिवार केसला ब्लाक का रहने वाला है। पापा बताया करते थे कि बांध बनने पर हमारे सैकड़ों लोग वहां से हटा दिए गए थे। उनकी जमीनें छिन गई थीं। रोजी-रोटी का सहारा न रहा तो उन्हें जंगल के भीतर चले जाना पड़ा। >>विस्तार

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