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विविधा |
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सन्त कीनाराम और अघोर |
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सैय्यद फिरोजुद्दीन |
बचपन की अवस्था से ही कीनाराम गांव
के पास एक घने जंगल में पीपल के एक वृक्ष के नीचे
पूजा-पाठ के लिए अकेले ही निकल कर बैठ जाया करते थे।
बरगद का वह विशाल वृक्ष जिसकी छाया में स्थित तपासन
जहां शैशवावस्था में संत कीनाराम ने अपनी साधना शुरू
की थी,
आज भी
अनेक प्रकार से जीवन्त बना हुआ है।
काशी (वाराणसी) से करीब
50 किमी. उत्तर
जनपद चन्दौली के चहनिया विकास खण्ड स्थित राम गढ़ के
अघोर सिध्द पीठ का सन्त कीनाराम की जन्म-स्थली होने
के कारण विशेष महत्व है। कीनाराम की साधना पध्दति मेx
वैष्णव और अघोर का समन्वय रहा है। इस सिध्दपीठ में
वैष्णव व अघोर आसन एक ही स्थान पर स्थित हैं।
उत्तर भारत की सन्त परम्परा में बाबा
कीनाराम अघोर पंथ के प्रवर्तक आचार्य के नाम से जाने
जाते हैं। सन्त कीनाराम का जन्म जनपद चन्दौली के
रामगढ़ गांव में संवत्
1658 की भाद्रपद को कृष्ण पक्ष
की चतुर्दशी को एक क्षत्रिय परिवार में हुआ माना
जाता है। पिता का नाम अकबर सिंह व माता का नाम मंशा
देवी। कहते हैं कि बाबा के अवतरण के लिए भगवान शिव
ने ब्राह्मण रूप में आकर शिशु कीनाराम में अपने
आलौकिक तेज को समाहित कर दिया था। बचपन की अवस्था से
ही कीनाराम गांव के पास एक घने जंगल में पीपल के एक
वृक्ष के नीचे पूजा-पाठ के लिए अकेले ही निकल कर बैठ
जाया करते थे। बरगद का वह विशाल वृक्ष जिसकी छाया
में स्थित तपासन जहां शैशवावस्था में संत कीनाराम ने
अपनी साधना शुरू की थी,
आज भी अनेक प्रकार से जीवन्त बना हुआ है। तपासन के
आस-पास पहुंचते ही ऐसा आभास होता है कि साक्षात
कीनाराम जी अपना आसन जमाए साधनारत हैं। वहां जीवन के
सम्बन्ध में सन्त कीनाराम जी के दिए गए उद्गार आज भी
स्पष्ट लिखे हुए नजर आते हैं। अर्थात आत्मा का ज्ञान
हो जाने पर जीव भी ब्रह्म है। इस तरह अघोर दर्शन
आत्म साक्षात्कार में विश्वास करता है। पूजा के समय
तपोस्थली का अलौकिक सौन्दर्य देखते ही बनता है। यहीं
पास में बाबा कीनाराम की कचहरी तथा उसमें स्थित आदि
गद्दी (आसन) है जो आज भी तेज से दमक रही है। पूरा
स्थान जनसाधारण के लिए पूज्यनीय है। यहां की अखण्ड
धूनि में हमेशा अग्नि प्रज्ज्वलित रहती है,
जिसकी बुझी पड़ी राख हर प्रकार के
भौतिक कष्टों का शमन और निवारण करती है। सिध्दपीठ पर
कीनाराम तपासन की चतुर्दिक एक स्वर्गिक आभा बिखरी
हुई है, जहां चारों तरफ
ब्रह्मलीन अघोर संतों की समाधियां इस सिध्दपीठ की
पवित्रता को और बढ़ाती हैं। बाबा कीनाराम द्वारा
निर्मित कूप इस सिध्दपीठ में एक औषधालय का काम करता
है। इसका निर्माण बाबा ने गोहरे (गोबर के उपले) से
करवाया था। ऐसी मान्यता है कि वह गोहरे का बना कूप
आज से चार सौ वर्ष पहले ही बाबा के प्रभाव से ईंट की
बनी इमारत के रूप में परिवर्तित हो गया था। कूप पर
बने चारों
घाट चारों धाम के दर्शन पूजन का फल प्रदान करते हैं।
यहां प्रत्येक घाट का पानी भी अलग-अलग स्वाद में
प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि कूएं के पानी से
सिर्फ स्नान कर लेने से चर्मरोग सहित तमाम तरह के
रोगों
एवं व्याधियों से मुक्ति मिल जाया करती है। राम
सरोवर के नाम से प्रसिध्द इस अलौकिक कूप में ही कूद
कर संत कीनाराम अदृश्य हो गए थे। लोग ऐसा मानते हैं
कि प्रत्येक रविवार और मंगलवार के दिन दर्शन,पूजन
व आरती के समय संत कीनाराम स्नान के लिए कूप पर
उपस्थित रहते हैं। कूएं के जल को उपस्थित श्रध्दालु
प्रसाद स्वरूप ग्रहण तो करते ही हैं,
साथ ही उसे
गैलनों में भरकर अपने घर ले जाकर प्रसाद के रूप में
वितरित करते हैं।
इतिहास के पन्ने यह बताते हैं कि
सन्त कीनाराम जी ने रामगढ़ सिध्द पीठ के अलावा कई और
अघोर पीठों की स्थापना की थी। इसमें से चार मठ विशेष
रूप से उल्लेखनीय है। ये हैं: क्रीकुण्ड-वाराणसी,
देवल-गाजीपुर और
हरिहरपुर-जौनपुर। इनकी स्थापना के लिए तेजस्वी संत
कीनाराम के चरणों में बड़े-बड़े जमींदारों ने हजारों
एकड़ भूमि दान देकर अपना सौभाग्य समझा था। लोगों की
मान्यता है कि संसार में संत कीनाराम 170
वर्ष तक जीवित रहे।
संपर्क:
रूकइया मेमारियल स्कूल,
मुगलसराय,
उत्तर
प्रदेश |