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मुझे लगा कि सारे दफ्तरों,
मंत्रलयों में लगातार बढ़ रहे
लाखों पीए भाइयों तक यह घोषणा पहुंचनी चाहिए। आखिर,
यह पीए धर्म के पैगंबर की मौलिक
उद्भावना है। अचानक मेरी नजरों
में पीए धर्म के विस्तार और विकास का सुनहरा स्वप्न
तैरने लगा। पहली बार मुझे पल्लू में
'आचार्य पल्लू'
दिखाई दिए। एक फलते-फूलते,
अकड़ते-इतराते,
घड़ी में दनदनाते हुए सम्प्रदाय
के पैगंबर, गुरु,
आचार्यप्रवर। मुझे दुनिया के पहले संसारी धर्म के
पनपने के आसार दिखने लगे।
आजकल सारे ग्रह नक्षत्र उस पर
मेहरबान हो गए हैं। कई दिनों से धूल खा रही उसकी
कुंडली अचानक चमक गई है। शक्ल भी ऐसे चमक गई है जैसे
बंद पड़े आहाते में दो सौ वाट का बल्ब लगा दिया गया
हो। अब उसके खूब चर्चे हैं और कोरे चर्चे ही
नहीं
हैं,
खर्चे भी खूब हैं। जिनके चर्चे
और खर्चे खूब होते हैं,
उनके नखरे भी खूब होते हैं। नखरे का तो मतलब ही होता
है, 'जो दूसरों को अखरे।'
इस असार संसार में अखरना ही तो
एक उपलब्धि है। अखरने लायक बनने के लिए लोग
क्या-क्या नहीं करते? यों
दूसरों को आप अखरते हैं तभी तो आप बड़े आदमी कहलाते
हैं, साहब कहलाते हैं। जब
तक दूसरों में और आप में कोई अंतर नहीं,
तब तक आप की प्रगति के क्या
मायने हैं? अंतर बताने
वाला सूचकांक ही 'अखरना'
है। तो,
यह हमारा बचपन का साथी पल्लू अब
मि. पी. सी. पी. अर्थात मि. पाल चंद्रपांडे एक
मंत्री का पीए बन गया है। आप समझ सकते हैं,
उसकी यह
प्रगति लाजवाब है।
अभी एक दिन वह बाथरूम में नहा रहा
था। उसके घर में मैं उसके बाथरूम में होने का अनेक
बार गवाह रहा हूं। वह एक जाना-माना बाथरूम सिंगर है।
एक अरसे से मैं उसके बाथरूम एफएम प्रोग्राम का
श्रोता हूं। मगर उस दिन तो कमाल हो गया। उसके गाने
की पंक्तियां सुनकर मुझे संत आगस्टिन का
'कन्फेसन'
और आर्किमिडीज का 'यूरेका'
एक साथ याद आ गया। गाने की तर्ज
उसने अताउल्ला खान से उधार ली थी,
पर पंक्तियां पूर्णत: मौलिक थीं,
जो मुझे
इस तरह सुनाई दे रही थीं।
'आज
ही हमको दिखाने हैं नखरे
आज ही हम पीए हुए हैं।'
मैं उछल पड़ा,
मुझे अचानक लगा कि पद इंसान को
महान बना देता है। हमारा लंगोटिया यार पल्लू बाथरूम
में नहाते-नहाते बोध को उपलब्ध हो गया। आध्यात्म का
'बोध'
शब्द संसार के लिए बेमानी है,
बेमजा है। ठीक-ठीक कहें तो उसकी
बात करना ही सजा है। मगर पल्लू को जो बोध हुआ,
वह आध्यात्म का नहीं,
संसार का बोध है। वह संसार नामक
ताले की चाबी है। जीवन रूपी आइसक्रीम की मिठास है।
वह एक युगांतरकारी घोषणा है। मुझे लगा कि सारे
दफ्तरों, मंत्रालयों
में लगातार बढ़ रहे लाखों पीए भाइयों तक यह घोषणा
पहुंचनी चाहिए। आखिर,
यह पीए धर्म के पैगंबर की मौलिक
उद्भावना है। अचानक मेरी नजरों
में पीए धर्म के विस्तार और विकास का सुनहरा स्वप्न
तैरने लगा। पहली बार मुझे पल्लू में 'आचार्य
पल्लू' दिखाई दिए। एक
फलते-फूलते, अकड़ते-इतराते,
घड़ी में दनदनाते हुए सम्प्रदाय
के पैगंबर, गुरु,
आचार्यप्रवर। मुझे दुनिया के पहले संसारी धर्म के
पनपने के आसार दिखने लगे।
यों लोगों ने पेड़-पौधों,
पशु-पक्षियों,
नदियों-तालाबों पर काफी शोध किए
हैं। इन दिनों टीवी पर डिस्कवरी,
ज्योग्राफिक आदि चैनलों की
लोकप्रियता चरम पर है। सोचते-सोचते लगा कि मनुष्य पर
अब तक हुए शोध नाकाफी हैं। अभी मनुष्य (होमोसेपियंस)
की विविध प्रजातियों पर शोध की बहुत गुंजाइश है। पीए
प्रजाति भी अभी शोध से अछूती है। दुनिया भर के
शोधकर्ताओं के लिए यह सुनहरा मौका है। पहले आइए-पहले
पाइए के नियम से जो सबसे पहले शोध शुरू करेगा,
इस
प्रजाति का प्रथम अध्येता होने का गौरव प्राप्त
करेगा। सभी शोधकर्ताओं के आकर्षण के लिए कुछ सूचनाएं
दी जा रही हैं-
मनुष्य की तमाम
प्रजातियों में यह सबसे रोचक प्रजाति है। रंग बदलने
में इसे गिरगिट से कई गुना ज्यादा महारत हासिल है।
कुछ लोगों ने इसकी क्षमता को एक करोड़ गिरगिटों की
क्षमता के बराबर माना है।
सहलाने,
मनाने,
मिमियाने,
फुस-फुसाने,
गुर्राने,
काट खाने और बदला लेने की तमाम
कलाबाजियों में इसका कोई जवाब नहीं है। एक बड़ी बात
यह है कि आज तक भारतीय मिथकों में पड़ी
अर्ध्दनारीश्वर की कल्पना सैध्दांतिक होने का इल्जाम
भुगत रही थी,
इस प्रजाति में वह कल्पना साकार होकर
व्यावहारिक हो गई है। कोई भी पीए अपने बास और उसके
मित्रें के सामने एक सुकोमल नारी है और उसकी
अनुपस्थिति में एक रौबदार पुरुष।
इस प्रजाति में कला
और विज्ञान का अद्भुत संगम है। इस प्रजाति में कला
जैसी लरज और विज्ञान जैसी गरज दोनों मौजूद हैं। इस
प्रजाति के लोग जिगरे और जज्बे वाले होते हैं।
ऐरे-गैरे जल्दी ही इससे पलायन कर जाते हैं।
मुश्किल से ही कोई ऐसा नाशुक्रा पीए
होगा जो पीता नहीं है। सभी पीए पी-पीकर बनते हैं।
बाहर से लिए जाने वाले पेय क्षणिक होते हैं,
उनकी क्या बिसात है?
देवता जिस सोमरस का पान करते थे,
वह अब 'आउटडेटेड'
हो गया है,
गली का आवारा आदमी भी उसे पी
लेता है। पीए प्रजाति की विशेषता यह है कि वह आठों
पहर अहं रस का पान करती है। बच्चन की मधुशाला अब
फीकी हो गई है। इस प्रजाति का अहं रस पान अब
सांसारिकों में लोकप्रिय हो रहा है। मौके-बेमौके,
आस-पास और
दूर-दूर तक इस रस का सेवन करने की आदत लोगों में
तेजी से फैल रही है।
अनंत विशेषताओं से लबालब इस प्रजाति
के अध्ययन के लिए सभी छोटे-बड़े,
नए-पुराने अध्येताओं को खुली
चुनौती है। आएं और देखें,
आचार्य पल्लू के इस प्रथम संसारी सम्प्रदाय का
अध्ययन कर स्वयं को आजमाएं। पैगंबर पल्लू अब पालक,
महापालक,
तारक,
त्रता, भाग्य विधाता,
अन्नदाता जैसे नामों से भी जाने
जाएंगे। प्रजाति के सबसे सक्षम सदस्य को उनका पीए
बनने का सौभाग्य मिल सकता है। मगर वे स्वयं अपने पीए
पन को नहीं छोड़ेंगे। अभी दो हफ्ते तक वे किसी
अध्येता को इंटरव्यू नहीं देंगे,
अपने बास के साथ
दौरे पर जा रहे हैं।
(लेखक
स्वतंत्र चिंतक हैं।) |