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विविधा |
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बिहार में आशा की किरण
बनती सुधा डेयरी |
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नवलेश कुमार |
अमूल की सफलता को काफी हद तक बिहार
में सुधा डेयरी ने दोहरा दिया है। बहुत ही छोटे से
स्तर से
1972 में प्रारंभ
हुए दुग्ध उत्पादक संघ के तत्वावधान में 1983
से यह
सहकारिता के तहत ग्रामीण क्षेत्रें में पहुंचा और
यहीं से इसका विस्तार हुआ। सुधा बिहार में जन-जन में
अपनी उपस्थिति बनाए हुए है। सुधा सहकारिता की एक
मिसाल है।
आजादी के बाद
हिन्दुस्तान में शहरी जनसंख्या तेजी से बढ़ी क्योंकि
गांवों से रोजगार की तलाश में शहर की ओर
पलायन
हुआ। बढ़ती शहरी जनसंख्या के लिए पर्याप्त दूध की
पूर्ति करने में आस-पास के गांव सक्षम नहीं थे। शहरी
जनसंख्या की मांग की पूर्ति के लिए पैकेट वाले दूध
की शुरुआत हुई। इस काम को दुग्ध वितरण के लिए बनी
विभिन्न सहकारी समितियों ने तेजी से आगे बढ़ाया। अमूल
की उपलब्धियों से हम भलीभांति परिचित हैं। इसके आने
के बाद देश में दुग्ध उत्पादन और उससे मिलने वालों
रोजगार में उल्लेखनीय वृध्दि हुयी। गुजरात में तो
इसे साफ तौर पर देखा जा सकता है।
अमूल की सफलता को काफी हद तक बिहार
में सुधा डेयरी ने दोहरा दिया है। बहुत ही छोटे से
स्तर से
1972 में प्रारंभ हुए दुग्ध
उत्पादक संघ के तत्वावधान में 1983
से यह सहकारिता के तहत ग्रामीण
क्षेत्रें में पहुंचा और यहीं से इसका विस्तार हुआ।
सुधा बिहार में जन-जन में अपनी उपस्थिति बनाए हुए
है। सुधा सहकारिता की एक मिसाल है। आज बिहार में
लाखों लोग सुधा से लाभान्वित हो रहे हैं।
1990 से पहले बिहार के ग्रामीणों
की नकद आमदनी का आधार चीनी मिलें थीं। चीनी मिल बन्द
होने के बाद आज सुधा नकदी और रोजगार का सृजन कर रहा
है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रें में,
जहां फसलें प्राय: डूब जाती हैं,
वहां
दुग्ध उत्पादन जीने का आधार है। बिहार की प्राकृतिक
बनावट कुछ ऐसी है कि यहां हर मौसम में जानवरों
के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध रहता है। इस कारण
ग्रामीणों को मवेशियों के लिए चारा जुटाने का
अनावश्क दबाव नहीं रहता है।
पिछले कुछ सालों से बढ़ते हुए
मशीनीकरण के कारण ग्रामीण क्षेत्रें में खेत जोतने
का अधिकांश काम टैक्टरों से लिया जा रहा है। ऐसे में
ग्रामीण जीवन का आधार रहे मवेशी लुप्त होने लगे थे,
लेकिन अब
सुधा डेयरी की बढ़ती सक्रियता से ग्रामीण क्षेत्रें
में एक आशा की किरण दिखने लगी है। लोग अब फिर से गौ
माता की सेवा में लग गए हैं और साथ-ही साथ मुनाफा भी
कमा रहे हैं।
सुधा डेयरी के आने
के पहले इस राज्य के दुग्ध उत्पादकों को
अगस्त-सितम्बर के महीने में दूध का उचित मूल्य नहीं
मिल पाता था। उन्हें अपने दूध को औने-पौने दामों में
बेचने को विवश होना पड़ता था। वहीं मई-जून के महीने
में ग्राहकों
को दूध की पर्याप्त सप्लाई नहीं होने से काफी
परेशानी होती थी। उन्हें अनाप-शनाप मूल्यों पर दूध
खरीदने को बाध्य
होना पड़ता था। लेकिन सुधा डेयरी ने इसे बदल दिया है।
अब सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ की सार्थक पहल से दूध
के भंडारण की व्यवस्था और पर्याप्त मात्र में
उपलब्धता सामान्य सी बात हो गई है।
बिहार,
झारखण्ड,
पूर्वी उत्तर प्रदेश,
बंगाल के कुछ हिस्सों में सुधा
की सक्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। 84
शहरों में फैले इसके
6,000 बिक्री केन्द्रों पर हमेशा
सुधा के उत्पाद उपलब्ध रहते है। गुवाहाटी,
कोलकाता,
वाराणसी,
सिलीगुड़ी जैसी
जगहों पर भी सुधा के सप्लायर्स हैं।
दुग्ध उत्पादक किसान के लिए यह संभव
नहीं है कि वे शहरों
की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए वितरण का भी
प्रबंध कर सके। इसलिए मांग और पूर्ति के बीच की कड़ी
का काम सुधा ने किया है। दुग्ध उत्पादक किसान दूध की
कीमत तय करने में अपनी सहभागिता से खुश हैं। अत्यधिक
उत्पादन की अवस्था में दूध से घी,
आइस-क्रीम,
लस्सी,
मीठी दही,
पेड़ा,
पनीर, कलाकन्द,
रसगुल्ला,
गुलाबजामुन,
मिल्क केक आदि बनते हैं। सभी
उत्पाद 'सुधा'
ब्रान्ड
के नाम से उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं अब आपको सुधा के
आउटलेट्स पर तैयार सब्जियों के पैकेट और फलों के जूस
भी मिल जाएंगे।
मिथिलांचल के गांवों में सुबह-सुबह
सुधा डेयरी के टैंकर का इंतजार करते लोगों
की भीड़ को आसानी से देखा जा सकता है। जब टैंकर आता
है तब ग्रामीणों के दूध की गुणवत्ता की जांच की जाती
है। मधुबनी जिला के घघरडीहा निवासी नितेश कुंवर कहते
हैं,
'हम लोग दूध की उचित कीमत मिल
जाने से काफी सन्तुष्ट हैं। भुगतान में देर नहीं
होती। हर दशवें दिन हमारा भुगतान बैंक ड्राफ्ट से हो
जाता है। उनके व्यवहार में पारदर्शिता है। वे
योजनाबध्द ढंग से काम करते हैं।'
सुधा के बहुत से प्रशिक्षण केन्द्र
भी हैं जहां ग्रामीण नौजवानों एवं महिलाओं को
प्रशिक्षित किया जाता है। महिलाओं
को सहकारी स्वयं सहायता समूहों के तहत ट्टण उपलब्ध
कराया जाता है। उन्हें बचत के लिए प्रोत्साहित किया
जाता है। सितम्बर
2004 तक 550
महिला डेयरी सहकारिता संघों में
लगभग 26,000 महिलाएं
सदस्य थीं। उन्हें कढ़ाई,
बुनाई, लघु व्यापार से
संबंधित जानकारियां भी दी जाती हैं। इससे उनमें
स्वावलंबन की भावना विकसित हुई है। अनुसूचित जाति,
अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्ग
के लोगों को, जो बिहार
स्टेट कोआपरेटिव मिल्क प्रोडयूसर्स फेडरेशन लि. के
सदस्य हैं, उन्हें आसान
किस्तों में पशु, आहार,
दवा आदि के लिए ऋण दिया जाता है,
जिसे वे दूध देकर चुकता करते
हैं। वर्तमान समय में 2,60,000
किसान परिवार इसके सदस्य हैं,
जबकि 2000-2001
में इसके सदस्य मात्र
1,84,000 ही थे। 2003-04
में उत्तर एवं पश्चिम भारत में
दूध के उत्पादन में कमी हुई,
जबकि बिहार में 5
प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
सुधा सहकारी संघ की व्यवस्था पूरी
तरह विकेन्द्रित है। यह गांव स्तर से प्रारंभ होकर
राज्य स्तर तक काम करती है। दुग्ध उत्पादक संघ जिला
स्तर पर दूध की नियमित जांच के साथ-साथ जानवरों की
देखभाल के लिए शिविर लगाने के अलावा किसानों को
प्रशिक्षित भी करता है। डेयरी संघ राज्य स्तर पर
मार्केटिंग की व्यवस्था करता है और अंतरराज्यीय स्तर
पर आउटलेट्स की निगरानी करता है। डेयरी सहकारिता संघ
गांव और टोलों में एक समूह बनाकर उन्हें प्रशिक्षित
करता है। लोगों को बताया जाता है कि वे अपने उत्पादन
का रिकार्ड कैसे रखें तथा कैसे दूध की गुणवत्ता की
जांच करें?
सहकारिता संघ के अध्यक्ष,
सचिव और
खजांची का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से प्रतिवर्ष
होता है। सचिव डेयरी सहकारिता संघ के प्रतिदिन के
कार्यों की निगरानी करता है।
सुधा सहकारिता संघ के निदेशक कहते
हैं,
'हम पूर्वी भारत में 15
बड़े एवं 10 छोटे प्लांट्स
के साथ सबसे बड़े सहकारी संगठन हैं और दूध की
गुणवत्ता में हमारा कोई मुकाबला नहीं। सुधा कोलकाता
एवं दिल्ली के मदर डेयरी से कई मायनों में बेहतर है।'
झारखण्ड में रांची,
जमशेदपुर,
और बोकारो में दूध के 90
प्रतिशत बाजार पर सुधा का कब्जा
है। वहीं नन्द और श्याम डेयरी मिलकर मात्र
5,000 लीटर दूध का ही प्रतिदिन
व्यापार करते हैं। जबकि सुधा की बिक्री
50,000 लीटर से अधिक है। सुधा
डेयरी के रांची यूनिट के मैनेजर मिल्टन कहते हैं,
'सुधा डेयरी मुनाफा कमाने नहीं
आई है। यह सहकारी संस्था है। इसका उद्देश्य ग्राम
वासियों का हित है।'
गांव के निम्न वर्ग के किसान व
खेतिहर मजदूर,
जो दो-तीन मवेशी पाल सकते हैं,
उन्हें
सुधा डेयरी नकद आय प्राप्त करने का एक सुलभ साधन
उपलब्ध कराती है। सुधा सहकारीता संघ की सफलता से सीख
लेकर अन्य राज्य भी अपने यहां ऐसी पहल कर सकते हैं।
संपर्क:
ए-426,
डी.डी.ए. कालोनी,
चौखण्डी,
तिलक नगर नई दिल्ली-110018 |