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 मार्च,  2008

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सृष्टि का क्रमिक विकास-सामर्थ्यवानों को चेतावनी

स्वामी मुक्तानंद सरस्वती

सतयुग में भारतीय जीवन दर्शन का वेद के रूप में अवतरण हुआ। वेदों के द्वारा जो जीवन दर्शन प्रकट हुआ उसको व्यवहार में लाने के लिये सतयुग से आज तक निरंतर प्रयत्न हो रहा है।

 

यह संसार एक लंबी यात्र करके वर्तमान क्षण तक पहुंचा है। भारतीय काल गणना के अनुसार सृष्टि का आरम्भ 1,97,29,49,106 वर्ष (एक अरब सत्तानवे करोड़ उनतीस लाख उनचास हजार एक सौ छ: वर्ष) पहले हुआ था। अब तक 27 बार प्रलय हो चुकी है। वर्तमान दौर 28वें चक्र का है। इस चक्र में 17,28,000 वर्ष सतयुग के बीत गए। 12,96,000 वर्ष त्रेतायुग के बीत गए और 8,64,000 वर्ष द्वापर के बीत गए। वर्तमान में 5,106 वर्ष कलियुग के भी बीत गए हैं। इसका अर्थ हुआ कि 38,93,106 वर्ष पहले सतयुग का प्रारम्भ हुआ था। सतयुग में भारतीय जीवन दर्शन का वेद के रूप में अवतरण हुआ। वेदों के द्वारा जो जीवन दर्शन प्रकट हुआ उसको व्यवहार में लाने के लिये सतयुग से आज तक निरंतर प्रयत्न हो रहा है। वैदिक जीवन दर्शन का सूत्र बहुत ही सरल है। सृष्टि के सतत् विकास हेतु मानव, प्रकृति तथा समाज के मध्य देश, काल, पात्र के सन्दर्भ में संतुलन बनाए रखने का व्यवहार शास्त्र वैदिक जीवन दर्शन का मूल आधार है। यह आधार सतत् नूतनता की ओर संकेत करता रहता है। यह सनातन है। सनातन वही हो सकता है जो नित्य नूतन होता है। इसके तीन प्रमुख सिध्दान्त हैं।

पहला सिध्दांत यह कि समस्त संसार में जो कुछ भी दृश्य, अदृश्य, जड़, चेतन, अचेतन, ज्ञात, अज्ञात तथा सूक्ष्म या स्थूल है, वह सब एक ही चैतन्य का स्वरूप है। यह चैतन्य कण-कण में समाया हुआ है। यह चैतन्य जितने स्वरूपों में प्रकट होता है, उनमें कोई भी स्वरूप स्थिर नहीं है, सभी नाशवान हैं। ईशावास्यम् इदम् सर्वम् यत्किंच जगत्यान् जगत्। अर्थात- इस जगत के कण-कण में ईश्वर (चैतन्य) समाया हुआ है।

दूसरा यह कि इस समस्त ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी भोग साधन हैं, वे सबकी सन्तुष्टि के लिए हैं। सब देवतुल्य हैं। परस्पर एक-दूसरे को देने वाले देवता हैं। इसलिये पहले सभी का भाग देकर अर्थात् भोगसाधनों का सम्यक वितरण करके भोगों को प्रसाद रूप में ग्रहण करें। 'तेन त्यक्तेन भुंजीथा' अर्थात्- त्याग कर भोग करो।

तीसरी बात यह है कि सृष्टि की प्रत्येक वस्तु, जीव तथा व्यवस्थाओं में कोई न कोई गुण अवश्य हैं। कोई गुण कनिष्ठ या विशिष्ट नहीं होता। सब अपने में परिपूर्ण होते हैं। सांसारिक भोगों के प्रति न तो उपेक्षा हो और न ही भोगों के एकाधिकार की लालसा या आकांक्षा। इससे आध्यात्मिक भाव का उदय होता है, क्योंकि हर एक अपने में परिपूर्ण है। सभी गुणों का मूल्यांकन यथायोग्य समान है, इसलिये सब पारस्परिक भाव से एक-दूसरे के पूरक हैं। यस्तु सर्वाणि भूतानि, अर्थात- सब भूतों को अपनी आत्मा में देखो। सर्व भूतेषु च आत्मनम्, अर्थात- सर्व भूतों में अपनी आत्मा को देखो। सब मुझमें समाए हैं और मैं सबमें विसर्जित हूं। भिन्न गुण स्वभाव एक-दूसरे के पूरक हैं। इसलिए सभी के प्रति कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। यही आध्यात्मिक भाव की कुंजी है।

इन तीन प्रमुख सिध्दान्तों के आधार पर भारत में समाज व्यवस्थाएं विकसित होती रही हैं। दिशा संकेत के रूप में आज भी तीनों सिध्दांत मान्य हैं। सतयुग में इन सिध्दान्तों के आधार पर समाज व्यवस्था बनाने के लिये सबसे अधिक संघर्ष करना पड़ा। क्योंकि सतयुग में समस्त प्राकृतिक संसाधन (वायुदेव, वरुणदेव, अग्निदेव, शनिदेव, सूर्यदेव, चंद्रदेव आदि) इन्द्र के निरंकुश एकाधिकारी नियंत्रण में थे। समस्त सुख-साधनों का एकाधिकार स्वर्ग के रूप में इन्द्र के साम्राज्यवादी नियंत्रण में था। इसलिए इन्द्रासन पर एकाधिकार करने हेतु देव और दानवों के मध्य सतत् युध्द होते रहे। इन्द्रासन प्राप्त करने के लिये देव और  दानव दोनों ही प्रयत्नशील रहे। इसके लिए तपस्याएं भी हुर्इं और युध्द भी हुए। योग साधनों के एकाधिकार की लालसा इतनी बढ़ गई कि भोग साधन प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन के रूप में प्रकृति को भी मथ डाला गया। इस मन्थन से चौदह रत्न प्रकट हुए। इनका भोग करने के लिये मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की लालसा से अमृत घट के बंटवारे पर देव-दानवों के बीच संघर्ष हो गया। मृत्यु पर विजय प्राप्त करके स्वर्ग तथा भोग साधनों के एकाधिकार की लालसा सतयुग में अपनी चरम सीमा पर पहुंची हुई थी। लेकिन, इसी वातावरण में वैदिक विचारधारा जीवन की नश्वरता तथा भोग साधनों की निरर्थकता का प्रतिपादन कर रही थी। यह विचारधारा चैतन्य के प्रति आस्था की आध्यात्मिक संवेदनशील जीवनपध्दति को प्रतिपादित करती थी। सतयुग में आध्यात्मिक संवेदनशील जीवन पध्दति की साधना में लगे भक्त प्रहलाद जैसे व्यक्तियों को संघर्ष करना पड़ा और कष् उठाने पड़े। वैदिक आध्यात्मिक विचारधारा का विरोध तथा उसे नष्ट करने के प्रयास सतयुग में खूब हुए। परन्तु वैदिक आध्यात्मिक विचार की अपनी शक्ति इतनी प्रबल थी कि विरोधी पस्त होते चले गए। इस युग में दैवी शक्ति को अवतारों के रूप में सत्रह बार विभिन्न रूपों में शरीर धारण करके वैदिक जीवन दर्शन का रक्षण करने के प्रयत्न में विरोधियोें का नाश करना पड़ा। क्योंकि आम जनता की हिम्मत और शक्ति इतनी नहीं थी कि वह आध्यात्मिक जीवन के विरोधियों का मुकाबला करती।

सतयुग के बाद आया त्रेतायुग। त्रेता में रावण जैसे महारथी ने इन्द्रासन की सत्ता को चुनौती देकर एकाधिकारी इन्द्र के सभी पार्षदों को बन्दी बनाकर स्वर्ग के सभी सुख पृथ्वी पर लाकर भोगसाधनों का एकाधिकार प्राप्त कर लिया था। त्रेता में अनेक षि-मुनियों ने वैदिक आध्यात्मिक विचारधारा को यज्ञों के द्वारा आम जनता के बीच प्रसारित करना प्रारंभ कर दिया था। विरोधियों ने यज्ञ नष् किए और अनेक ट्टषि-मुनियों को मौत के घाट उतार दिया। त्रेता में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप में महान शक्ति ने शरीर धारण किया तथा वैदिक आध्यात्मिक चेतना को आम जनता के बीच स्थापित करने का महान पुरुषार्थ किया। इस युग में स्वर्ग तथा इन्द्रासन के एकाधिकार को चुनौती मिल चुकी थी। त्रेता में इन्द्रासन प्राप्त करने के लिए युध्द नहीं हुए। परन्तु इन्द्र द्वारा अहिल्या के साथ हुए बलात्कार का कोई विरोध भी नहीं हुआ। अहिल्या को ही बहिष्कृत किया गया। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अहिल्या को तो समाज में प्रतिष्ठित करा दिया परन्तु इन्द्र को बलात्कार के लिये धिक्कारा नहीं जा सका। क्योंकि एकाधिकारी राज्य तंत्र प्रभावी था। वैदिक आध्यात्मिक जीवन दर्शन के विरोधी पांच दुष्प्रवृत्तियों का नंगा नाच त्रेता में भी होता रहा। शराब, जुआ, व्यभिचार, हिंसा तथा धन वैभव की सत्ता द्वारा अपनी भोग लिप्सा की तृप्ति के लिये आम आदमी का शोषण और प्राकृतिक सम्पदा के साथ बलात्कार होता रहा।

अब आता है द्वापर युग। द्वापर में इन्द्रासन रूपी भोग साधनों का एकाधिकार तो समाप्त हो गया। परन्तु पृथ्वी पर अनेक ऐसे राजा महाराजाओं का प्रादुर्भाव हुआ जिससे आम जनता का शोषण और प्रकृति के साथ बलात्कार का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया। शराब, जुआ, व्यभिचार, हिंसा और धन-वैभव की सत्ता अनियंत्रित होकर साधारण जनता के स्वाभाविक जीवन पर हावी हो गई। इसी के साथ-साथ वैदिक, आध्यात्मिक जीवन-दर्शन  भी खुलकर सामने आ गया था। सारे संसार में अनेक गुरुकुलों और आश्रमों की प्रतिष्ठा समाज में होने लगी। द्वापर में गुरुकुल व आश्रमों को नष् करना तथा यज्ञों को धवंस करने की हिम्मत आतताईयों में नहीं बची थी। बचा रह गया था केवल भोग साधनों की प्राप्ति के लिए आम आदमी का शोषण व उत्पीड़न।

योगेश्वर कृष्ण के रूप में परम शक्ति ने शरीर धारण करके सबसे पहले इन्द्रासन का बहिष्कार किया तथा साधारण ग्वालबालों की शक्ति को जगाकर संगठित किया। उन्होंने गोवर्धन की स्थापना करके स्वावलम्बी गौसंस्कृति की स्थापना की क्योंकि वैदिक, आध्यात्मिक जीवन दर्शन की आधारशिला को दृढ़ करने के लिये गौमाता को सर्वोपरि स्थान दिलाना आवश्यक था। द्वापर में शराब, जुआ, हिंसा, व्यभिचार तथा धन वैभव की उच्च शृंखलता तो समाप्त नहीं हुई, परन्तु गौमाता को प्रतिष्ठा और वैभव का प्रतीक अवश्य मान लिया गया। राजा, महाराजा तथा धर्मगुरुओं का सम्मान गौवंश पालन हो गया। गौवंश को समृध्दि का प्रतीक माना गया।

योगेश्वर श्री कृष्ण ने बड़ी कुशलता से वैदिक आध्यात्मिक जीवन दर्शन के विरोधियों को आपस मेें लड़ाकर समाप्त करने का अद्भुत पुरुषार्थ किया। इस पराक्रम के मध्य उन्होंने श्रीमद्भगवतगीता के रूप में वैदिक आध्यात्मिक जीवन दर्शन को समाज के उच्च शिखर पर स्थापित कर दिया। इसी युग में वैशम्पायन व्यास महाराज ने वैदिक आध्यात्मिक जीवन दर्शन को लिपिबध्द करके जन-जन के लिये सुलभ बना दिया। लिखित रूप में वेद, उपनिषद, पुराण आदि उन्हीं की देन हैं।

वास्तव में वैदिक आध्यात्मिक जीवन दर्शन की यात्र आम जनता में द्वापर युग के बाद ही प्रारंभ होती है। द्वापर युग तक तो यह जीवन दर्शन अधर में झूलता रहा। द्वापर के बाद कलियुग आने पर इस जीवनदर्शन को खुली हवा-पानी में विकसित होने का अवसर मिला है। कलियुग के प्रांरभ में ही महाराजा परीक्षित ने शराब, जुआ, हिंसा, व्यभिचार तथा धन वैभव की उच् शृंखलता पर नियंत्रण किया। इसके व्यावहारिक स्वरूप पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया गया। सारी दुनिया में राज्य व्यवस्थाओं के स्वरूप तथा उसमें आम आदमी की स्थिति पर विचार प्रारंभ हुए। कौरव, पांडवों के बीच महाभारत का युध्द समाप्त हो गया था। महाभारत युध्द के प्रारंभ में ही श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद के रूप में श्रीमद्भगवतगीता द्वारा जो ज्ञान दुनिया को दिया गया उसका प्रसार भी सारी दुनिया में हो रहा है। कलियुग को प्रारंभ हुए 5106 वर्ष  गुजर चुके हैं। इस अवधि में भारत में अनेक महापुरुषों का अवतरण हुआ। सारे संसार में एकाधिकारी राज्य तंत्र के विकल्प की तलाश कलियुग के प्रारंभ से ही शुरू हो गई थी। महाभारत युध्द की समाप्ति पर जब युधिष्ठिर महाराज ने शैय्या पर पड़े भीष्म पितामह से भावी राज्य के स्वरूप हेतु मार्गदर्शन की अभिलाषा प्रकट की तो भीष्म पितामह ने कहा : नैवं राज्यं न च राज्यासीत- नैवं दाण्डों च दण्डिका:/ धर्मणैव प्रजा सर्वा-रक्षन्ति स्म: परस्परम्। अर्थात् जहां राज्य करने वाले तथा राज्याश्रित नहीं हों, जहां दण्ड देने वाले तथा दण्डित होने वाले न हों वहां समस्त समाज परस्पर धर्मभाव से एक-दूसरे की रक्षा करता है। राज्य के इस स्वरूप के विषय मे यह परिभाषा दंड शक्ति से भिन्न, हिंसा शक्ति के विरोधी, लोकशक्ति द्वारा संचालित समाज व्यवस्था का दिशा संकेत है। इसमें धर्म शब्द संदेह पैदा करता है। धर्मभाव का अर्थ हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई आदि लगाया जाता है। परन्तु यहां धर्मभाव का अर्थ है-यतो अभ्युदय नि: श्रेयान सिध्दि स: धर्म:। अर्थात् जिससे सबका सब प्रकार का कल्याणकारक विकास सिध्द होता है वही धर्म है।

सारे संसार के राजनीतिक सोच इस दिशा में प्रगति कर रही है। निरंकुशता को बल देने वाली पांच प्रवृत्तियों को महाराज परीक्षित ने कलियुग के प्रारम्भ में ही नियंत्रित कर दिया था। सतयुग, त्रेता, द्वापर तक जुआ, हिंसा, व्यभिचार, शराब और स्वर्ण की सत्ता पूरी तरह निरंकुश थी। महाराजा परीक्षित ने पहली बार इन पर राज्यतंत्र का अंकुश लगाया। तभी से ये राज्य तंत्र के नियंत्रण में चल रहे हैं। कलियुग में एकाधिकारी राज्य तंत्र का रूपान्तरण्ा   कल्याणकारी-लोकतंत्र में हो गया है, परन्तु आर्थिक सत्ता कल्याणकारी लोकतंत्र पर हावी हो गई है।

सतयुग से कलियुग तक वैदिक आध्यात्मिक जीवन दर्शन की यात्र सतत् प्रगति पर है। सारे संसार में उसके लक्षण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। पहले राज्य सत्ता प्राप्त करने के लिये भयंकर युध्द होते थे। अब राज्य सत्ता प्राप्त करने के लिये आम जनता के पास जाकर हाथ जोड़कर सेवा का अधिकार प्राप्त करने के लिए मतदान की प्रार्थना करनी पड़ती है। निरंकुश एकाधिकारी राज्य के द्वारा शोषण व अत्याचारों का काफी हद तक उन्मूलन हुआ है। शराब, हिंसा, जुआ, बलात्कार, स्वर्ग पर निरंकुश एकाधिकार समाप्त होकर वह व्यापक हुआ है। इनका प्रचार-प्रसार राज्य तंत्र के संरक्षण में हो रहा है। परन्तु इन पांचाे की उद्दण्डता को समाप्त करने के लिए आवाज उठाने का अधिकार जन साधारण को प्राप्त हुआ है। व्यक्ति, प्रकृति और समाज के मध्य देश, काल, पात्र के संदर्भ में सन्तुलन बनाए रखने का विचार व्यापक हो रहा है। यद्यपि भोगवादी विकास की अवधारणा ने अनेक प्रकार के प्रदूषणों को जन्म भी दिया है। पर्यावरण सन्तुलन एवं शाकाहार के प्रति सार्वजनिक चेतना का विकास हुआ है। सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि सतयुग में राजा की अनीति के विरुध्द आवाज उठाना वर्जित था। त्रेता में राजा के विरुध्द आवाज उठाने पर दंडित होना पड़ता था। श्रीराम ने राजा के विरुध्द आवाज उठाने का अधिकार आम आदमी को दिलाने का प्रयत्न किया। द्वापर में श्रीकृष्ण के नेतृत्व में साधारण ग्वालबालों ने एकाधिकारी राज्यतंत्र को निर्णायक चुनौती दी। कलियुग में सारी दुनिया में एकाधिकारी राज्यतंत्र के विकल्प की खोज होती रही। राज्यतंत्र के एकाधिकार को समाप्त करने के अनेक प्रयोग हुए। आम आदमी को अपनी आवाज उठाने का स्वतंत्र अधिकार मिला। आम आदमी की हैसियत सतत् बढ़ती जा रही है।

एकाधिकारी राज्य तंत्र का रूप तो बदला है परन्तु एकाधिकारी अर्थतंत्र आम आदमी की सभी प्रकार की शक्तियों का शोषण कर रहा है। एकाधिकारी अर्थतंत्र विज्ञान की सहायता से प्रकृति के साथ भी बलात्कार कर रहा है। एकाधिकार केन्द्रित अर्थतंत्र ने विज्ञान के सहयोग से व्यक्ति, प्रकृति और समाज के मध्य असंतुलन पैदा कर दिया है। इस असंतुलन को संतुलित करने का उपाय सारा संसार खोज रहा है। इस खोज को दिशा देने के लिये वैदिक जीवनदर्शन के तीन प्रमुख सूत्रें को स्वीकार करना संसार की अनिवार्यता हो गई। सृष्टि में एक चैतन्य शक्ति सर्वव्यापक है। प्रकृति की समस्त शक्तियोे का उपयोग सबके लिए हो। सृष्टि के समस्त जीव-जन्तुओं तथा वस्तुओं का अपना विशिष्ट गुण है। सब परस्पर पूरक हैं।

सृष्टि के सतत् विकास का क्रम अपनी गति से चल रहा है। बाधाएं जो भी दिखाई देती हैं वे तो अज्ञान रूपी क्षणिकाएं हैं। इन क्षणिकाओं के दुष्चक्र में विशिष् कहे जाने वाले कतिपय धर्माचार्य, राजनेता, उद्योगपति, अभिनेता, बुध्दिजीवी, समाजसेवक आदि फंस गए हैं। इन विशिष् सामर्थ्यवानों को इस विषचक्र से निकालना होगा। क्योंकि आम आदमी इन्हीं से प्रेरणा लेता है।

यद् यद् आचरति श्रेष्ठ-तद् तद् एव इतरो जन:/ स: सत्प्रमाणम् कुरुते-लोक: तद् अनुवर्तते॥ अर्थात-श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है अन्य भी वैसा-वैसा ही करते हैं। जिसको वे प्रमाणित कर देते हैं, समस्त समुदाय उसी के अनुसार बरतने लगता है। अत: इन विशिष्ट सामर्थ्यवानों को चेतावनी देने एवं सही दिशा में सोचने हेतु इन्हें विवश करने का सही समय आ चुका है।

 संपर्क : सर्वोदय आश्रम, साधुबेला, हरिद्वार, उत्तराखंड-249410

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन