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 मार्च,  2008

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आजमगढ़ की कहानी

सूचना मांगी थी, जेल नहीं...

विमल कुमार सिंह

देश 1947 में जब अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त हुआ तो सभी के मन में भविष्य को लेकर एक सुंदर सपना था। सपना था एक ऐसा लोकतांत्रिक देश बनाने का जहां समृध्दि हो, संस्कार हो, कानून का शासन हो और अमीर-गरीब सभी को बिना किसी भेदभाव के न्याय मिले। इस सपने को सच बनाने के लिए संविधान बनाया गया, नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए। इसके अलावा समय-समय पर और भी कई कानून बनाए गए। आज जब आजादी की राह चलते हमें 60 साल से अधिक हो गए हैं तो प्राय: मन में यह सवाल उठता है कि क्या आजादी के समय हमारे बुजुर्गों ने जो सपने देखे थे, उन्हें सच बनाया जा सका है? सवाल बहुत बुनियादी है। इसका एकदम से हां या ना में जवाब देना मुश्किल है। हम कह सकते हैं कि जनहित में बनायी गयी संवैधानिक व्यवस्थाओं और कानूनी प्रावधानों से स्थितियां बदली हैं, कुछ सकारात्मक परिवर्तन भी हुए हैं, लेकिन इस सबके बावजूद हम अपनी मंजिल से काफी दूर हैं, हमारे सपने अभी भी सच नहीं हुए हैं। हमारे देश में कानून तो बहुत अच्छे-अच्छे हैं। लेकिन, उनका लाभ आम आदमी को प्राय: नहीं मिल पाता। आम आदमी कभी भूले भटके जब इन कानूनों का इस्तेमाल करता है तो सरकारी तंत्र उसे सबक सिखाने में लग जाता है।

अभी हाल ही में देश की संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 पारित किया। इस कानून के द्वारा देश के नागरिकों को अधिकार दिया गया कि वे सरकार के काम-काज और उसकी निर्णय प्रक्रिया की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आशा की गयी कि इस कानून से सरकार के काम में पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। अरुणा राय और अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों ने इस कानून को जमीनी हालात में आजमा के देखा और इससे कई चमत्कारिक परिणाम भी हासिल किए। उनकी देखा-देखी देश में कई स्थानों पर लोगों ने रोजमर्रा के सरकारी काम-काज से लेकर व्यापक महत्व की सरकारी नीतियों तक के बारे में सूचना मांगी। सूचना बाहर आने और सच उजागर होने के डर से सरकार में बैठे अफसरों और नेताओं  की मनमानी पर कुछ अंकुश लगा। आज इस कानून को लागू हुए तीन वर्ष होने को हैं। जनता में जहां इस कानून को लेकर उत्साह है, वहीं सरकार में बैठे लोगों के लिए यह सिरदर्द साबित हो रहा है। नौकरशाही नित नए ऐसे तरीके विकसित करने में लगी है जिससे लोगों को सूचना मांगने से हतोत्साहित किया जा सके। सूचना मांगते समय यदि आवेदन को पर्याप्त सावधानी से नहीं लिखा गया तो अफसर प्राय: लोगों को ऐसी सूचना पकड़ा देते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं होता। सूचना मांगने वालों को परेशान करने के लिए अफसरों ने एक और नया तरीका ढूंढ निकाला है। वे मांगी गई सूचना के जवाब में ढेर सारी अनावश्यक जानकारियां और उससे जुड़े कागजात दे देते हैं, ताकि सूचना मांगने वाले को फोटोकापी शुल्क के रूप में भारी भरकम रकम खर्च करनी पड़े। बात यहीं खत्म नहीं होती है। अब तो सरकार के नुमाइंदे सूचना मांगने वालों को किसी न किसी बहाने आपराधिक मुकद्दमों में फंसाने से भी नहीं कतराते। देश में आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहां सूचना मांगने वालों को स्थानीय प्रशासन द्वारा येन-केन-प्रकारेण परेशान किया जा रहा है। ऐसा करके सरकारी अधिकारी आस-पास यह संदेश देना चाहते हैं कि सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करना खतरे से खाली नहीं है।

सूचना मांगने वाले नागरिकों को परेशान करने की एक सनसनीखेज घटना अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में घटी है। सूचना के अधिकार के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों को इस बारे में जानना जरूरी है। आजमगढ़ उत्तरप्रदेश के पिछड़े जिलों में से एक है। इस जिले में कौन कितना प्रभावशाली है, इसका अंदाजा आप उसे मिले सरकारी ठेके से लगा सकते हैं। यहां ऐसे नेता हैं जो पार्टटाइम में संसद में जाते हैं लेकिन मुख्यत: उनकी सारी ऊर्जा ठेकेदारी हासिल करने में और फिर कागजों में उसे बड़ी कुशलता से पूरा करने में लगती है। जमीनी स्तर पर काम करने में उनकी बहुत कम रुचि रहती है। जब कभी इलाके के लोगों को सड़कों पर तारकोल गिरा हुआ नजर आता है तो लोग समझ जाते हैं कि सड़क की मरम्मत हुई है। सड़क के काले रंग से ही लोग संतोष कर लेते हैं। समतल और गङ्ढा मुक्त सड़क तो उनके लिए एक सपना ही है।

सूचना का अधिकार मिलने के बाद भी आजमगढ़ के शहरी इलाकों में बैठे लोग बड़े-बड़े ठेकेदारों पर तो अंकुश नहीं लगा पाए, लेकिन वहां के कुछ गांव वालों ने इस कानून का इस्तेमाल करके अपने गांव में आने वाले पैसे की खोज-खबर लेने की सोची। गांव के प्रधान की ताकत की परवाह न करते हुए उन्होंने 'ग्राम सभा देहदुआर -कैथौली विकास संघर्ष समिति' के नाम से एक संस्था बनायी और पहुंच गए अपने गांव में आए पैसे का हिसाब मांगने। कानून की औपचारिकताओं को पूरा करते हुए उन्होंने  28 मई, 2007 को स्थानीय विकास खंड अधिकारी को एक आवेदन दिया। इस आवेदन के जवाब में उन्हें 30 जुलाई, 2007 को लिखा गया जिला विकास अधिकारी का एक पत्र मिला जिसमें उन्हें बताया गया कि उनका आवेदन पंचायत विभाग से संबंधित है इसलिए जिला पंचायत राज अधिकारी को मांगी गई सूचना देने का निर्देश दिया गया है। जिला पंचायत राज अधिकारी को ग्रामीणों की यह सक्रियता अपनी आमदनी के लिए बहुत बड़ा खतरा लगी क्योंकि गांवों में प्रधान द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए उसे भारी चढ़ावा मिलता है। जिला पंचायत राज अधिकारी और उसके नीचे काम कर रहे पूरे प्रशासनिक ढांचे को साफ दिखायी दे रहा था कि यदि सूचना मांगने वालों को सबक नहीं सिखाया गया तो आने वाले दिनों में जिले के सभी गांव वाले यही करेंगे और फिर उनकी आमदनी का स्रोत हमेशा के लिए सूख जाएगा। फिर क्या था, एक साजिश रची, जिसके तहत प्रधान की ओर से जिलाधिकारी के कार्यालय में 27 सितंबर, 2007 को एक शिकायती पत्र भेजा गया। पत्र में आरोप लगाया गया कि गांव के कुछ लोग फर्जी संस्था बनाकर विकास कार्यों में रोड़ा अटका रहे हैं। एक रूटीन कार्यवाही के तहत डी.एम. ने यह पत्र जिला पंचायत राज अधिकारी के पास जांच करने के लिए भेज दिया। जिला पंचायत राज अधिकारी को अब एक बहाना मिल गया। उसने अपने अधीनस्थ अधिकारियों से मामले की एक ऐसी जांच कराने की औपचारिकता शुरू कर दी जिसका नतीजा पहले से ही तय था। 29 अक्टूबर, 2007 को जांच अधिकारी ने एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें कहा गया,
'' प्रश्नगत प्रकरण के संबंध में श्री इन्द्रसेन सिंह पुत्र हरिनारायन ने पूछताछ करने पर लिखित रूप से अवगत कराया कि समिति का गठन तो हुआ है किन्तु रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है। बिना रजिस्ट्रेशन के युक्त समिति के पैड पर शिकायत करने का कोई औचित्य नहीं है। ग्राम प्रधान की शिकायत सही पायी गयी।'' इसी जांच रिपोर्ट को आधार बनाकर जिला पंचायत राज अधिकारी ने 17 दिसंबर को अपने अधीनस्थ बी.डी.ओ. को निर्देश दिया कि संबंधित ग्रामीणों के खिलाफ स्थानीय थाने में मुकद्दमा दर्ज कराया जाए। बी.डी.ओ. ने ऐसा ही किया और 21 दिसंबर, 2007 को थानाधिकारी द्वारा ग्रामीणों के खिलाफ धारा 466, 470, 471 के तहत मुकद्दमा दर्ज कर लिया गया। उसने  एफ.आई.आर. में लिखा, ''फर्जी विकास संघर्ष समिति बनाकर पैड बनाकर असली के तौर पर प्रयोग करने का जुर्म।'' आगे की कार्य वाही पूर्वनिर्धारित थी। 26 दिसंबर, 2007 को सूचना मांगने वाले दोनों ग्रामीणों को गिरफ्तार कर लिया गया। यहां यह बताना प्रासंगिक है कि धारा 466
के अंतर्गत दर्ज अपराध गैर जमानती होते हैं। इसमें आरोपियों को जमानत आसानी से नहीं मिलती है।

जमानत के लिए जब ग्रामीणों के परिवार वालों ने कोशिश शुरू की तो यह बात साबित भी हो गयी। जमानत की अर्जी देने के बाद 21 दिन तक कोई सुनवाई नहीं हुई। अंतत: 17 जनवरी, 2008 को सुनवाई हुई, लेकिन आश्चर्य की बात यह कि उन्हें कोई राहत नहीं मिली। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नसीर अहमद ने गंभीर अपराध का दोषी करार देते हुए दोनों ग्रामीणों की जमानत याचिका खारिज कर दी। 'बुध्दिमान' न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा, ''अभियुक्तगण के विकास संघर्ष समिति की जांच जिलाधिकारी द्वारा करायी गयी। उनकी आख्या के अनुसार अभियुक्तगण के विरुध्द पुलिस थाने में मुकद्दमा पंजीकृत कराने हेतु संस्तुति की गयी और विकास संघर्ष समिति एक फर्जी संस्था पायी गयी। इस प्रकार उपलब्ध अभिलेखीय साक्ष्यों से स्पष्ट है कि अभियुक्त गण द्वारा विकास संघर्ष समिति के अभिलेख की कूटरचना की गयी और बार-बार अड़चनें विकास कार्य एवं प्रशासनिक कार्य में डाला गया। अत: अपराध अत्यंत गंभीर प्रकृति का है। जमानत का आधार पर्याप्त नहीं है। जमानत प्रार्थनापत्र निरस्त होने योग्य है।''

पुलिस द्वारा अभियुक्तों को धारा 466 के तहत गिरफ्तार करना साफ तौर पर उसकी बदनीयती दर्शाता है। एफ.आई.आर. में ग्रामीणों का यह अपराध बताया गया है कि उन्होंने बिना संस्था का रजिस्ट्रेशन कराए उसके लेटरपैड पर आवेदन किया। यहां ध्यान देने योग्य बात है कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ग) सभी नागरिकों को संगठन बनाने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। कोई भी कानून इस अधिकार को यदि अनुपयुक्त तरीके से बाधित करता है तो उस कानून को ही अवैध् माना जाएगा। गौरतलब है कि देश में कई संस्थाएं और संगठन बिना पंजीकरण के ही देश और समाज के हित में काम कर रहे हैं। श्री के.एन. गोविन्दाचार्य का राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन, मेधा पाटकर का नर्मदा बचाओ आंदोलन, सूचना के अधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले श्री अरविन्द केजरीवाल की संस्था परिवर्तन और न जाने कितनी अन्य संस्थाएं बिना पंजीकरण के ही काम कर रही हैं। अगर मायावती के शासन में कानून की जिस तरह व्याख्या की गयी है, उसे सही माना जाए तो इन सभी संस्थाओं के पदाधिकारियों को धोखाधड़ी के आरोप में जेल में होना चाहिए।

एक लोकतांत्रिक देश में सरकारी पद पर बैठे नेता या अफसर के गलत कामों की शिकायत करना और उसका विरोध करना न केवल उचित है बल्कि बहुत जरूरी है।  लेकिन आजमगढ़ में प्रशासन और यहां तक कि न्यायालय भी इसे विकास कार्यों में अड़चन पैदा करने की कार्रवाई मानता है। इस पैमाने पर संसद एवं विधानसभा में विरोधी दलों के साथ क्या किया जाना चाहिए, यह प्रशासन से पूछने वाली बात है।

इस पूरे मामले में सबसे अधिक चौंकाने वाली भूमिका न्यायालय की है। न्यायाधीश द्वारा न्यायिक सिध्दांतों का खुलेआम गला घोंट दिया गया। न्यायिक प्रक्रिया का एक सिध्दांत है कि जब तक अपराध सिध्द न हो जाए आरोपी को निर्दोष माना जाए। लेकिन यहां तो न्यायाधीश ने बिना मुकद्दमा चलाए ही आरोपियों को 'गंभीर अपराध' का दोषी करार दे दिया। जांच अधिकारी की रिपोर्ट में और एफ.आई.आर. में आरोप लगाया है कि संस्था पंजीकृत नहीं है, इसलिए फर्जी है। जज से अपेक्षा थी कि वह इस आरोप के खोखलेपन को देखते हुए पूरे मामले को खारिज कर देता और पुलिसकर्मियों को लताड़ता कि संस्था का पंजीकृत न होना धोखाधड़ी कैसे हो गयी। ग्रामीणों ने जांच अधिकारी को लिखकर अवगत कराया है कि संस्था बनी है लेकिन पंजीकरण नहीं करवाया गया है। धोखाधड़ी तो तब होती जब ग्रामीण अपनी संस्था का पंजीकरण करवाए बिना उसे पंजीकृत संस्था के तौर पर प्रचारित करते, या उसी नाम की कोई और संस्था अस्तित्व में होती।

आजमगढ़ के 'विद्वान' अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (विशेष) श्री नसीर अहमद ने पुलिस और प्रशासन के लोगों से ऐसा कुछ तो नहीं कहा, अलबत्ता उन्होंने ग्रामीणों को धोखाधड़ी के साथ-साथ विकास कार्यों में अड़चन पैदा करने का दोषी भी करार दे दिया। यहां यह बताना जरूरी है कि न तो प्रशासन की जांच रिपोर्ट में और न ही एफ.आई.आर. में ग्रामीणों के खिलाफ विकास कार्यों में अड़चन पैदा करने का आरोप लगाया गया है। पता नहीं जज साहब कैसे इस निष्कर्ष पर पहुंच गए कि ग्रामीण विकास कार्यों में अड़चन पैदा कर रहे हैं। आजमगढ़ जिला न्यायालय द्वार जमानत अर्जी ठुकराए जाने के बाद ग्रामीणों के परिवार वालों के सामने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जाने के सिवाय कोई और चारा नहीं था। लेकिन, हाईकोर्ट में वकील की भारी-भरकम फीस देने के लिए पैसे जुटाना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। किसी प्रकार उन्होंने नाते-रिश्तेदारों से उधार लेकर पैसा जुटाया और इलाहाबाद हाईकोर्ट में जाकर जमानत की अर्जी दी। लगभग एक महीने तक उन्हें हाईकोर्ट में 'तारीख' मिलती रही। आखिर में उनकी अर्जी पर सुनवाई 18 जनवरी, 2008 को हुई और न्यायालय ने 'कृपा' करते हुए उन्हें जमानत दे दी। जमानत मिलने के बाद भी ग्रामीणों को तमाम कागजी कार्रवायी के नाम पर 7 दिन और जेल में रखा गया। अंतत: दो महीने की जेल काटने के बाद वे जेल से बाहर आ सके। हालांकि अभी उन्हें केवल जमानत मिली है, उनपर मुकद्दमा अभी भी चल रहा है। उन्हें खुद को निर्दोष साबित करने के लिए अभी अदालत के न जाने कितने चक्कर काटने होंगे और अपनी गाढ़ी कमाई से न जाने कितनी रकम इस कानूनी लड़ाई में फूंकनी होगी। दो महीने जेल मे रहने के कारण उन्हें और उनके परिवार को जो मानसिक-आर्थिक यातना झेलनी पड़ी, उसका तो कोई हिसाब ही नहीं है। यहां यह बताना जरूरी है जिन ग्रामीणों के साथ यह सब कुछ घटित हुआ है, वे सामान्य किसान हैं। गांव में खेती-किसानी के जरिए ही वे अपनी आजीविका चलाते हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद खुद को संभालना उनके लिए एक चुनौती होगी। यद्यपि जिस सूचना को प्राप्त करने के लिए ग्रामीणों ने इतना कष्ट सहा, वह सूचना उन्हें आज तक नहीं मिली है। लेकिन उनका संघर्ष व्यर्थ नहीं गया है। गांव के कई लोग जो पहले मूकदर्शक थे, अब ग्रामप्रधान के भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने लगे हैं। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी ग्रामीणों को अपना समर्थन दिया है। दिल्ली, मुंबई और अन्य शहरों में रहने वाले उस गांव के प्रबुध्द लोगों ने गांव के मामले में रुचि लेनी शुरू कर दी है। उन्होंने इस मामले को मीडिया में उठाया और प्रशासन में उच्चाधिकारियों से बात की है। सूचना के अधिकार के क्षेत्र में काम कर रहे कई कार्यकर्ता ग्रामीणों के पक्ष में लामबंद होने लगे हैं। सभी इस बात को लेकर दृढ़ प्रतिज्ञ हैं कि ग्रामीणों ने अपने गांव में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो लड़ाई शुरू की है उसे उसके मुकाम तक पहुंचा कर ही दम लिया जाएगा। यही नहीं एक गांव की इस घटना को पूरे जिले, फिर पूरे प्रदेश और देश में प्रचारित करने और ग्रामीणों को बड़े पैमाने पर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए तैयार करने की योजना है।

आजमगढ़ की इस घटना के संदर्भ में हम जब सूचना के अधिकार के कानून की सफलता आंकते हैं तो हमें कुछ निराशा हो सकती है। हम पाते हैं कि केवल इसके दम पर आम आदमी अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकता क्योंकि जिस व्यवस्था के तहत यह कानून लागू किया जा रहा है, वह मूलत: आम आदमी के विरोध में खड़ी है।  यह व्यवस्था हर कदम पर उसे हतोत्साहित करती है। लेकिन साथ ही हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि सामाजिक कार्यकर्ताओं के हाथ में सूचना के अधिकार का कानून एक प्रभावशाली हथियार है। आम आदमी के साथ मिलकर वे यदि इसका प्रयोग करें तो हालात में बदलाव की आशा जरूर की जा सकती है। सूचना के अधिकार का कानून वह मोर्चा है जहां देश की सज्जनशक्ति व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई के लिए इकट्ठा हो सकती है। आजादी के समय हमारे बुजुर्गों ने जो सपने देखे थे, उन्हें सच में बदलने के लिए सूचना के अधिकार के कानून को कुशलता पूर्वक इस्तेमाल किया जा सकता है।

हम क्या करें ?

सूचना के अधिकार के जरिए ग्राम प्रधान के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की कोशिश करने वाले दो ग्रामीण जेल की यातना और तमाम मुश्किलों के आगे बेबस नजर आ रहे हैं। इससे पहले कि वे हार मानकर भ्रष्टाचार को अपनी तकदीर मान बैठें, सज्जन शक्तियों को उनका साथ देने के लिए आगे आना चाहिए।

हम एक ओर ग्रामीणों को पत्र लिखकर उन्हें उनके संघर्ष में नैतिक समर्थन दे सकते हैं, तो साथ ही उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मामले की जांच करवाने और दोषियों को दंडित करने की मांग कर सकते हैं। हमें यह भी मांग करनी चाहिए कि ग्रामीणों द्वारा मांगी गयी सूचना उन्हें उपलब्ध करायी जाए और उनके खिलाफ चलाया जा रहा मुकद्दमा वापस लिया जाए।

पीड़ित ग्रामीणों का पता है-

इन्द्रसेन सिंह/अंशुधर सिंह

ग्राम-देहदुआर, पोस्ट-सोहौली,

ब्लाक-मार्टिनगंज, जिला आजमगढ़, उ.प्र.

मुख्यमंत्री का पता है-

सुश्री मायावती (मुख्यमंत्री)

13-, माल एवेन्यू, लखनऊ

उ.प्र. पिन-226001

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन