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आवरण कथा |
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एकता और अखंडता क्या केवल कहने की चीज है |
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हिमांशु शेखर |
गरीब लोग अगर कहीं दो जून की रोटी
कमाने जाएं और वहां से भी उन्हें भगाया जाए तो उनके
पास विकल्प कम ही बचते हैं। ऐसे में पहले से ही देश
के लिए नासूर बने नक्सलवाद को बल मिल सकता है। ये
लोग हथियार उठा सकते हैं और फिर उसके भयावह नतीजों
का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
जब देश आजाद हुआ था तो उस वक्त
प्रबुध्द समझे जाने वाले कई लोगों ने यह घोषणा की थी
कि विविधताओं के इस देश का बिखरना तय है। सीधे तौर
पर देखें तो आज उनकी बात असत्य मालूम पड़ती है। पर
अगर गहराई में जाकर समझा जाए तो यह समझने में देर
नहीं लगती है कि भले ही देश ना टूटा हो लेकिन धर्म,
जाति आदि के नाम पर समाज बंटा
जरूर है।
सियासतदान
समय-समय पर धर्म, जाति के
नाम पर लोगों को बांटकर राजनीति की रोटी सेंकते रहे
हैं। फिरकापरस्ती के लिए अब भाषा और क्षेत्र को भी
हथियार बनाया जा रहा है। हाल ही में राज ठाकरे के
इशारे पर देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाली मुंबई
में मराठी अस्मिता के नाम पर उपद्रव मचाया गया। असम
में दर्जनों हिन्दी भाषी मजदूरों की हत्या भी
क्षेत्रीयता के नाम पर ही की गई थी। दिल्ली की
मुख्यमंत्री और यहां के उपराज्यपाल को भी बिहारियों
और उत्तर प्रदेश वालों का देश की राजधानी में रहना
नहीं सुहाता है। दक्षिण भारत में क्षेत्रवाद का
इतिहास काफी पुराना है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी
है कि क्षेत्रवाद की इस आंधी में राष्ट्रवाद का क्या
होगा?
मन में यह शंका भी पैदा होती है कि
विविधताओं को खुद में समेटने वाला यह देश बिखराव की
राह तो नहीं चल पड़ा है।
खैर,
चाहे जो भी हो,
एक बात तो तय है कि क्षेत्रीय
अस्मिता के नाम पर हिंसा फैलाने से समाज पर
नकारात्मक असर ही पड़ेगा। समाजशास्त्री एहसानुल हक के
मुताबिक मुंबई में और देश के अन्य भागों में
क्षेत्रवाद के नाम पर हिंसात्मक गतिविधियों का अंजाम
दिया जाना समाज के लिए काफी खतरनाक है। दूसरी तरफ
समाजशास्त्री अनूप बैनिवाल कहते हैं, 'मुंबई
जैसी घटनाओं का बढ़ना राष्ट्र की अवधारणा पर एक
प्रश्न चिन्ह है।'
हालांकि,
नफरत का इतिहास तो काफी पुराना
है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि पिछले कुछ सालों
से आखिर इस तरह की गतिविधियों में तेजी से वृध्दि
क्यों होती जा रही है। यह मानने में तो किसी को भी
एतराज नहीं होना चाहिए कि पहला कारण तो सियासी है।
वोट बैंक की राजनीति में नेता किसी भी हद को पार
करने पर आमादा हैं। इसीलिए मुंबई में हिंसा भड़काने
वाले राज ठाकरे को तो पहले गिरफ्तार ही नहीं किया
गया। जब दबाव बढ़ता गया तो घंटे भर के लिए गिरफ्तार
करके खानापूर्ति कर दी गई। समाजशास्त्री अनूप
बैनिवाल क्षेत्रवाद की वृध्दि के पीछे एक अलग कारण
बताते हैं। वे कहते हैं, 'भारतीय
राष्ट्र का स्वरूप कैसा हो,
यह अभी तक स्थापित नहीं हो पाया
है। हर पार्टी अपने-अपने हिसाब से राष्ट्र को
परिभाषित करती है। इसी कारण सारी समस्याएं पैदा हो
रही हैं।'
भाषा और क्षेत्र के नाम पर बढ़ने वाली
हिंसा से सामाजिक संतुलन का बिगड़ना भी स्वाभाविक है।
इससे क्षेत्रवाद और जातिवाद फैलेगा। समाज खांचों में
बंटने लगेगा। माइक्रो लेवल की चीजों को बढ़ावा देने
से क्षेत्रीय असंतुलन भी बढेग़ा। इससे एक बात तो
स्पष्ट हो जाती है कि जिनकी भलाई के नाम पर हिंसा की
जा रही है,
उनकी हालत पर भी नकारात्मक असर
ही पड़ने वाला है। मुबई की हिंसा हो,
चाहे असम की,
सब जगह पिछड़े लोगों को ही निशाना
बनाया गया। संपन्न लोगों पर कोई भी हाथ नहीं डाल
पाया। कुछ भोजपुरी फिल्मों का निर्देशन कर चुके और
मुंबई में रहने वाले बीरेन पासवान कहते हैं,
'मुंबई में निशाना टैक्सी चलाने
वालों, खोमचा लगाने वालों
और मजदूरी करने वालों को ही बनाया गया। उच्च वर्ग को
तो छोड़ ही दीजिए यहां तक कि मध्यम वर्ग के उत्तर
भारतीयों को भी कोई छू नहीं पाया।'
इससे एक बात तो
तय है कि क्षेत्र और भाषा के नाम पर हिंसा फैलने से
पिछड़ा तबका और असहाय होता जाएगा। इससे उसकी स्थिति
और चिंताजनक हो जाएगी।
इस तबके के असहाय
होते जाने से देश की समस्याओं में कई तरह से बढ़ोतरी
हो सकती है। ये ऐसे लोग हैं जिनके पास रोजी और रोटी
का संकट है। ये अपने मेहनत के बल पर अगर कहीं दो जून
की रोटी कमाने जाएं और वहां से भी उन्हें भगाया जाए
तो उनके पास विकल्प कम ही बचते हैं। ऐसे में पहले से
ही देश के लिए नासूर बने नक्सलवाद को बल मिल सकता
है। ये लोग हथियार उठा सकते हैं और फिर उसके भयावह
नतीजों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
असम में तो क्षेत्रीयता के नाम पर
काफी हिंसा हुई थी। इसकी चपेट में पूरा उत्तर पूर्व
ही आ गया था,
वहां इसका शिकार तो मजदूर वर्ग
ही हुआ। लेकिन संपन्न लोगों को भी वहां से भागने पर
बाध्य कर दिया गया। दूरदर्शन में काम करने वाले किशन
भारद्वाज को भी हिन्दी भाषी होने के नाते वहां से
नौकरी छोड़कर दिल्ली आना पड़ा था। उन दिनों को याद
करते हुए किशन कहते हैं, 'जगह-जगह
पर पर्चे चिपके होते थे। उन पर लिखा होता था कि
हिन्दी भाषियाें वापस जाओ। हालात इतने बिगड़ गए थे कि
नौकरी छोड़ने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा।'
जब एक खास जगह पर भाषा और
क्षेत्र के नाम पर हिंसा भड़क रही हो तो क्या
पेशेवरों को भी कार्य के दौरान किसी भेदभाव का शिकार
होना पड़ता है। इस सवाल के जवाब में बीरेन पासवान
कहते हैं, 'मुबई में ऐसा
नहीं हुआ। हम फिल्म निर्माण से जुड़े हैं और हमें
मराठियों ने कभी ये नहीं कहा कि आप बिहारी हैं इसलिए
आपके साथ काम नहीं करेंगे।'
दरअसल,
किसी भी चीज को मुद्दा बनाकर अगर
समाज में हिंसा फैलाई जाती है तो इसका राष्ट्रीय
एकता पर बुरा असर पड़ना तय है। समाजशास्त्री एहसानुल
हक के मुताबिक इससे राष्ट्रीय एकता और अखंडता को चोट
पहुंच रही है। वे कहते हैं, 'एक
तो हमारे समाज में काफी विविधताएं पहले से ही मौजूद
हैं। ऐसे में अगर एक खास वर्ग अपनी चीजों को
सर्वोत्तम कहने लगे और उसे दूसरे लोगों को अपनाने के
लिए मजबूर करने के लिए हिंसा का सहारा ले तो राष्ट्र
की एकता और अखंडता को चोट पहुंचना तय है।'
अपने देश में हर छोटे-बड़े मसले पर
राजनेता प्रतिक्रियाओं की झड़ी लगा देते हैं। पर जब
मुंबई में हिंसा हो रही थी तो ज्यादातर नेताओं का
मुंह नहीं खुला। बिहार और उत्तर प्रदेश के नेताओं के
अलावा किसी ने भी कड़े शब्दों में ठाकरे खानदान के
खिलाफ नहीं बोला। सबकी जुबान पर ताला ही लगा रहा।
इसमें भी गंभीर संकेत छुपे हुए हैं। पहली बात तो यह
कि इसमें नेताओं का राजनैतिक स्वार्थ निहित है। इससे
भी ज्यादा चिंताजनक स्थिति की ओर समाजशास्त्री अनूप
बैनिवाल ध्यान आकृष्ट कराते हैं। वे कहते हैं,
'समाज की चेतना कुंद होती जा रही
है। इसी वजह से इतने नाजुक मसले पर भी व्यापक
प्रतिक्रिया नहीं हो रही है।'
आज एक बड़ा प्रश्न यह है कि धर्म,
जाति,
भाषा, क्षेत्र आदि के नाम
पर समाज को बंटने से कैसे रोका जाए?
इस पर एहसाकुल हक कहते हैं,
'सबसे पहले तो हमें एक-दूसरे की
संस्कृति का सम्मान करना सीखना होगा। परिवार में अलग
राय रखने वाले को घर से निकाल नहीं दिया जाता है। यह
सही है कि लोग अपनी क्षेत्रीय संस्कृति को बढ़ावा
दें। इससे सांस्कृतिक समृध्दि बढ़ेगी। लेकिन यह
राष्ट्रीयता की कीमत पर नहीं होना चाहिए।'
समाधान की राह बताते हुए अनूप
बैनिवाल कहते हैं, 'हम
पिछले साठ सालों से अपने राजनैतिक अधिकार को गिरवी
रखे हुए हैं। इस वजह से लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था से
ऊबते जा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि लोगों में
राजनैतिक चेतना का संचार हो। तब ही इन समस्याओं से
निजात पाया जा सकता है।'
महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के
खिलाफ आग उगलने वाले राज ठाकरे का व्यवसाय काफी लंबा
चौड़ा है। वे बहुत बड़े बिल्डर भी हैं। बीरेन पासवान
बताते हैं,
'खुद राज ठाकरे की कंपनियों में
उत्तर भारतीय भरे हुए हैं। उन्हें अपनी कंपनी में
उत्तर भारत के लोगोें को काम देने में एतराज नहीं
है। पर अगर ये लोग दूसरे जगह काम करें तो वे मराठी
अस्मिता का सवाल उठाकर इन्हें खदेड़ने लगते हैं।'
वे आगे बताते हैं, 'यह
भी एक विडंबना ही है कि राज ठाकरे को जमानत के लिए
भी उत्तर भारतीय वकीलों का ही सहारा लेना पड़ता है।
पांच वकीलों की टीम में तीन उत्तर भारत के ही थे।'
एक बात और है कि मराठियों को उनकी
संस्कृति की दुहाई देकर हिंसा को उकसाने वाले ठाकरे
खानदान की कथनी और करनी में काफी भेद है। एक तरफ तो
राज ठाकरे अमिताभ बच्चन के खिलाफ आग उगलते हैं और
दूसरी तरफ बाल ठाकरे अपने पोते का संगीत एलबम अमिताभ
के हाथों रिलीज करवा कर गौरवान्वित महसूस करते हैं।
आखिर ऐसा क्यों?
क्योंकि
बच्चन एक बिकाऊ ब्रांड हैं। ये वही बाल ठाकरे हैं
जिनके इशारे पर शिव सैनिक मुंबई में किसी भी मसले को
संस्कृति से जोड़कर उत्पात मचा देते हैं। वहीं दूसरी
तरफ माइकल जैक्सन की मेजबानी करके बाल ठाकरे की खुशी
छुपाए नहीं छुपती। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि
धर्म और संस्कृति की ठेकेदारी का हक ठाकरे खानदान को
किसने दे दिया। अगर वाकई राज ठाकरे और बाल ठाकरे को
मराठियों की चिंता है तो महाराष्ट्र मे आत्महत्या
करने वाले किसानों के लिए उन्हें कुछ करना चाहिए। पर
वे इस दिशा में अब तक कुछ भी नहीं कर पाए हैं।
बहरहाल,
एक बात तो तय है कि क्षेत्र और
भाषा की ठेकेदारी करने वाले लोग देश में एक नए तरह
के आतंकवाद को जन्म दे रहे हैं। इससे भी
दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि राष्ट्र की एकता और
अखंडता के ये दुश्मन बाहरी नहीं बल्कि अपनी ही माटी
के हैं। क्षेत्र और भाषा के नाम पर समाज को बांटना
भी सांप्रदायिकता ही है। इसका दमन समय रहते करना
होगा,
नहीं तो इन ताकतों का प्रभाव बढ़ता
जाएगा और फिर इसकी आंच से किसी का भी बचना संभव नहीं
होगा।
ईमेल: shekhar.du@gmail.com |