भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका

 मार्च,  2008

पिछले अंक

हमारे बारे में

संपर्क करें

सदस्य बनें

अपना ई- मेल देखें

 जी-मेल

 हाट-मेल

 याहू-मेल

 रेडीफ-मेल

 सिफी-मेल

हिन्दी समाचार-पत्र

 अमर उजाला

 जागरण

 भाष्कर

 नवभारत टाइम्स

 प्रभासाक्षी

 सहारा समय

 बी.बी.सी हिन्दी

 घर बचओ- देश बचाओ अभियान

 

 गतिविधि

छठा अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव

हिन्दी का उत्सवी विमर्श

नरेश शांडिल्य

 

विश्व में प्रतिवर्ष होने वाला हिन्दी का यह सबसे बड़ा अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव देश-विदेश में चर्चा का विषय बना है। उत्सव में बड़ी संख्या में प्रवासी साहित्यकारों, हिन्दी सेवियों, हिन्दी के विदेशी विद्वानों की सक्रिय भागीदारी से इसका अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप सामने आता है जो कि वैश्विक स्तर पर हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के प्रयासों को निरन्तर पुष्ट कर रहा है।

 

हिन्दी में अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों के बढ़ते प्रयोग और समन्वय से हिन्दी और अधिक समृध्द होगी... हिन्दी के संबंध में जो भी अभियान चलाया जाना है वह गैर सरकारी संस्थाओं की पहल से ही संभव हो सकेगा... हिन्दी के बढ़ते आयामों और वैश्विक प्रभाव को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि हिन्दी अब सही मायनों में विश्व भाषा बन गई है...' भारत के गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल की इस उद्धोषण के साथ अक्षरम् का छठा अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव प्रारंभ हुआ। वैश्विक हिन्दी विमर्श और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजा-धजा यह त्रिदिवसीय हिन्दी उत्सव 1 से 3 फरवरी, 2008 को नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और हिन्दी भवन में भव्यता और गरिमा के साथ चला। विश्व में प्रतिवर्ष होने वाला हिन्दी का यह सबसे बड़ा अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव देश-विदेश में चर्चा का विषय बना है। उत्सव में बड़ी संख्या में प्रवासी साहित्यकारों, हिन्दी सेवियों, हिन्दी के विदेशी विद्वानों की सक्रिय भागीदारी से इसका अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप सामने आता है जो कि वैश्विक स्तर पर हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के प्रयासों को निरन्तर पुष्ट कर रहा है। इस उत्सव को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, साहित्य अकादमी और उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान का विशेष सहयोग तो प्राप्त हुआ ही साथ ही अन्यान्य व्यक्तियों, संस्थानों और न्यासों ने भी हिन्दी के इस महायज्ञ में अक्षरम् को यथासंभव सहयोग-सहायता प्रदान की है।

भाषाई समन्वय विषय पर आयोजित उद्धाटन सत्र में विचार रखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार कन्हैयालाल नंदन ने कहा कि हिन्दी और उर्दू के बीच की खाई में हाल के वर्षों में काफी कमी आई है और इस दिशा में हिन्दी प्रेमियों को और अधिक प्रयास करना चाहिए। अमेरिका के टैक्सास विश्वविद्यालय के प्रो. हरमन वान आल्फन ने विभिन्न देशों के संदर्भ में पिछले 10 वर्षों में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की उपलब्धियों को महत्वपूर्ण मानते हुए भारत से बाहर के देशों में हिन्दी और उर्दू में किसी भी प्रकार के अन्तर की स्थिति से इंकार किया। महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति प्रो. जी. गोपीनाथन ने डॉ. रामविलास शर्मा की हिन्दी जाति की अवधारणा को अस्वीकार करते हुए कहा कि हिन्दी जाति का विस्तार अब उत्तर भारत ही नहीं दक्षिण भारत और गैर हिन्दी क्षेत्रें में भी तेजी से हो रहा है। उत्सव की प्रस्तावना करते हुए उत्सव के मुख्य संयोजक अनिल जोशी ने कहा कि हिन्दी के लिए अब किसी राजनैतिक आन्दोलन की नहीं एक रचनात्मक अभियान की जरुरत है, जिसके लिए समन्वयकारी सोच और प्रयासों की आवश्यकता है ताकि हिन्दी का अत्याधुनिक तकनीक जैसी चीजों से समन्वय हो सके।

उत्सव के पहले दिन वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी मीडिया विषय पर अपना वक्तव्य देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुधीश पचौरी ने कहा कि हिन्दी क्षेत्र को मीडिया ने अंग्रेजी के चश्मे से देखा है जो ठीक नहीं है। साथ ही उन्होंने मीडिया में हो रहे बदलावों का स्वागत भी किया। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने आशंका व्यक्त करते हुए कहा कि आने वाले 20 वर्षों में हिन्दी मीडिया का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका होगा, जबकि माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानन्द मिश्र ने हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के अखबारों में गम्भीर विमर्श के लगभग गायब रहने पर चिन्ता व्यक्त की। अध्यक्षीय व्यक्त्व देते हुए  वेदप्रताप वैदिक ने अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध पूरी ताकत के साथ किए जाने की वकालत की। वरिष्ठ पत्रकार एवं आउटलुक के सम्पादक आलोक मेहता ने वैश्वीकरण की चुनौतियों से निपटने के सूत्र खोजने की जरूरत बताई।

रातनीतिक दलों अथवा विचारधाराओं से परे हिन्दी साहित्य ही हिन्दी समाज का वास्तविक प्रतिपक्ष हैं यह बात अंतरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव के दूसरे दिन आयोजित 'रचना संसार' सत्र के दौरान प्रख्यात आलोचक अशोक वाजपयी ने कही। इस अवसर पर ब्रिटेन से आए प्रवासी साहित्यकार श्री सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि प्रवासी लेखकों की पीड़ा भारत के लेखकों से भिन्न है और इंग्लैंड के प्रवासियों ने इस दिशा में शून्य से शुरूआत की है। हिन्दी और प्रौद्योगिकी विषय पर आयोजित तीसरे सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. अशोक चक्रधर ने कहा कि आशा और निराशा के बीच में हिन्दी अपने विकास के लिए फड़फड़ा रही है और ज्ञान का सृजन भाषा प्रौद्योगिकी के सहयोग से होगा। हिन्दी गजल और दोहा विषय पर आयोजित दूसरे सत्र में प्रख्यात गजलकार कुंअर बेचैन ने कहा कि चीजें अच्छी भी बनती हैं और बुरी भी किन्तु परिपक्वता ही रचना को कालजयी बनाती है। सम्मेलन के दौरान आयोजित कवि गोष्ठी में देश-विदेश से लगभग 30  कवि-कवयित्रियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। 'बोलियों ने ही हिन्दी को समृध्द किया है और बोलियों को समृध्द करना हिन्दी को ही समृध्द करना है' यह बात 'देश में हिन्दी' विषय पर आयोजित सत्र के दौरान प्रभाकर श्रोत्रिय ने कही। इस सत्र में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक प्रो. शम्भूनाथ ने हिन्दी शिक्षण को आधुनिक बनाने पर बल देते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक की सहायता से ही हिन्दी से संबंधित धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकता है। अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव 2008 के अन्तर्गत प्रख्यात बाल साहित्यकार और अपने समय की बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका 'पराग' के संपादक डा. हरिकृष्ण देवसरे की अध्यक्षता में 3 फरवरी को अपराह्न 2 बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कांप्रफेंस रूम में 'वैश्विक प्रभाव और हिन्दी बाल साहित्य' विषय पर एक अकादमिक सत्र का आयोजन किया गया।

सम्मान अर्पण समारोह एवं कवि सम्मेलन तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव के समापन समारोह में देश-विदेश के हिन्दी के विविध क्षेत्रें के 18 विद्वानों जिनमें डा कैलाश वाजपेयी को अक्षरम् साहित्य शिखर सम्मान, राहुल देव को अक्षरम् मीडिया शिखर सम्मान, महामहिम मुकेश्वर चुन्नी (मॉरीशस) को अक्षरम् प्रवासी शिखर सम्मान, अरविन्द कुमार को अक्षरम् विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान, दाऊजी गुप्त को अक्षरम् हिन्दी सेतु सम्मान, डा. गोविन्द व्यास को अक्षरम् वाचिक परम्परा सम्मान, पंकज जैन (वेब-दुनिया, सी.ओ.ओ.) को अक्षरम् हिन्दी प्रौद्योगिकी सम्मान, विश्वनाथ को अक्षरम् हिन्दी प्रकाशन सम्मान, गिरिराज शरण अग्रवाल को अक्षरम् हिन्दी सेवा सम्मान, मीना अग्रवाल को अक्षरम् हिन्दी सेवा सम्मान, जगदीश मित्तल को अक्षरम् हिन्दी सेवा सम्मान, डा.नरेन्द्र व्यास को अक्षरम् विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान, जिलियन राइट (ब्रिटेन) को अक्षरम् अनुवाद सम्मान, भूदेव शर्मा (अमेरीका) को अक्षरम् विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान, प्रो. हरमन वान आलफन (अमेरीका) को अक्षरम् हिन्दी शिक्षण सम्मान, बी.एम. गुप्ता (ब्रिटेन) को अक्षरम् संस्कृति सम्मान, महेन्द्र वर्मा (ब्रिटेन) को अक्षरम् प्रवासी हिन्दी शिक्षण सम्मान, उषा वर्मा (ब्रिटेन) को अक्षरम् प्रवासी साहित्य सम्मान, गंगाधर जसवानी (दुबई) को अक्षरम् हिन्दी सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया।

सम्मेलन के दौरान ही अनिल जोशी ने सातवें अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव के 26, 27, 28 दिसंबर 2008 के आयोजन की घोषणा की और उपस्थित विद्वानों एवं आयोजन से जुड़े सदस्यों का धन्यवाद ज्ञापन किया। वैश्विक-हिन्दी विमर्श से जुड़े भिन्न-भिन्न विषयों पर केन्द्रित 15 अकादमिक सत्रें में गंभीर विचार-मंथन के साथ-साथ हमेशा की तरह इस बार भी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव में सायंकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के कारण ही इस भव्य आयोजन को एक उत्सवी रूप मिला। पहली बार एक रंगारंग 'संगीत संध्या' का आयोजन भी किया जिसमें देश-विदेश के प्रतिष्ठित व नवोदित रचनाकारों की रचनाओं का गायन किया गया। उत्सव के पहले दिन प्रतिष्ठित नाटय संस्था 'अस्मिता थिएटर ग्रुप' द्वारा तैयार नाटक 'कोर्ट मार्शल' का प्रदर्शन किया गया। उत्सव के दूसरे दिन एक शानदार और रंगारंग 'संगीत संध्या' का आयोजन किया गया। इसमें देश-विदेश के प्रतिष्ठित हिन्दी कवियों-गजलकारों की प्रसिध्द रचनाओं की शर्मा बहनों द्वारा संगीतमय प्रस्तुति ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। लगा कि मानो मंच पर साक्षात संगीत की 'त्रिधारा' आन मिली तो- माधुरी शर्मा, कीर्ति शर्मा और विधि शर्मा के रूप में संगीत की 'गंगा-यमुना-सरस्वती' का यह अनूठा संगम एक आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति करा रहा था। अक्षरम् के चर्चित और प्रतिष्ठित अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन में इस बार देश-विदेश के जाने-माने मंचीय कवियों को ही आमंत्रित किया गया था। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता देश के प्रख्यात गीतकार गजलकार बालस्वरूप राही ने की।

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन