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अपने जीवन के सातवें दशक में कैप्टन
आद्या प्रसाद दुबे ने जिस बदलाव का बीड़ा उठाया है और
उसे एक मुकाम तक पहुंचाया है,
वह देश भर
में उनके अनेक हमउम्र लोगों के सामने एक मिसाल जैसा
है।
''जीवन
एक सतत् युध्द है और इसमें लड़ते हुए हर कोई हर वक्त
एक सैनिक है।''
यह
उक्ति कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे के
ऊपर
पूरी तरह से चरितार्थ होती है। उम्र के जिस पड़ाव के
बाद लोग खामोशी से जिंदगी के अंत का इंतजार करने
लगते हैं,
उन्होने वहां से एक नई शुरुआत की। यह
शुरुआत है चीजों को बदलने की और अपने तजुर्बे की
बदौलत भटकते युवा समूह को नई दिशा देने की।
बात है गोरखपुर जिले के एक गांव
मीठाबेल की,
जहां जातिगत खेमों में बंटे लोग
एक जर्जर समाज की बानगी पेश करते हैं। गांव के चारों
और फैली जमीन पर कुछ लोगों का कब्जा है,
जिनमें पिछड़ी जाति के लोग
मेहनत-मजदूरी करके अपनी जीविका चलाते हैं। गांव के
इस कामगार तबके के पास देश और दुनिया की हलचलों और
संभावनाओं से जुड़ने का कोई साधन मौजूद नहीं है।
बच्चे भी यहां पैदा होने के बाद सुविधाओं के अभाव
में कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। इन मुश्किलों से
उबरने का तरीका क्या हो,
सोचना बहुत कठिन है। ऐसे हालात में अपनी उपयोगिता
समझते हुए सेना के रिटायर्ड कैप्टन आद्या प्रसाद
दुबे ने कुछ फैसले लिए और उन पर संजीदगी से अमल भी
किया। सबसे पहले उन्होंने आम चलन के विपरीत,
रिटायरमेंट के बाद का जीवन गांव में बिताने की सोची
और फिर सामाजिक जड़ता और भविष्य को नजर में रखते हुए
गांव के कुछ युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण देना शुरू
किया।
शुरू में प्रशिक्षण लेते हुए इन
बच्चों का लक्ष्य किसी तरह से सेना में प्रवेश पा
लेना भर था। लेकिन कैप्टन आद्या प्रसाद दुबे की सोच
यह सब करते हुए कहीं आगे तक की थी। वे फिलहाल इस
भटकते युवा समुदाय को शारीरिक रूप से मजबूत बनाना
चाहते थे,
ताकि
मेहनत-मजदूरी के काम भी वे आसानी से कर सकें।
कैप्टन साहब ने अपना प्रयोग पांच
वर्ष पहले शुरू किया था। उस समय उन्होंने महज
4-5 बच्चों के
साथ अपनी पैतृक जमीन पर प्रशिक्षण देना शुरू किया।
तब से अब तक वे न सिर्फ नि:शुल्क प्रशिक्षण देते आ
रहे हैं,
बल्कि परिवारों की गरीबी को देखते
हुए बच्चों के लिए जरूरी कपड़े और जूते आदि का
बंदोबस्त भी अपने खर्च पर करते हैं। इस सिलसिले ने
पांच साल का सफर पूरा कर लिया है।
उन्होंने गांव के बाहर बंजर पड़ी जमीन
को प्रशिक्षण के लिए एक नया रूप दे दिया है। यहां हर
रोज सुबह के
4
बजे से ही बच्चे सैकड़ों की
संख्या में जुटते हैं और अलग-अलग तरह की शारीरिक
कसरतों के बाद उन्हें मनोवैज्ञानिक स्तर पर शिक्षित
किया जाता है। सुबह-सुबह एक नए जोश से भरे इन युवाओं
में लड़कियां भी उपस्थित होती हैं और इनकी तादाद
लगातार बढ़ती भी जा रही है। दिन के नौ बजे तक चलने
वाले इस प्रशिक्षण्ा के दौरान बच्चों को देश दुनिया
की सामाजिक-राजनैतिक गतिविधियों से भी अवगत कराया
जाता है। फिर दोपहर बाद 3-4
बजे से उन्हें गणित,
अंग्रेजी और विज्ञान जैसे विषयों
की मूलभूत जानकारी दी जाती है। दिन के बाकी समय में
बेहद कमजोर बच्चों को अलग से पढ़ाया जाता है। इस तरह
से अपनी पूरी दिनचर्या को इन युवाओं से जोड़कर कैप्टन
आद्या प्रसाद ने आस-पास के कई गांवों में एक नई
चेतना पैदा की है। लोगों का एक वर्ग ऐसा बन चुका है,
जिसे गांव के बिगड़ते राजनीतिक
समीकरण प्रभावित नहीं करते। इस कारण कैप्टन साहब के
गांव में जातिगत आधार पर फैले मतभेद भी काफी कम हो
गए हैं। 'सैनिक ट्रेनिंग
कैंप'
के नाम से चलते उनके प्रशिक्षण
केंद्र ने सेना के साथ-साथ ही दूसरी कई सरकारी
सेवाओं को भी अब तक कई होनहार जवान दिए हैं।
अपने जीवन के सातवें दशक में कैप्टन
आद्या प्रसाद दुबे ने जिस बदलाव का बीड़ा उठाया है और
उसे एक मुकाम तक पहुंचाया है,
वह देश भर
में उनके अनेक हमउम्र लोगों के सामने एक मिसाल जैसा
है। उन्हें देखकर यह बात बिलकुल सच लगती है कि अगर
आदमी के भीतर कुछ करने का जज्बा हो तो राहें खुद ब
खुद निकल आती हैंं।
संपर्क:
ग्राम पचदेवरी,
पोस्ट-ब्रहनपुर,
जिला गोरखपुर
(उ.प्र.) |