|
बांस के अंदर दस आश्चर्य समाहित हैं।
अगर इन्हें आप अच्छे से जान लें तो आपको समझ में आ
जाएगा कि बांस की ताकत क्या है।
मेरी संस्था का नाम है सम्पूर्ण
बैम्बू केन्द्र। आम तौर पर समस्या लेकर संस्थाएं
पैदा होती हैं,
लेकिन हम सामर्थ्य लेकर पैदा हुए
हैx। और इसलिए हमने अपने
लिए काम का जो जरिया चुना है,
वह भी दूसरी संस्थाओं से हटकर
है। हमारी संस्था बांस
पर
काम करती है। यह पूरे देश में बहुत बड़े पैमाने पर
उपलब्ध है। बांस की 136
जातियां हैं। हमने उनके गुणों का अध्ययन किया है और
उसे ही आधार बनाकर अपना काम शुरू किया है। बांस के
अंदर दस आश्चर्य समाहित हैं। अगर इन्हें आप अच्छे से
जान लें तो आपको समझ में आ जाएगा कि बांस की ताकत
क्या है। बांस प्राकृतिक रूप में उपलब्ध एक नली या
पाइप है। विडंबना यह है कि हम विज्ञान के युग में
अविज्ञान से जीते हैं। पूरी दुनिया लोहा गलाकर और
भारी मात्र में ऊर्जा खर्च करके पाइप बनाने के चक्कर
में लगी हुई है। हमारे पास प्राकृतिक रूप से जो पाइप
उपलब्ध है,
उस पर किसी का ध्यान ही नहीं है।
हमारे नीति निर्माताओं को बांस की उपयोगिता केवल
कागज बनाने में ही नजर आती है।
आज हमें यह सोचना होगा कि हम बांस का
अधिक से अधिक कैसे उपयोग कर सकते हैं। विज्ञान के
क्षेत्र में हम क्या काम करें,
यह हमें फिर से टटोल लेना चाहिए।
हमारी संस्था जिस दिशा में काम कर रही है,
यदि उस दिशा में मिलकर काम किया
जाए और बांस के ऊपर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाते
हुए योजना बनायी जाए तो 40
से 50
लाख लोगों को रोजगार मिल सकता है।
हम बांस को न्याय दिलाना चाहते हैं।
हम बांस कारीगर को न्याय दिलाना चाहते हैं और हम
बांस की कारीगरी को न्याय दिलाना चाहते हैं।
दुर्भाग्य से आज बांस को न्याय नहीं मिल रहा है,
क्योंकि
हम उसका इस्तेमाल उसकी इंजीनियरिंग प्रापर्टी के
हिसाब से नहीं कर रहे हैं। इसी कारण बांस के कारीगर
के साथ भी न्याय नहीं हो रहा है। हालांकि
अप्रशिक्षित होते हुए भी उसकी कलाकारी बेजोड़ है। पर
उसकी कला के साथ इंसाफ नहीं हो रहा है। इन्हीं बातों
को लेकर हमारा संघर्ष जारी है।
हमारे क्षेत्र में हर साल हजारों
बच्चे कुपोषण से मरते हैं। लेकिन जिन परिवारों ने
बांस से अपने को जोड़ा है,
वहां हालात कुछ और हैं। उन
परिवारों की महिलाओं को काम के लिए घर से बाहर नहीं
निकलना पड़ता। वे घर बैठे ही बांस से हेयर क्लिप और
अन्य कई उत्पाद बनाती हैं और हर माह 1500
रुपये आसानी से कमा लेती हैं।
इसलिए वो अपने बच्चों को ठीक से पाल सकती हैं। जिस
समाज में परिवार ठीक है उसकी कम्युनिटी ठीक हो जाती
है और जिस समाज की कम्युनिटी ठीक हो वह समाज तो अपने
आप ही ठीक हो जाएगा और इस तरह देश भी ठीक हो जाएगा।
बांस को पकड़ते हुए देश तक पहुंचने का हमने अपनी
संस्था के जरिए एक प्रयोग किया है। वैसे तो बांस की
अपनी आयु 4 से 5
वर्ष की ही होती है। किंतु यदि
उस पर काम किया जाए तो उसकी उम्र काफी बढ़ सकती है।
आज तो डिजाइनर क्राफ्ट,
हेयर क्लिप और
ग्रीटींग कार्ड जैसे सामान बांस से बनाए जा रहे हैं।
हमारे प्रयास से अब बांस को लेकर शिक्षा सस्थानों
में भी पढ़ाई हो रही है। इंदिरा गांधी मुक्त
विश्वविद्यालय में बांस पर सर्टीफिकेट कोर्स शुरू हो
गया है। सर्टीफिकेट के बाद अब डिप्लोमा भी शुरू हो
गया है। हम चाहते हैं कि धीरे-धीरे बांस को लेकर
डिग्री कोर्स भी शुरू हो। आज बांस की उपयोगिता से
जुड़ी जानकारी को पूरे देश में फैलाए जाने की विशेष
जरूरत है।
प्रस्तुति-
छवि कौशिक
(भारत
विकास संगम,
2008
में दिए गए वक्तव्य पर आधारित)
संपर्क:
ग्राम-कवादा,
पो. दुनी,
अमरावती
महाराष्ट्र |