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आवरण कथा |
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गांव-गांव से उठे सूचना की मांग |
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भारतीय पक्ष
ब्यूरो |
प्रेमचंद ने भारत की पारंपरिक पंचायत
व्यवस्था का जो चित्र अपनी कहानी पंच परमेश्वर में
उकेरा था,
वह आज लुप्तप्राय हो चुकी है। वह
दिन बीत गए जब पंच स्वयं को परमेश्वर का रूप मानते
थे और सभी प्रकार के स्वार्थ से ऊपर उठकर न्याय के
हित में काम करते थे। आजकल के सरपंच,
मुखिया या ग्रामप्रधान को गांव
वाले आपसी सहमति से नहीं बनाते बल्कि सरकार चुनाव
करवा कर उन्हें नियुक्त करती है। चुनाव जनित जो
बीमारियां हमें राष्ट्रीय स्तर पर दिखायी देती हैं,
उसकी पूरी झांकी आपको गांवों में
भी देखने को मिल जाएगी। चुनाव जीतने के लिए जाति और
धर्म की विभाजक गणित तथा पैसे और ताकत का प्रयोग
ग्राम प्रधान के चुनाव में आम बात हो गयी है। अब जो
लोग ग्राम प्रधान या मुखिया का चुनाव लड़ते हैं उनकी
नजर गांव के विकास की बजाय अपने विकास पर अधिक रहती
है। पंचायतों को विभिन्न सरकारी योजनाओं के जरिए जो
पैसा मिल रहा है, उसे
हड़पने के लिए वे लालायित रहते हैं। चुनाव जीतने के
बाद वे सरकार से मिले पैसे से जो थोड़ा-बहुत काम करा
देते हैं,
गांवों की भोली-भाली जनता उसी से खुश
रहती है। उसे मालूम ही नहीं रहता कि विभिन्न सरकारी
योजनाओं के जरिए कितना पैसा गांव की पंचायत को मिल
रहा है।
पंचायतों को मिल रहे पैसे का
दुरुपयोग न हो,
मुखिया उसे अपनी निजी आय के तौर
पर इस्तेमाल न करे,
इसके लिए सरकार
ने काफी बंदोबस्त किया है। सरकार ने इसके लिए
अधिकारियों की एक लंबी-चौड़ी फौज तैनात कर रखी है।
लेकिन देखने में आया है कि यही अधिकारी गांव के
मुखिया को भ्रष्टाचार करने और पंचायत के पैसे को
हड़पने का प्रशिक्षण देते हैं। स्वाभाविक है यह सब वे
मुखिया से किसी लगाव के कारण नहीं करते। वे सब इसलिए
करते हैं ताकि पंचायत के पैसे की जो लूट-खसोट हो
उसमें उन्हें भी अच्छा-खासा हिस्सा मिल सके।
अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि
वर्तमान व्यवस्था के तहत गांव के मुखिया को पंचायती
राज का झंडाबरदार नहीं बनाया जा सकता। पूरी पंचायती
व्यवस्था में सख्त सुधार की जरूरत है। पंचायतों को
मिले पैसे और ताकत का इस्तेमाल किस प्रकार गांव के
सभी लाोगों की सहमति से हो,
इसके और तरीके ढूंढने की जरूरत है। मुखिया की
तानाशाही से गांवों का भला नहीं होने वाला है।
पंचायती राज व्यवस्था को ठीक करने के लिए अन्य
उपायों के साथ-साथ सूचना के अधिकार के कानून का भी
प्रभावी उपयोग हो सकता है। सूचना मांगने से आतंकित
होकर जिस प्रकार आजमगढ़ में दो ग्रामीणों को ग्राम
प्रधान और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर जेल में ठूंस
दिया,
उससे इस कानून की ताकत का अंदाजा
लगाया जा सकता है। स्थानीय प्रशासन की प्रतिक्रिया
दर्शाती है कि वे इस कानून से कितने भयभीत हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि हर गांव
में लोग सूचना मांगने के लिए आगे आएं। यह एक तरह से
आजादी की नयी जंग होगी। जिस प्रकार अंग्रेजों से देश
को आजाद कराने के लिए हमारे बुजुर्गों ने तमाम
अत्याचार सहे,
वैसा ही अगर सूचना मांगने के
दौरान आज फिर घटित हो तो लोग उसके लिए तैयार रहें।
प्रशासन द्वारा सूचना मांगने वालों के खिलाफ जो कुछ
किया जा रहा है,
उसे लगातार करते रहना उनके बस की बात
नहीं। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों का साथ
देने के लिए आज समाज में बहुत से लोग तैयार बैठे
हैं। जरूरत बस इस बात की है कि आम जनता अपनी लड़ाई
लड़ने के लिए खुद आगे आए। वह किसी नेता या तारणहार की
उम्मीद में हाथ पर हाथ रखकर न बैठे।
गांवों में सूचना के
अधिकार का प्रयोग करने में उन लोगों की महत्वपूर्ण
भूमिका हो सकती है जो गांवों में पढ़-लिखकर अब शहरों
में महत्वपूर्ण स्थानों पर हैं। उनकी जिम्मेदारी
बनती है कि वे अपने गांव के लोगों को सूचना के
अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करें।
और साथ ही प्रशासन की ओर से यदि कोई ज्यादती हो तो
उनके साथ खड़े रहें। यदि गांव-गांव में लोग सूचना के
अधिकार का इस्तेमाल करना शुरू कर दें तो गांवों में
पंचायती राज का आदर्श रूप दिखायी देने लगेगा। गांव
का मुखिया बनने के लिए वही लोग सामने आएंगे जिनके मन
में गांव के विकास के लिए कुछ करने की इच्छा है।
हमारे लोकतंत्र की शुरुआती सीढ़ी के रूप में
मान्यताप्राप्त पंचायतों में यदि ऐसा हो गया तो इसके
शुभ परिणाम हमें प्रदेश और देश की राजनीति में भी
देखने को मिल सकते हैं। |