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 मार्च,  2008

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जरा हटके

नियामत नैनो की

विमल भाई

देश के मध्यम वर्ग पर बड़ा उपकार किया जमशेद जी टाटा के वारिसों ने। बैंको की भी चांदी दिखाई देती है, क्योंकि कर्ज लेने वाले जो उनके पास आएंगे। जैसे कल की ऊंची शान मोबाईल अब साईकिल का पंचर बनाने वाले की जेब में है, वही हाल कार का भी होगा। यदि आपने नैनो की आलोचना की तो आप गरीब के दुश्मन, साधना पर कब्जे की अमीरी मानसिकता वाले कहलाएंगे। उदाहरण मोबाईल कंपनियों का दिया जा रहा है कि कैसे अमीरों की चीज गरीबों का खिलौना बन गयी है। कहा जा रहा है कि जैसे मोबाइल लग्जरी से जरूरत बन गया वैसे ही कार भी जरूरत बन जाएगी।

दुनिया पहले इतनी तेज नहीं थी। अब तो लाखों लोगों की जिंदगी सेंसेक्स के उछाल पर निर्भर होती है। ऐसे में कौन है जो बसों में लटके या आटो वाले से झगड़ा करे। भला हो रतन टाटा साहेब का जिनके रहमोकरम से अब मध्यम वर्गीय लोग भी अपनी कार का आंनद ले पाएंगें। वो भी शुध्द देसी। दूसरी भी कारें, छोटी से छोटी होती जा रही हैं। पर नैनो तो नैनो है। सिंगुर के नालायक किसानों ने अपनी खेती की जमीने देने से मना किया तो क्या नैनो नहीं बनेगी। हमारी लाल, हरी, नीली, पीली, भगवा सभी सरकारों की सहानुभूति है इस कार और कार बनाने वालों के साथ। इसीलिए सिंगुर से लेकर प्रगति मैदान तक नयी नवेली कार व उसके मालिकों को सहयोग और सुरक्षा का वचन सभी ने दिया।

कोई कुछ भी कहे, हमारे बुध्ददेव जी हैं चौकन्ने। इसका हम एक उदाहरण दे सकते हैं। जब मृदुभाषी, कोमल हृदय रतन जी ने छोटी कार के सपने पर किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का दमन देखा तो वे बोले कि हम कहीं और चले जाते हैं। लेकिन छोटी कार कोई तसलीमा तो है नहीं जिसे कहीं भी फेंक दिया जाए। सो तुरंत माननीय मुख्यमंत्री जी ने उद्गार व्यक्त किए कि छोटी कार यहीं बनेगी। विरोध को शांत किया जाएगा। मुआवजा बढ़ाकर देंगे और नौकरी भी देंगे। जब चीन चियांग साहब ने आकर कह दिया कि नई वैश्विक परिस्थिति में कुछ समझौते करने पड़ेंगे तो क्या मजाल कि तथाकथित पूंजीवाद के नाम पर आम आदमी की कार रोक दी जाए। तय हुआ कि कार बनेगी और इसका उत्पादन होगा इसी लाल मिट्टी की धरती से। मेधा पाटकर भले ही चीखें लेकिन आम आदमी की कार का सपना भी तो पूरा होना है। जब पहली बार दिल्ली में सिंगुर वालों को लाकर लोग प्र्रदशन कर रहे थे तब भी पुलिस ने पार्टी आफिस को सहयोग किया और बैरिकेड लगाए। अब यह तो सरासर नाइंसाफी है ना कि गुजरात में दंगों के बाद भी भाजपा कार्यालय पर कोई प्रदर्शन नहीं और वामपंथियों की पहली शुरुआत में ही पार्टी आफिस पर प्रदर्शन! यदि सिंगुर में खेती की जमीन सार्वजनिक हित में लेने के लिए थोड़ी बहुत गोली चला दी गई और कुछ लोग मारे गए तो कौन सा तूफान आ गया। अरे मुक्ति हो गयी उनकी। बाद में भूख से मरने से तो बच गए। इसी बात पर पार्टी के दफ्तर पर लोग प्रदर्शन करने के लिए पहुंच गए। बुध्ददेव को लगा यह तो गलत है क्योंकि विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग आम आदमी को कार देने का सपना तोड़ रहे हैं। यदि कुछ लोग पुलिस की गोली से मर गए तो ऐसी क्या आफत आ गयी। वे यह क्यों भूल जाते हैं कि सिंगुर में जमीन जाने के बाद कई लोगों को नौकरी भी मिलेगी और राजस्व भी तो बढ़ेगा लखटकिया बनने से।

रतन टाटा आटो एक्सपो में सपना की रानी नैनो का माडल पुणे से बनवाकर लाए। दूसरी तरफ मेधा पाटकर जा बैठीं सिगुंर का दुखड़ा रोने प्रेस क्लब में। टाटा साहेब ने प्रगति मैदान में 11 बजे लोगों को नैनो का दर्शन कराया और प्रेस को अपना सपना, उस पर हो रहे अत्याचार, आम आदमी की कार के लिए चल रही संघर्ष गाथा बताई। उनकी मृदुवाणी से एक ऊर्जा निकल रही थी। इतने सुंदर भाषण के समय भी कुछ लोग 'खूनी कार का बायकाट करो' की टी शर्ट पहने सामने खड़े हो गए। जबकि रतन टाटा बार-बार कहते आ रहे हैं कि उनका विवादों से कोई सरोकार नहीं। वे तो बस अपनी छोटी सी कार के लिए छोटी सी जमीन चाहते हैं, आम आदमी के खेत में। यानी जहां गेहूं, धान आदि उपजते हैं वहीं कार का उत्पादन होगा तो देश का भी कितना विकास होगा। विरोध करने  वालों को आटो एक्सपो के आयोजकों ने आकर धीरे से समझाया भी कि भई इस सब से हमारी भी बेईज्जती होती है। सिंगुर का मामला सिंगुर में निपटाओ। देश भर में हल्ला मचाने से क्या फायदा।

खैर, नैनो के माडल के दर्शन के लिए प्रगति मैदान में लोगों का हूजुम उमड़ पड़ा। छोटी कारें तो और भी आ रही हैं। पर छोटे सपने पर हुए हमले से नैनो का प्रचार खूब हुआ। कैसा भोला सा नाम दिया है इसे। बड़ी कांप्रफेंसें हुई होंगी इसके नाम को लेकर। अब तो तय है कि जुलाई से नैनो की बुकिंग शुरू होगी और सितम्बर से नैनो सड़क पर दौड़ती दिखेगी।

अब सरकार आगे के काम के लिए तैयार हो जाए। जमीन पर ही नहीं हवा में भी सड़क बनानी होगी। साथ ही गलियों में भूमिगत पार्किंग स्थल बनवा लेना चाहिए। वैसे भी पानी के भूमिगत भंडार खत्म हो ही रहे हैं, उन्हें ही पार्किंग में बदल दिया जाए। है ना बढ़िया आइडिया। शायद मोंटेक सिंह आहलूवालिया के सुपुत्र और दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष सुन रहे हों तो कोई देशव्यापी योजना बन सके। लेकिन सब कुछ राष्ट्र मंडल खेलों से पहले होना चाहिए।

जैसे ये दलित, किसान, मजदूर, आदिवासी आदि वाले संगठन नैनो का विरोध करने के लिए एक हो गए हैं, उसे देखते हुए रतन टाटा को एक और काम करना चाहिए। उन्हें एक संगठन बनाना चाहिए। एक ऐसा संगठन जो इस सपने की रक्षा में खड़ा हो सके। इसमें फिक्की को शामिल करके इसे महासंगठन का रूप दिया जा सकता है। इसके मंच से टाटा अपने अनुभव को बांट सकते हैं कि कैसे उनके एक बयान पर बंगाल सरकार अपना पूरा महकमा उनके हित साधने में लगा देती है। अब लोग मांग कर रहे हैं कि 400 एकड़ जमीन वापिस कर दी जाए क्योंकि उन्होंने मुआवजे के चैक नहीं लिए हैं। नहीं लिए तो नहीं सही। इसमें नैनो का क्या कसूर?

नासमझ लोग नैनो से होने वाले फायदे को देख ही नहीं पा रहे हैं। उन्हें पता नहीं कि नैनो के कारण बैंक के पैसे उधारी पर जाएंगे। वसूली को स्टाफ जाएगा। कार धुलाई को पानी जाएगा। यमुना में नहीं तो टिहरी से तो पानी आ ही जाएगा। फिक्र करने की जरूरत क्या है? अब रही बात कार से निकलने वाले धुएं से ओजोन परत को होने वाले नुकसान, सड़का पर लगने वाले जाम की, तो ये सब फालतू की बात है। क्या इनके खातिर विकास को रोक दिया जाए? कदापि नहीं, यह तो सरासर गलत होगा। क्योंकि इससे तो टाटा का ख्वाब चकनाचूर हो जाएगा। दरअसल, कोशिश तो यही है कि समस्याएं रहें तभी तो समाधाान करने वाले और विकास करने वाले आगे आएंगे और उनकी दुकानदारी चलेगी। सिंगुर वालों ने तो बिना मतलब के लाल पार्टी को नुकसान करा दिया या यों कहें उन्हें बेपर्दा कर दिया।

तो भाईयों-बहनों छोड़ो कल की चिंता। घर, मैदान, गली, सड़क पर नैनो के लिए स्थान बनाओ। भूल जाओ कि आपकी कार के लिए जानें ली गई हैं तथा पीढ़ियों से जोती गई जमीन छीनने के बाद भूख और कंगाली से बेहाल 45 वर्षीय शंकर जैसे कई किसानों ने फांसी लगाई। काम ना मिलने से सिंगुर में बेरोजगारी फैली। भूल जाओ कि कंगाल होते किसान हमारी छोटी कार के सपने के लिए अपना सब कुछ गंवाने को मजबूर हैं। यह भी भूल जाओ कि नैनो ने अनगिनत लोगों को कई पीढ़ियों तक की तंगहाली का पुरस्कार सौंपा है। हमें सिर्फ प्रण करना होगा कि हमें अपने नयनों में सिर्फ अपना सपना देखना होगा और नयन खुलने पर उसका साकार स्वरूप। अपने सपने को पूरा करने के लिए सबका या दूसरे का दर्द पूरी तरह भूलना होगा। तभी हम ऐसा समाज बना पाएंगे जो सिर्फ हमारा होगा। वह समाज नैनो जैसा ही छोटा होगा। उसमें दूसरे के लिए स्थान ही नहीं होगा। उस समाज में कार मालिकों के अलावा सिर्फ रतन टाटा जैसे साहूकार होंगे और बुध्ददेव भट्टाचार्य जैसे पैरोकार।

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 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन