|
विविधा |
|
लक्ष्मण रेखा के बहाने... |
|
डा. सीतेश आलोक |
आज की नारी एक ओर तो पुकार-पुकार कर
सरकार से सुरक्षा मांगती है और दूसरी ओर सुरक्षा की
पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था को ठुकराने में ही
अपना गौरव समझने लगी है। कुछ ऐसे नारे आए दिन सुनने
को मिलते रहते हैं कि नारी अबला नहीं सबला है,
सब कुछ करने में सक्षम है,
नारी किसी
भी अर्थ में पुरुष से कम नहीं है... और कभी यह भी कि
नारी हर कार्य पुरुष से अधिक अच्छे ढंग से कर सकती
है।
घर से निकलते हुए मैंने पुकार कर
पत्नी से कहा-
'दरवाजा
बंद कर लेना'।
...और
मेरा अपना वाक्य अचानक मेरे कानों में गूंजता रह
गया। जो कुछ मैंने कहा उसमें नया कुछ भी नहीं था।
सम्भवत:
यह वाक्य मैं,
रोज
नहीं तो अक्सर ही घर से निकलते समय कहता था। एक मैं
ही क्या मुझ जैसे न जाने कितने अपने घर से निकलते
समय यह वाक्य कहते होंगे! पुरुष ही क्या,
महिलाएं भी बाहर जाते समय किसी न किसी से द्वार बंद
करने के लिए कहती होंगी या उनसे अपेक्षा रखती होंगी
कि उनके जाने के बाद द्वार ठीक से बंद कर लिया जाएगा,
सांकल ठीक से लगा ली जाएगी।
फिर अचानक मुझे अपनी बात में विशेष
क्या लगा,
यह क्षण
भर मुझे सोचना पड़ा। सूत्र पकड़ने में देर नहीं लगी।
याद आया कि कुछ ही देर पहले समाचार पत्र में कुछ इस
आशय का लेख पढ़ा था- लक्ष्मण रेखाएं केवल नारी के लिए
ही क्यों होती हैं। लेखिका ने बड़ी हताशा एवं बड़े
आक्रोश के साथ नारी जाति पर लगे प्रतिबंधों की चर्चा
की थी... यह दर्शाते हुए कि नारी को सदा ही सीमाओं
में इस प्रकार बांध कर रखा गया कि वह आगे नहीं बढ़
पाई।
लक्ष्मण रेखा...! क्या होती है
लक्ष्मण रेखा?
क्या है
वह लक्ष्मण रेखा जिसके पीछे पड़ी आज की नारी अपनी
दुर्दशा का रोना रोए चले जा रही है।
याद आया कि कहा जाता है लक्ष्मण ने
सीता को वन में अकेला छोड़ कर जाते समय,
अपनी कुटिया के बाहर एक रेखा
खींच कर उनसे प्रार्थना की थी कि वे उस रेखा के पीछे
ही रहें... तब तक,
जब तक कि
राम-लक्ष्मण लौट न आएं।
लेकिन मैंने क्यों कहा,
अपनी पत्नी से द्वार बंद करने के
लिए? आदत! कुछ आदत...
परन्तु कुछ आवश्यकता भी,
कुछ अनिवार्यता
भी।
और फिर पुलिस विभाग भी तो आए दिन
कहता रहता है हम सबसे... परामर्श देता रहता है हमें,
समाचार पत्रें में बड़े-बड़े
विज्ञापन देकर कि सब लोग घर का द्वार बंद रखें। जब
तक किसी परिचित अथवा सम्बन्धी को न देखें,
तब तक द्वार न खोलें,
दरवाजों में जंजीर लगवाएं और
अपरिचित लोगों से जंजीर लगा द्वार,
अधखुला रखकर ही बात करें। पुलिस
विभाग के ऐसे बड़े-बड़े विज्ञापन जन साधारण को,
विशेषकर महिलाओं को,
सावधान
करने के लिए अक्सर ही प्रकाशित होते रहते हैं।
यह है वर्तमान स्थिति... महानगरों की
स्थिति,
जहां सरकार भी है और पुलिस भी।
अड़ोसी-पड़ोसी भी हैं और स्वजन-परिजन भी। तो फिर
बेचारे लक्ष्मण ने ऐसा क्या गुनाह कर दिया था कि उसे
आज हजारों साल बाद भी कोसा जाए। वह घना जंगल था जहां
वे रह रहे थे... और राम,
सीता के आग्रह के कारण ही,
एक मृग को पकड़ने के लिए पहले ही
जा चुके थे। वे जाते-जाते सीता की सुरक्षा का भार
लक्ष्मण पर छोड़ गए थे,
क्योंकि वे जानते थे कि शूर्पणखा प्रसंग के बाद,
खर,
दूषण आदि सहड्डों राक्षसों को परास्त करके वे अनेक
वैरी बना चुके हैं। उनकी अनुपस्थिति में सीता की
रक्षा और भी आवश्यक थी। राम की पुकार का भ्रम
सम्भवत: लक्ष्मण को भी हुआ हो,
परन्तु सीता व्याकुल हो उठीं।
लक्ष्मण ने उन्हें समझाना चाहा तो वे क्रूरता की
सीमा लांघते हुए उन्हें कटु वाक्यों से आहत करने
लगीं। तब दुखी मन लक्ष्मण ने कानों पर हाथ रखते हुए,
'स्वस्ति ते अस्तु'
कहकर उनसे
विदा ली थी।
वाल्मीकीय रामायण में कहीं भी
लक्ष्मण द्वारा किसी रेखा खींचने का उल्लेख नहीं है।
तुलसी कृत,
अधिक प्रचलित राम कथा,
रामचरित
मानस में भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। परन्तु
किंवदन्ती है कि लक्ष्मण ने अपनी कुटिया के द्वार पर
एक रेखा खींची थी जिसके पीछे उनकी अनुपस्थिति में
सीता सुरक्षित रह सकती थीं। तो यदि इस किंवदन्ती को
ही आधार मान लें तो भी लक्ष्मण के इस प्रबन्ध में
कोई ऐसा औचित्य नहीं लगता कि उसकी दुहाई देकर नारी
समाज आज भी आंसू... लांछन लगाए।
सुरक्षा भला कौन नहीं चाहता! क्या
पुरुष और क्या नारी... सुरक्षा सभी की आवश्यकता है।
आज की नारी एक ओर तो पुकार-पुकार कर सरकार से
सुरक्षा मांगती है और दूसरी ओर सुरक्षा की पारिवारिक
एवं सामाजिक व्यवस्था को ठुकराने में ही अपना गौरव
समझने लगी है। कुछ ऐसे नारे आए दिन सुनने को मिलते
रहते हैं कि नारी अबला नहीं सबला है,
सब कुछ करने में सक्षम है,
नारी किसी
भी अर्थ में पुरुष से कम नहीं है... और कभी यह भी कि
नारी हर कार्य पुरुष से अधिक अच्छे ढंग से कर सकती
है।
सोचने वाली बात यह है कि यदि नारी सब
कुछ करने में सक्षम है और अपनी सुरक्षा भी कर ही
सकती है तो वह सरकार से अतिरिक्त सुरक्षा के लिए
हाय-तौबा क्यों मचा रही है। नारी-सुरक्षा के लिए नए
एवं अधिक कठोर नियम बनाने की मांग क्यों कर रही है?
नारी सुरक्षा के लिए जितने नियम,
दंड आज निर्धारित किए गए हैं,
उन सब के रहते भी समाज में नारी
के प्रति अभद्रता, आक्रमण
तथा बलात्कार जैसी घटनाएं आए-दिन होती ही रहती हैं।
यह कहना नितान्त सत्य नहीं होगा कि हमारे देश में इस
सम्बन्ध में जो कानून हैं वे सक्षम नहीं हैं और
निर्धारित दंड इतने कठोर नहीं हैं कि वह अपराधिक
प्रवृत्ति को रोक सकें,
समय-समय पर नारी के लिए समाज ने कुछ विशेष नियम
निर्धारित किए। जहां एक और नारी को घर की व्यवस्था
चलाने का उत्तरदायित्व सौंपा,
वहीं पुरुष को
बाहर की समस्याओं से जूझने के लिए तैयार किया। घर
में यदि नारी को कभी चक्की चलानी पड़ी और कभी धुआं
उगलती लकड़ियों से आंखें फोड़नी पड़ीं... वहीं पुरुष को
बाहर लू-धूप में कहीं हल चलाना पड़ा तो कहीं रणभूमि
में
शत्रुओं के वार झेलने पड़े। कभी मालिक की बेगार करके
गालियां सुननी पड़ीं तो कभी पत्नी एवं बच्चों की
आवश्यकताएं पूरी करने के लिए देश-परदेश भटक कर पहाड़
तोड़ने पड़े।
वास्तविकता यह है कि जीवन निर्मम है।
वास्तविकता यह भी है कि मानव मन स्वप्नदर्शी है और
यथार्थ से दूर भाग कर सुख चाहता है। वास्तविकता यह
भी है कि हर व्यक्ति को अपना दुख ही अधिक लगता है...
दुखी से अधिक दुखी व्यक्ति भी उसे अपनी अपेक्षा सुखी
लगता है। यह सत्य एक अंग्रेजी कहावत में यह कहकर
दर्शाया गया है,
'उस पार की घास हमेशा कुछ ज्यादा
ही हरी एवं चमकदार दिखाई देती है।'
कुछ यही कारण है कि नारी एवं पुरुष
कभी एक दूसरे के दुखों,
उनके उत्तरदायित्वों एवं उनकी
सीमाओं को नहीं समझ पाए। भारत में देशव्यापी
निर्धनता ने उनके दुर्भाग्य को और भी द्विगुणित
किया। पत्नी सदैव की तरह ही,
कम आयु में विवाह करके,
सपने
संजोती हुई आई और पुरुष ने इस आशा में विवाह किया कि
पत्नी उसके कंधों पर पड़े बोझ को अपने प्यार एवं
सहयोग से कुछ कम कर देगी। जीवन के यथार्थ से न तो
उनके गुरुजनों ने उन्हें पूरी तरह अवगत कराया और न
मुंह फैलाते उपभोक्तावाद ने उन्हें कभी संभलने दिया।
दूसरी ओर राजनैतिक दलों ने,
अन्य वर्गों की तरह ही,
नारियों को भी वोट बैंक की
राजनीति के अन्तर्गत बरगलाकर भुनाने का प्रयत्न किया
है। नारी को यह बताकर कि उस पर बड़े अत्याचार होते
रहे हैं और वह सब कुछ करने में सक्षम ही नहीं,
सब कुछ पुरुषों की अपेक्षा अधिक
सफलता के साथ करने में भी सक्षम है,
सभी दल नारी समाज
का वोट बैंक की तरह उपयोग करते हुए उसे तरह-तरह के
अधिकार देने की बातें करते रहे हैं।
साथ ही,
अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं
की जागरूकता ने जाने-अनजाने ही उन्हें पुरुष विरोध
के मार्ग पर ला खड़ा किया है। यह सच है कि विश्व-स्तर
पर, जहां ईसाई एवं
मुस्लिम मजहबों का लगभग 80
प्रतिशत बहुमत है,
नारी को पुरुष की अपेक्षा कहीं
नीचा स्थान प्राप्त है। परन्तु विदेशी शिक्षा के
प्रभाव में भारत की पढ़ी-लिखी नारियां यह भूल बैठी
हैं कि भारतीय समाज में,
जिसके मूल में हिन्दू संस्कृति की शिक्षा-दीक्षा है,
नारी को पुरुष के समकक्ष ही नहीं
किसी स्तर पर पुरुष से भी ऊंचा स्थान प्राप्त है।
संसार की सभ्यताओं में केवल एक हिन्दू धर्म है
जिसमें नारी को देव-पद प्राप्त है- चाहे वह शिक्षा
की देवी हो, धन की देवी
हो, शक्ति की देवी हो,
सन्तोष की देवी हो,
ललितकलाओं की देवी हो या सुख
शान्ति की देवी हो। मां के रूप में भी जो स्थान
भारतीय नारी का है उसकी तुलना विश्व में कहीं नहीं
हो सकती। पाश्चात्य संस्कृति में ले-देकर नारी को
यदि कहीं देवत्व मिला भी है,
तो वीनस के रूप में,
जो
सौन्दर्य अथवा भोग की देवी है।
फिर भी,
आश्चर्य एवं दुख का विषय यह है
कि भारतीय नारी को निरन्तर हीन-भावना से भरकर पुरुष
विरोध के लिए उकसाया एवं भड़काया जा रहा है।
पाश्चात्य सभ्यता में रंगे चश्में से देखने की
अभ्यस्त भारतीय आधुनिक नारी क्या कभी वास्तविकता
देखना चाहेगी? उससे भी
अधिक अहम प्रश्न यह है कि क्या कभी अंतरराष्ट्रीय
नारी समाज और स्वार्थी राजनीतिक दल उसे वास्तविकता
समझने की छूट देंगे? |