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 मार्च,  2008

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कर्ण: अपने समय का तेजस्वी महापुरुष

सूर्यकांत बाली

कर्ण बोले तो क्या इसे उनकी ईमानदारी न माना जाए कि जहां भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र चुप रहे, वहां विदुर और कर्ण ही दो ऐसे प्राणी हैं, जिन्होंने जो सोचा, वह बोला तो क्या हम कर्ण को इसीलिए विदुर से कम अंक दें कि उन्होंने वह क्यों नहीं बोला जो विदुर ने बोला?

 

इस एक बात को छोड़ दें कि कर्ण ने जुए के बाद धृतराष्ट्र की राजसभा में द्रौपदी को अपमानजनक शब्द कहे, उनके चरित्र में क्या कोई और ऐसा दोष ढूंढ पाना सम्भव है, जिससे कर्ण के खाते में बदनामी और अपयश की राशि जमा कराई जा सके? ऐसा आसान नहीं, बल्कि महाभारतकार के सामने कर्ण का चरित्र एक चुनौती बनकर आया है कि जिसके चित्रण के लिए उसे बार-बार अतिमानवीय और अलौकिक कथाओं का सहारा लेना पड़ा है। धृतराष्ट्र की राजसभा में कर्ण द्वारा द्रौपदी का हुआ अपमान निश्चित ही एक धब्बे की तरह कर्ण के अन्यथा उज्ज्वल जीवन चरित्र में हमारे सामने आता है। पर क्या इस धब्बे को भी हम अतिरंजित रंगों में दिखा सकते हैं?

महाभारत का युग विलक्षण तनावों से भरा है और उसी मनोभाव में हर कोई मित्रें को वरदान और शत्रुओं को अभिशाप दे रहा है, संकल्प उठा रहा है और प्रतिज्ञाएं धारण कर रहा है। पर अगर हम-आप चाहते हैं कि कर्ण इस तमाम तनाव-मूर्छा से मुक्त, सदा सन्तुलित और प्रफुल्लित नजर आएं तो क्या कर्ण से हम अन्याय नहीं कर रहे होंगे? धृतराष्ट्र की जिस राजसभा में जुआ खेला गया, पाण्डवों की पराजय के बाद जहां द्रौपदी का अपमान हुआ, जहां स्वयं धृतराष्ट्र चुप रहे, आचार्य द्रोण चुप रहे, पितामह भीष्म तक चुप रहे, वहां हम उम्मीद अगर यह रखें कि कर्ण बोलते और द्रौपदी के पक्ष में बोलते तो क्या यह कर्ण से जरूरत से ज्यादा अपेक्षा नहीं है? कर्ण बोले तो क्या इसे उनकी ईमानदारी न माना जाए कि जहां भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र चुप रहे, वहां विदुर और कर्ण ही दो ऐसे प्राणी हैं, जिन्होंने जो सोचा, वह बोला तो क्या हम कर्ण को इसीलिए विदुर से कम अंक दें कि उन्होंने वह क्यों नहीं बोला जो विदुर ने बोला? कर्ण ने जो बोला वह शायद हमारी आज की सामाजिक मान्यताओं पर बहुत खरा न उतरता हो। पर जो भी वे बोले, वह एक ऐसे व्यक्तित्व के उद्गार ही निश्चित रूप से थे, जिसको जीवन में निरन्तर अपमान और तिरस्कार मिला, जिसका पात्र वह यकीनन नहीं था।

कर्ण को जीवन में सिर्फ एक ही सकारात्मक उपलब्धि हुई- दुर्योधन से मिली सच्ची दोस्ती। अब यह मत कहिए कि क्यों कर्ण ने दुर्योधन को मित्र बनाया। कल्पना करिए, अगर कर्ण भी अर्जुन की तरह कृष्ण के सखा होते तो क्या उनके वे सभी गुण पूरी ऊर्जा और प्रतिभा के साथ प्रस्फुटित न होते, जो वे दुर्योधन जैसे अहंकारी शासक का मित्र बनने के बाद नकारात्मक तरीके से अभिव्यक्त हुए? पर अगर कर्ण को कृष्ण सरीखा सखा नहीं मिला तो इसमें कर्ण का क्या दोष? आप कर्ण का सारा जीवन पढ़ जाइए, हमेशा श्रेष्ठत्व को प्राप्त करने की उनकी लालसा और उसके लिए उनके प्रयास अभूतपूर्व हैं। घटनाचक्र गवाह है कि कर्ण और अर्जुन की तुलना की जाए (वैसे तो तुलना हास्यास्पद है) तो कर्ण अपनी चारित्रिक विराटता के कारण अर्जुन को मीलों पीछे छोड़ देते हैं। द्रौपदी के अपमान की घटना फिर से अपवाद है, अन्यथा कर्ण के चरित्र को पाण्डवों और कौरवों में सर्वश्रेष्ठ कहा जा सकता है। द्रोण से जाकर शस्त्र विद्या सीखने का कर्ण का निश्चय धनुर्धारी के रूप में उनकी महत्वाकांक्षा का प्रतीक है। कौरव-पाण्डवों को द्रोण की गुरु के रूप में प्राप्ति भीष्म के कारण हुई। कर्ण ने द्रोण को स्वयं चुना और उन्हें गुरु स्वीकार किया, पर जब शस्त्र परीक्षा का मौका आया, जब कर्ण सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का खिताब पाने के लिए अर्जुन को सफलतापूर्वक चुनौती दे सकते थे, उन्हें सूतपूत्र कहकर प्रतिर्स्पधा से बाहर कर दिया गया। द्रोण ने अश्वत्थामा और अर्जुन के लिए पक्षपात करते हुए कर्ण को ब्रह्मास्त्र नहीं सिखाया। विवश कर्ण जब ब्रह्मास्त्र सीखने परशुराम के पास गए तो जल्दी ही यह पता लग जाने पर कि ये ब्राह्मण नहीं है, परशुराम ने, जिनकी प्रतिज्ञा सिर्पफ ब्राह्मणों को धनुर्विद्या सिखाने की थी, कर्ण को अपने आश्रम से निकाल दिया। बल्कि झूठमूठ का ब्राह्मण बनकर आने का आरोप लगाकर कर्ण को शाप अलग दे दिया। द्रौपदी के स्वंयवर का मौका आया तो क्या कर्ण जैसे धनुर्धर के लिए मछली की आंख फोड़कर द्रौपदी को पा लेना कठिन था? पर उसे सूतपुत्र कहकर द्रौपदी ने स्वयंवर से बाहर कर बेशक अपने अधिकार का उपयोग किया, पर कर्ण का अकारण अपमान तो हुआ ही। सब ओर से निन्दित, प्रताड़ित और तिरस्कृत कर्ण अगर विवश होकर दुर्योधन की दोस्ती (नोट करिए, सच्ची दोस्ती) की गलत संगति आदि के कुचक्र में फंस गए तो भी आप इसका सारा दोष कर्ण को देना चाहेंगे, कुन्ती को नहीं, जिसने स्वयं को कुमारी साबित करने के सामाजिक मानदण्ड पर खरा उतरे रहने के लिए अपनी विवाहपूर्ण सन्तान कर्ण को नदी में (सुरक्षित) बहा दिया?

सब ओर से तिरस्कृत, पर अपने समय के अघोषित सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के चरित्र की कुछ दूसरी विशेषताएं तो देखिए। कर्ण इतने तेजस्वी थे कि उन्हें सूर्यपुत्र से कम मान पाना किसी के लिए सम्भव ही नहीं हो पा रहा था। यदि सूर्य नक्षत्र मण्डल के स्वामी हैं और उनकी तेजस्विता को प्रमाणित करने की जरूरत नहीं है तो कर्ण को सूर्य की सन्तान मानने के निहितार्थों को समझना कठिन नहीं। वे जीवन में कई बार भयानक रूप से अपमानित हुए- द्रोण द्वारा ब्रह्मास्त्र सिखाने से मना कर देने पर, परशुराम द्वारा निष्कासित और अभिशप्त कर देने पर, शस्त्र प्रतिस्पध्र्दा और द्रौपदी स्वयंवर से बाहर निकाल दिए जाने पर और भीष्म द्वारा अपने सेनापतित्व के समय युध्द में शामिल न होने देने पर। पर हर बार कर्ण का उद्वेग उनके काबू में रहा, उनका सन्तुलन नहीं बिगड़ा और वे जीवन से भाग नहीं खड़े हुए। ऐसे तेजस्वी व्यक्ति को सूर्यपूत्र के अलावा और कुछ कह पाना मुमकिन ही नहीं था।

कहते हैं कि कर्ण को जन्म के समय ही कवच मिले हुए थे, जो उनके शरीर में अन्तर्निहित थे। इस कारण कर्ण युध्द हार कर भी अजेय बने रह सकते थे, क्योंकि उनके शरीर पर अस्त्र का प्रहार कोई खास असर डालता ही नहीं था। इसका अर्थ क्या है? हम नहीं जानते। पर सूर्यपुत्र को यह वरदान था। जहां अन्य योध्दा अपने शरीर की रक्षा के लिए कवच पहनते थे, वहां कर्ण के शरीर में वे पहने-पहनाए थे, शरीर की चमड़ी की तरह। कृष्ण जानते थे कि जब तक उन कवचों को कर्ण के शरीर से अलग नहीं किया जाएगा, कर्ण मारे नहीं जा सकते। इसलिए अर्जुन के पिता इन्द्र को ब्राह्मण का वेश बनाकर कर्ण के पास भेजा गया। ब्राह्मण इन्द्र ने पहले दान की प्रतिज्ञा कर्ण से करवा ली। फिर दान में कवच मांग लिए। कर्ण मूर्ख नहीं थे कि इस तरह के दान के पीछे के षडयन्त्र को न पहचानते हों। उन्हें बताया भी गया कि यह चालाकी क्यों की जा रही थी, पर अपने को सम्भावित मृत्यु के हवाले करने का दुस्साहस करके भी कर्ण ने कवच दे दिए। इसे क्या कहेंगे? क्या हस्तिनापुर के किसी भी पात्र ने ऐसा बलिदान किया? शायद हम भीष्म को याद करना चाहें, जिन्होंने पिता की खातिर विवाह न करने की प्रतिज्ञा की थी। अन्यथा क्या कर्ण अद्वितीय नहीं?

कर्ण की अद्वितीयता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण तो वह दिलासा है, जो कर्ण ने कुन्ती को दिया और उसे पूरा भी किया। महाभारत युध्द से पहले कृष्ण ने कर्ण को बता दिया था कि कुन्ती ही उसकी मां है और पाण्डव उसके भाई हैं। यदि कर्ण दुर्योधन को छोड़ पाण्डवों के पक्ष में आ जाएं तो वे हस्तिनापुर नरेश बनेंगे और उनके पांचों पाण्डव भाई उनकी सेवकाई करेंगे। अगर कर्ण के चरित्र की महानता का सही अन्दाज लेना हो, युध्द में कौरव हारेंगे यह समझते हुए भी दुर्योधन का साथ न छोड़ने की बात कहने वाले कर्ण की विलक्षणता का ग्राफ समझना हो तो कृपया महाभारत के उद्योग पर्व के चार अध्याय (140-143) पढ़िए। इससे भी आगे देखें। कुन्ती को मां के रूप में जान लेने के बाद कैसे कर्ण ने, जीवन भर कुन्ती के ही एक काम के कारण मिले तिरस्कारों की शृंखला को भूलकर, उसे मां मानकर प्रतिज्ञा कर ली कि वे अर्जुन को छोड़ शेष चारों पाण्डवों को युध्द में नहीं मारेंगे। (उद्योग पर्व, 146)। तो बताइए, है कोई कर्ण सरीखा दूसरा महापुरुष?

इसलिए, इस महापुरुष को कोसने की नहीं, समझने की जरूरत है। कर्ण हमारे समाज की विडम्बनाओं के जीते-जागते उदाहरण हैं। वे क्षत्रिय थे, पर उनकी प्रसिध्दि सूतपुत्र की हो गई। इससे उन्हें वे तमाम अपमान झेलने पड़े जिन्होंने उनके गुणों को, एक महापुरुष की श्रेष्ठताओं को तरीके से व्यक्त और विकसित नहीं होने दिया। इसलिए पूरे महाभारत-माहौल में कर्ण एक व्यक्ति नहीं, एक प्रश्न बनकर हमारे सामने आते हैं और वह प्रश्न स्वयं कर्ण ने कुन्ती से तब किया, जब कुन्ती ने कहा-'अकरोत् मयि यत् पापं भवती सुमहत्तम, अपकीर्णोस्मि यन्मात: तद् यश: कीर्तिनाशनम्।' मां, आपने मेरे प्रति जो पाप किया, उससे मुझे कितनी तकलीफ हुई है। तुमने मुझे पानी में क्यों पेंफका, मुझे यश और अपकीर्ति के विनाश में ही धकेल दिया (उद्योग पर्व 146.5)। कर्ण का प्रश्न है: मां तुमने ऐसा क्यों किया और अब मैं तुम्हारी बात क्यों मानूं?

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन