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विविधा |
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देखो अपना देश रेल में |
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उमाशंकर मिश्र |
सलीम और राजू की तरह हजारों मासूम
बच्चे इसी तरह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक चलने
वाली विभिन्न ट्रेनों में सफर करते हैं और अपने तथा
अपने परिजनों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाने का
प्रयास करते हैं।
आठ वर्षीय राजू हर
रोज की तरह उस दिन भी वैशाली एक्सप्रेस में सवार हो
चुका था। लेकिन उसकी यात्र अन्य
मुसाफिरों
की तरह न थी बल्कि वह तो ट्रेन में सफर करने वाले
यात्रियों को कुछ सामान बेचकर दो पैसे कमाने की जुगत
में घर से निकला था। हाल ही में हाजीपुर रेलवे
स्टेशन के निकट ट्रेन में गुटखा और मिनरल वाटर की
बोतलें बेचते समय जब आरपीएफ के कुछ कांस्टेबलों को
राजू ने मुफ्त में गुटखा देने से मना कर दिया तो उसे
चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया गया। इस घटना में
मासूम राजू को अपनी एक टांग गंवानी पड़ी।
इस घटना के करीब एक सप्ताह पूर्व ही
मुगलसराय से करीब
25 किलोमीटर की दूरी पर एक
सीआरपीएफ के जवान ने पेंट्रीकारकर्मी इस्माईल अंसारी
को भी इसी तरह ट्रेन से नीचे फेंक दिया था। हाजीपुर
में ही राजू की तरह चाय बेचने वाले 12
वर्षीय सलीम अंसारी को भी कुछ
समय पूर्व रेलवे पुलिसकर्मियों ने चलती टे्रन से
नीचे फेंक दिया था जिसमें वह अपनी एक टांग गंवा
बैठा था। मुजफ्फरपुर निवासी सलीम के पिता मजदूरी
करते हैं। वह बताते हैं कि पुलिस के लोगों ने जब
उससे ट्रेन में चाय बेचने के एवज में पैसे मांगे और
उसने मना कर दिया तो पुलिस कर्मियों ने जबरन उसके
पास मौजूद 200
रुपये छीन लिए और सलीम को ट्रेन से नीचे फेंक दिया।
सलीम और राजू की तरह
हजारों मासूम बच्चे इसी तरह भारत के एक छोर से दूसरे
छोर तक चलने वाली विभिन्न ट्रेनों में सफर करते हैं
और अपने तथा अपने परिजनों के लिए दो वक्त की रोटी
जुटाने का प्रयास करते हैं। रेलगाड़ियों में फेरी का
काम करने वाले इन बच्चों की जिंदगी के अलग-अलग आयाम
देखने को मिलते हैं। कोई तम्बूरा बजाकर मस्तमौला
जिंदगी का नाटक करता है तो कोई निषेधात्मक चेतावनी
के बावजूद टे्रन में गुटखा एवं सिगरेट बेचने का काम
करता है।
'तू
मेरा शहजादा...मैं तेरी शहजादी...'
कुछ
इसी तरह के गीत भारतीय रेल में सामान्य दर्जे के सफर
में अक्सर सुनने को मिल जाते हैं,
जिन्हें गाने वाले कोई स्टार गायक या कलाकार नहीं,
बल्कि
छोटे-छोटे बच्चे होते हैं। तम्बूरे की तान और सुरों
के संगम के इर्द-गिर्द मेहर अली का जीवन घूमता है।
हाथ में तम्बूरा लेकर मेहर अली तड़के ही अपने काम पर
निकल पड़ता है। मेहर के
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भाई भी
हैं,
जो
पेशे से फकीर हैं,
जबकि
पिता राशि के नग बेचकर दूसरों की किस्मत संवारने का
काम करते हैं। दूसरी ओर बच्चों में कोई तम्बूरा
बजाता है तो कोई फकीर सी बेफिक्री की जिंदगी जीना
चाहता है। लेकिन यह सब केवल बेफिक्री एवं मस्तमौलेपन
के लिए हो,
ऐसा
नहीं है। यह सब कमाई का एक जरिया भी है। लोढ़ापाल
गांव,
उमरिया
जिला,
मध्यप्रदेश के रहने वाले मेहर को अपनी उम्र तक नहीं
मालूम है। उसे सिर्फ इतना पता है कि जब वह काफी छोटा
था तभी से इस सफर की शुरुआत हो गई थी। वह बताता है
कि पहले वह खट-पट दो चपटे प्त्थरों का वाद्य-यंत्र
बजाता था लेकिन अब वह टिन के डिब्बे में तार बांधकर
बनाए गए तम्बूरे को बजाने का कार्य करता है। वह
बताता है कि तम्बूरा बनाने की कला उसने अन्य लड़कों
को देखकर सीखी है। अनूपपुर जंक्शन से उमरिया रेलवे
स्टेशन के बीच से गुजरने वाली रेलगाड़ियों के बीच
मेहर अली के तम्बूरे की तान सुनी जा सकती है। ऐसा
नहीं है कि इस सफर में मेहर अली अकेला ही होता है।
उसके कुछेक अन्य साथी भी मेहर का हमसफर बनते हैं।
शाम होती है तो हर मां की तरह मेहर की मां भी उसकी
बाट जोहने लगती है। लिहाजा,
मेहर
को इस बात का बखूबी ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं घर
पहुंचने में देर न हो जाए। दिन भर रेलगाड़ियों में
तम्बूरा बजाकर मुसाफिरों को मंत्रमुग्ध कर देने वाले
मेहर की जिंदगी आम बच्चों की तरह नहीं है। शाम को
4-5
बजे घर वापस पहुंचकर उसे गाने का
रिआज भी करना होता है। ऐसे में खेलने-कूदने का समय
ही कहां बच पाता है। जब उससे पढ़ाई-लिखाई की बात पूछी
जाती है तो मेहर ठिठक सा जाता है। लेकिन वह गर्व से
बताता है कि घर में एक टी.वी. और वी.सी.डी. भी है
जिसकी मदद से वह गाना सीखता है।
अक्सर इस तरह के बच्चों को जब लोग
देखते हैं तो उनकी आंखों में दया-भाव उतर आता है।
लेकिन मेहर अली के लिए तम्बूरा बजाना कोई विवशता
नहीं,
बल्कि कमाई का एक जरिया है। इसी
रूट पर नियमित सफर करने वाले एक रेलयात्री के
मुताबिक इस तरह रेलगाड़ियों में घूम फिर कर ये सारे
भाई दिन भर में करीब एक हजार रुपये तक आसानी से कमा
लेते हैं। ऐसे में पढ़ाई-लिखाई की फिक्र किसे रहती
है। माता-पिता भी बच्चों पर किसी तरह का दबाव नहीं
डालते कि वे आगे पढ़ें और बढ़े,
एक बेहतर इंसान बनें। इसे
प्रोत्साहन एवं प्रेरणा की कमी ही माना जाएगा जिसके
चलते मेहर अली जैसे बच्चे तालीम के साथ-साथ मुकम्मल
इंसान बनने से भी वंचित रह जाते हैं। तकरीबन दस साल
का रोहित भी मेहर अली जैसे बच्चों की जमात का ही एक
हिस्सा है। अनूपपुर,
मध्यप्रदेश के रहने वाले रोहित के दो भाई और भी हैं।
वे भी रोहित की तरह रेलगाड़ियों में खट-पट
बजाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं और ट्रेन के
डिब्बों में झाडू लगाकर शाम तक 80
से 100
रुपये तक कमा
लेते हैं। इस तरह से कुल मिलाकर तीन सौ से चार सौ तक
की कमाई हो जाती है। रोहित के पिता चटाई बुनने का
काम करते हैं। जब रोहित की फोटो लेने का प्रयास किया
गया तो वह यह कहता हुआ भाग गया कि फोटो पेपर में छाप
देंगे।
रोहित और मेहर की तरह रेलगाड़ियों में सफर करने वाला
हर बच्चा शौकिया तौर पर इस तरह के काम करता हो ऐसा
नहीं है। कई बच्चों के सिर पर मां बाप का साया तक
नहीं होता। ऐसे में टेनें ही उनकी जिंदगी का हमसफर
बन जाती हैं और रेलवे स्टेशन आशियाना। मिर्जापुर,
उत्तर प्रदेश का रहने वाला
15 वर्षीय मनोज उन्हीं
बच्चों में से एक है जो अपना एवं परिजनों का पेट
पालने के लिए और जिंदगी की गाड़ी को आगे धकेलने के
लिए रेलगाड़ियों में रोजी-रोटी की तलाश में बेतकल्लुफ
होकर घूमते रहते हैं। यहां बाल मजदूरी के खिलाफ बने
तमाम कायदे-कानून भी बेअसर हो जाते हैं। मनोज कहता
है कि क्या करें भईया पढ़ने का तो मन करता है लेकिन
पिताजी के नहीं रहने पर रेलगाड़ी में गुटखा,
सिगरेट
बेचने निकल पड़ता हूं। जिससे अपने छोटे भाई-बहनों का
पेट भर सकूं। वह कहता है कि कुछ पैसे बच जाते हैं तो
मां के लिए दवाई ले जाता हूं। वो अक्सर बीमार रहती
है।
ट्रेन में एक अलग तरह का सफर करने
वाले इन बच्चों की जिंदगी में झांकने पर इनके जीवन
के कई पहलू सामने आ जाते हैं। ऐसे में सवाल न केवल
बाल मजदूरी से जुड़ा है बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी से
भी जुड़ा है,
जहां इस बात को भुला दिया जाता
है कि कल यही बच्चे देश का भविष्य बनेंगे। अगर ये
बच्चे खुद ही मुकम्मल इंसान नहीं बन सके तो इस बात
की संभावना कहां रह जाती है कि इनकी अगली पीढ़ियां
बेहतर इंसान बन सकेंगी। कोई पैसे कमाने के लिए बचपन
में ही फकीर बन जाएगा, तो
कोई तम्बूरा बजाने निकल पड़ेगा या फिर कोई मजबूरी
उन्हें आंख-मिचौनी का खेल-खेलने वाले कोमल हाथों में
पत्थर तोड़ने का हथौड़ा थमा देगी। इन बच्चों का बचपन
बचाने की जिम्मेदारी माता-पिता की ही नहीं,
स्थानीय प्रशासन,
गैर-सरकारी
संस्थाओं और राज्य सरकारों की भी बनती है। रेल में
सफर करने वाले इन बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी
से रेल प्रशासन भी आंखें नहीं मूंद सकता। अगर ऐसा
नहीं हुआ तो राजू और सलीम जैसे बच्चे रेलगाड़ियों में
रोटी की तलाश में भटकते रहेंगे और उन्हें चलती गाड़ी
से नीचे फेंके जाने की घटनाएं भी घटती रहेंगी।
संपर्क:
406, 49-50
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