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जुलाई  2008

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कहानी

एक राजनीतिक कहानी

वोल्गा

कुछ नहीं हुआ। हम सबका नसीब अच्छा है।' कहते हुए एक अधेड़ उमर का व्यक्ति मधुसूदन को पलंग तक लाया। तब मैंने देखा उनके हाथ में खून से भरे हुए बैंडेज को। मुझे चक्कर आने लगा।

    मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैंने कौन सी गलती की? काश जो कुछ हुआ उसे यदि मैं ठीक-ठाक कर सकती या उसमें कोई परिवर्तन ला सकती तो कितना अच्छा होता! अगर ये सब मेरे वश की बातें होतीं तो मुझे कोई गुस्सा नहीं आता।

मुझ पर आज जो संकट आया, वही एक दिन मेरे पति पर भी आया था। तब मैंने उनको कितनी सान्त्वना दी थी। कितना सहयोग दिया था। उन्हें मैंने अपने सीने से लगाया था। वह शाम मुझे आज भी याद है। केवल याद ही नहीं, सजीव बनकर मेरी आंखों के सामने वह दृश्य आ रहा है।

हमारा विवाह हुए एक साल हुआ था। इस एक साल के जीवन के बारे में सोचते हुए मैं उनकी कमीज में बटन टांक रही थी।

मैंने उनका नाम पहले अपने चाचाजी के मुंह से सुना था। मेरे चाचाजी यह रिश्ता लाए थे। मधुसूदन नाम सुनते ही मुझे अच्छा लगा। नाम बहुत सुन्दर तथा पवित्र लगा। मैं बहुत खुश थी। बार-बार यह नाम मेरे कानों में गूंज रहा था। मुझे लगा कि आज तक जिसके लिए मैं राह देख रही थी वह मुझे मिल गया। मेरा जीवन सफल हुआ। लगभग तीन साल से मैं हर एक नाम को अपने नाम से जोड़ कर देखती थी और कौन सा नाम अच्छा है इसके बारे में सोचा करती थी। अब मुझे लगा कि मेरी प्रतीक्षा सफल हो गई। बस उस क्षण से मैं अपने मायके, जहां मेरा जन्म हुआ, पालन-पोषण हुआ को पराया समझने लगी। बस एक महीने में अपने घर चली जाऊंगी, यह सोचकर मैं निश्चिन्त हो जाती थी। इस प्रकार सोचना स्वाभाविक ही था क्योंकि जब भी घर में थोड़ा कुछ परिवर्तन करती थी तो तुरन्त मां कहा करती थी कि अपने घर जाने के बाद तुम जो चाहे करना किन्तु इस घर में तो ऐसा ही चलने दो। लगभग तीन साल से मां के मुंह से ये ही शब्द मैं सुन रही थी। मुझे समझ में आने लगा कि अपने मन से कुछ करने के लिए मुझे मेरा अपना एक घर मिलेगा। मैं इस घर के लिए इन्तजार करने लगी। वह घर हैदराबाद में है, सुनते ही बहुत खुश हुई। हैदराबाद, मधुसूदन दो नाम मेरे मन में आते हैं, मेरे होंठो पर आनेवाली मुस्कान के बारे में हमेशा मेरी बहन बताया करती थी और मुझे चिढ़ाया करती थी। उसकी बात सुनने के बाद मैं लज्जित हो जाती थी।

मधुसूदन को पचास हजार दहेज देने के लिए हमारे मायके वाले तैयार हो चुके थे। मैंने सबको यह बात बता दी। मेरी सहेलियां भी शादी के लिए इन्तजार कर रही थीं। बी.ए. परीक्षा दे चुकी थी। इसलिए हमेशा हमारे बीच शादी की बातें चलती थी। सबसे पहले मेरा ही रिश्ता तय हुआ इसलिए मैं शान दिखाती थी। दहेज की बात सुनने के बाद कुछ सहेलियों ने कहा कि बाप रे इतना दहेज! बाकी सहेलियों ने कहा कि दूल्हा बहुत ही सस्ते में मिल गया। एक सहेली ने दहेज का बहुत विरोध किया। विवाह करके तुम उसको सुख दोगी। काम करोगी। बच्चों को पैदा करोगी। फिर बच्चों का काम भी करोगी। जो इतने काम करती है, इतनी जिम्मेदारियों को निभाती है, उसे दूल्हे को दहेज देना चाहिए, उल्टा तुम क्यों देती हो। उसकी ये बातें सुनने के बाद मुझे गुस्सा आया। मेरे विचार में विवाह के कारण पति-पत्नी के बीच एक पवित्र बन्धन बन जाता है। इस बन्धन को मेरी सहेली ने गलत समझा। मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने कहा- मुझे भी तो सुख मिलेगा। काम करना मेरे लिए भी अच्छा है। बच्चे पैदा होंगे तो क्या मेरे नहीं होंगे? उसने एक लापाइंट निकालते हुए कहा, 'फिर ऐसा है तो दोनों के सुख के लिए पचास हजार क्यों?' ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी बातें करनेवाली से क्या बोलना चाहिए। अगर बोलेंगे तो भी वह समझ पाएगी क्याफिर भी मैंने उसे समझाने का प्रयत्न किया, 'यह रिवाज है। मुझे और हमारे घरवालों को कोई आपत्ति नहीं है तो तुमको क्यों?' उसने कहा, 'क्यों? इसका उत्तर विवाह होने के बाद तुमको मिलेगा।' वह चली गई।

किन्तु विवाह होने के बाद भी मुझे कोई दुख नहीं हुआ। शादी धूमधाम से हुई। पहली बार उन्हें दूल्हे के रूप में देखने के बाद मैं तन्मय हो गई। वे फोटो से भी दिखने में सुन्दर हैं। उनका नाम तथा उनके साथ रहना सब कुछ अच्छा लगा। और मुझे विश्वास हो गया कि ये खुशियां हमेशा के लिए रहेंगी। विवाह के समय मैंने हर काम पवित्र दृष्टि से तथा बहुत कुछ ध्यान रखकर किया। मंगलसूत्र को मैंने आंखों से लगाकर सीने से लगाया। मुझे लगा कि मंगलसूत्र मेरे लिए वरदान है। हमेशा मैं उनकी जीवन-संगिनी के रूप में रहना चाहती थी। दुख में हमेशा मैं उनका साथ देती थी। और विवाह के समय जो सौगंध मैंने ली उसे याद करती थी। पति-पत्नी के बीच जो मधुर बन्धन है, पति के प्रति पत्नी कार् कत्तव्य, धर्म आदि के बारे में जानती थी। मैं बचपन में गाना गाती थी। 'प्रेम निंडिन इल्ले नव स्वर्ग मुगा विल सिल्लु' (जिस घर में प्रेम है वह घर नव स्वर्ग है), 'मल्ले तीगवटिदि मगुब जीवितमु चल्लनि पंदिरि उंटे अल्लुकुमपोयेनु' (मोगरे की लता की तरह है औरत का जीवन, वितान मिलता है तो लता उससे लिपट जाएगी) आदि गीत गाते हुए मैं भाव-विभोर हो जाती थी। इस प्रकार के विषय जिन गीतों में, कहानियों में, उपन्यासों में होते, उन्हें मैं बहुत पसन्द करती थी। औरत का जीवन किस प्रकार सफल हो सकता है इसके बारे में इनमें कितना अच्छा बताया गया है, ये सब सोचकर मैं पुलकित हो जाती थी। मैं भी एक लता की तरह मधुसूदन के सहारे जिन्दगी बिताऊंगी तो कितना अच्छा लगेगा। उनके साथ रहना माने किस के रक्षण में बेफिकर रहना। ऐसा सोचकर मैं खुश हो जाती थी।

मगर ये सब इतना सहज और आसानी से नहीं हुआ। विवाह के दिन मेरे मन में जो पवित्र भावना थी उसे हमेशा कायम रखने के लिए मैंने घमासान युध्द किया है। उनकी आदतों तथा मेरी आदतों में बहुत फरक है। वे साफ-सफाई के प्रति बिल्कुल ध्यान नहीं देते। उनके पास स्वच्छता का नाम तक नहीं है। बस जहां देखो सामान बिखेर देते हैं, जहां देखो वहां कचरा दिखाई देती है। स्वच्छता के बिना मैं नहीं रह सकती। मेरी स्वच्छता को देखकर उन्हें गुस्सा आता है। छ: महीने मैंने उनमें परिवर्तन लाने के लिए काफी प्रयत्न किया। मेरे पड़ोस में जो औरत रहती है उसे स्वच्छता की बिल्कुल फिकर नहीं है। उसका पति पत्नी के विरुध्द है। कहीं पर भी थोड़ा कुछ कचरा दिखाई पड़ेगा, घर के कोने-कोने में अगर स्वच्छता नहीं है तो वह आगबबूला हो जाता। उस पर पागलपन सवार हो जाता है। उसकी पत्नी पति से डर जाती थी। उसके मन के जैसा करने के लिए हर क्षण लाखों प्रयत्न करती थी। जब भी हम दोनों मिलती थी इन विषयों पर चर्चा करती थी। मैं अपनी सारी पध्दतियों को व्यवस्थित रूप से उसे सिखाने का प्रयत्न करती थी। मैं उसके जैसा आलसी बनने का प्रयत्न करती थी।

मेरे पति मुझे बड़े प्यार से देखते थे। प्रेम के लिए कोई प्रमाण तो नहीं है। अगर पति का पत्नी के लिए फूल लाना, पिक्चर लेकर जाना, इधर-उधर घुमाना यही प्यार है तो मुझे भरपूर प्यार मिला। किन्तु मैं अपनी पसंद के फूल लालकट सरैया लगाती थी या हिन्दी पिक्चर ले जाने के लिए कहती थी तो उन्हें बहुत गुस्सा आता था। मैंने तो सौगंध खाई थी कि न मैं उनको गुस्सा आने दूंगी, न मैं उनकी इच्छा के विरुध्द कोई काम करूंगी। इसलिए मुझे कहना ही पड़ता है कि हम दोनों बहुत प्यार से रहा करते थे। मेरे सास-ससुर भी अच्छे हैं। विवाह के समय दिए गए दहेज से वे बहुत संतुष्ट हैं। न बाद में उन्होंने कोई चीज मांगी न पैसे मांगे। मुझे उन्होंने कभी सताया ही नहीं। वे दोनों दूसरे गांव में रहते हैं इसलिए बहू को सताने का सवाल ही नहीं। सब ठीक-ठाक चल रहा है।

उस दिन हमारा विवाह हुए एक साल हुआ। बीते एक साल में मुझे उनका कितना प्यार मिला, कितने मीठे अनुभव मिले, कितना सहारा मिला, आदि के बारे में मैं सोच रही थी और उनकी शर्ट में बटन टांक रही थी। अचानक सूई उंगली में चुभ गई। दर्द के कारण मैं चीखनेवाली ही थी इतने में बाहर से आवाज आने लगी। मैं एकदम भागती हुई बाहर आ गई। कुछ लोगों ने आटोरिक्शा को घेर लिया। स्कूटर से कुछ लोग उतरने लगे। भीड़ को तितर-बितर करते हुए चार व्यक्ति मेरे पति को नीचे उतार रहे थे। मेरे पति धीरे-धीरे आ रहे थे। उनकी हालत देखते ही मैं रोने लगी।

'कुछ नहीं हुआ। हम सबका नसीब अच्छा है।' कहते हुए एक अधेड़ उमर का व्यक्ति मधुसूदन को पलंग तक लाया। तब मैंने देखा उनके हाथ में खून से भरे हुए बैंडेज को। मुझे चक्कर आने लगा। मैं एकदम निढ़ाल हो गई। 'क्या हुआ इनको। मेरे देवता बच जाएंगे क्या?' मैं फूट-फूटकर रोने लगी। सभी लोग मुझे सांत्वना देने लगे, जो कुछ हुआ उसके बारे में बताने लगे। फैक्टरी में हमेशा मधुसूदन जो मशीन चलाता है उसका नाम बताया उन्होंने। उस मशीन को संभालना बहुत कठिन है। फिर भी मधुसूदन लगभग दस साल से अच्छा चला रहा है। आज इसी मशीन के कारण हाथ कट गया। उन्होंने मधुसूदन के लिए दवा-पानी करवाया और कहा कि आगे भी उनकी देख-भाल करनेवाले हैं। मधुसूदन को आराम चाहिए और पौष्टिक आहार चाहिए। खर्च करने के लिए उन्होंने मुझे पैसे भी दिए थे। ये सब लोग फैक्टरी में काम करते हैं। उनकी यूनियन भी है। मुझे लगा कि इस संकट में ये लोग देवता के रूप में मेरे सामने आ गए। मैंने अपने आपको संभालकर उनके लिए काफी बनाई। मुझे लगा कि इस मुसीबत को पार लगाने के लिए मेरे भाई सामने आकर बैठे हैं। मुसीबत आने पर मैं अकेली नहीं हूं, मेरे साथ कई लोग हैं, यह अहसास मुझे उस दिन हुआ। उस दिन के अनुभव को मैं कभी नहीं भूल सकती।

उन सबको विदा करके मैं जब दरवाजा बंद कर रही थी, एक क्षण पहले मेरे मन में बहुत धैर्य था फिर भी अब मुझे लगा कि बहुत बड़ी मुसीबत में हूं। किन्तु मैं नहीं रोई। रोने का मौका भी मुझे मधुसूदन ने नहीं दिया। मैं अन्दर आई तो मधुसूदन फूट-फूटकर रो रहे थे। बार-बार अपने हाथ की तरफ देख-देखकर रो रहे थे। मैंने अपने आंसुओं को पीकर उनके आंसुओं को पाेंछ लिया था। एक मां की तरह उन्हें गोद में लिया था। कदम-कदम पर उन्हें मैंने सहारा दिया। 'उंगलियां नहीं हैं तो क्या हुआ? मैं तो हूं, आपको इसकी कमी महसूस नहीं होने दूंगी।' ऐसा कहकर मैंने उनको सीने से लगाया। उन्होंने सोचा कि अब वे अपंग हो गए हैं, इसलिए मैं उन्हें पहले जैसा प्यार नहीं करूंगी। 'आप ऐसा कैसे सोच सकते हैं। आप मेरे हैं। आपका हाथ नहीं है तो भी कोई फरक नहीं पड़ता' कहते हुए मैंने उनके रक्त-सिक्त हाथ को चूम लिया। बिना उंगलियों के इस हाथ को देखकर कौन नौकरी देगा। असल में वे नौकरी कैसे कर सकेंगे! रात-दिन यही चिंता सताने लगी। मैंने उन्हें नींद की गोलियां देकर सुलाया किन्तु मैं रात-भर जागती रही।

दूसरे दिन मेरी सास तथा ससुरजी आए थे। उन्होंने रोना शुरू किया। इतने में यूनियन वाले आ गए। उनके आने के बाद घर के वातावरण में थोड़ा परिवर्तन आया। उन्होंने मधुसूदन को बताया कि उन्हें नौकरी से कोई निकाल नहीं सकता। यूनियन ऐसा करने नहीं देगी। काम्पनसेशन तथा नौकरी के बारे में न सोचने और ठीक से दवा लेकर जल्दी स्वस्थ होने के लिए उन्होंने कहा। मेरे पति ने मुझे यूनियन लीडर के पांव छूने के लिए कहा। मैं उनके पांव छू रही थी कि वे थोड़ा पीछे हट गए। मेरा पांव छूना उनको अच्छा नहीं लगा। उन्होने मुझे कई बातें बताईं। यूनियन क्या होती है, यूनियन का जन्म कब हुआ, इसका विकास कैसे हुआ आदि के बारे में उन्होंने बताया। सवा सौ साल पहले जब यह यूनियन नहीं थी तब मजदूर वर्ग के दुख-सुखों के बारे में सोचनेवाले कोई नहीं था। अगर कोई मजदूर अपंग हो गया या उसे कोई समस्या आई तो उसे मरना ही पड़ता था, कोई रास्ता बतानेवाला ही नहीं था। सब कुछ मिल मालिक के हाथ में ही रहता था, मजदूर वर्ग के संगठन तथा आंदोलनों के कारण समाज में बहुत कुछ परिवर्तन आया। मजदूर वर्ग के बिना फैक्टरी की उन्नति संभव नहीं है। फिर भी उसका कोई मूल्य नहीं। काम करते समय मजदूर को कोई भी नुकसान हो जाए तो इसके लिए फैक्टरी के मालिक जिम्मेदार नहीं हैं। मजदूर वर्ग जागृत हो चुका। संगठन के द्वारा लड़ाई शुरू की। कई नए कानून लाए। इसलिए आज मधुसूदन के विषय में चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। मजदूर वर्ग की भलाई के लिए ट्रेड यूनियनें और क्या-क्या कर रही है, इसका इतिहास क्या है आदि के बारे में उन्होंने मुझे बता दिया। मुझे समझ में आया कि मेरे पति या अन्य व्यक्ति जो समस्याओं से पीड़ित हैं वे अकेले नहीं हैं उनके साथ यूनियन है। ये सब बातें मालूम होने के बाद हम दोनों को बहुत धैर्य मिला।

एक महीने में उनका हाथ ठीक हो गया। पहले दिन जब वे हाथ की बेंडेज निकालकर आए थे और उस हाथ से मेरे शरीर को छूने लगे तो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। फिर भी मैंने अपने आपको संभालकर उस स्पर्श को एक आनन्दानुभव के रूप में स्वीकार किया। मैंने उस हाथ को चूम लिया। यूनियन के लोगों ने मधुसूदन के लिए असिस्टेंट नियुक्त किया। काम्पनसेशन के रूप में दस हजार मिले। नौकरी में कोई परिवर्तन नहीं है इसलिए मिल मालिक ने कहा कि और रुपए नहीं दे सकते। यूनियन के लोगों ने हां कह दिया। चार महीनों के बाद उनको फिर नौकरी दी गई। बाद में मैं पेट से रह गई। डाक्टर ने जांच करके दवा तथा पौष्टिक आहार लेने के लिए कहा। मधुसूदन भी मुझे प्यार से देखने लगे। मुझे जो भी चाहिए खरीदकर लाने लगे। फल-दूध आदि लेने के लिए बार-बार अनुरोध करने लगे।

तीन महीने गुजर गए। उस दिन शाम को मैंने झट से नहाया। बाल ठीक कर रही थी। इतने में पेट में जोर-जोर से दर्द होने लगा। पीड़ा से मैं तड़पने लगी। क्या करना चाहिए, मेरी समझ में नहीं आया। मैंने सहन करने का काफी प्रयत्न किया। चावल पकते समय जो गरम भाप ऊपर आती है उसी तरह पीड़ा होने लगी। इस पीड़ा को मैं नहीं सहन कर सकी। मैंने पड़ोस में रहनेवाली औरत को बुलाया। थोड़ा कुछ बताया, इतने में बेहोश हो गई। जब आंखें खोलीं तो मैं अस्पताल में थी। हमारे परिवार के सभी लोग वहां थे। अपने माता-पिता को देखते ही मैं घबरा गई। इतनी कौन सी बड़ी विपत्ति आ गई। मैंने देखा एक हाथ में स्लाइन, दूसरे हाथ में रक्त चढ़ा रहे थे। मुझे लगा कि पेट में बहुत बड़ा घाव हुआ है। बाद में मां ने मुझे सब कुछ बताया। शिशु गर्भ की थैली में नहीं था। बाहर की टयूब में था। मेरी समझ में नहीं आया कि यह सब कैसे हुआ? कच्चा गर्भ गिरने के कारण मेरे पेट के अन्दर का भाग लगभग पूरा रक्तमय हो गया। डाक्टर ने छ: घंटे आपरेशन करके अन्दर पूरा साफ कर दिया और टांके डाल दिए। अब मैं बच्चे को कभी पैदा नहीं कर सकती। 'बस तुम बच गई। किन्तु आगे का जीवन कैसा होगा?' मां ने अपनी चिन्ता व्यक्त की। ये बातें मुझे विचित्र लगी। मैं अपनी स्थिति के बारे में सोचने लगी। मेरी स्थिति उस घर जैसी थी जो बहुत बड़े प्रलय के बाद ध्वस्त हो जाता है। शाम को जब मधुसूदन आए तो मैं रो पड़ी। उन्होनें निष्ठुरता से बात की, 'रोने से क्या फायदा? हमारा नसीब ही फूट गया।' मैंने सोचा उस विपदा में वे मुझे सहारा देंगे। मुझे सीने से लगाएंगे। सांत्वना देंगे। मेरे आंसू पोछेंगे। मेरे हाथ पकड़कर 'तुम क्यों रोती हो मैं तुम्हारे साथ हूं' कहेंगे। मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उनकी आंखों में कठोरता व्यक्त हो रही थी। मेरी समझ में नहीं आया कि वे इतने कठोर कैसे बन सके?

'तुम अब कभी बच्चे पैदा नहीं कर सकती इसीलिए तो तुम्हारी सास गुस्से में है' मां की ये बातें सुनने के बाद ही पता चला कि उन्होंने इतनी कठोरता से बात क्यों की। समझ में आने के बाद डर गई। 'मां, अब मैं क्या करूं?' मैंने बहुत उदास होकर कहा। 'अब क्या कर सकती हो! तुम्हारा भी क्या जीवन है! बच्चे पैदा करने के लिए नसीब भी चाहिए। अब वे कितने भी कठोर हो जाएं सहन करना ही पड़ता है।' मां अपनी नि:सहायता व्यक्त करते हुए फूट-फूटकर रोने लगी। अब मेरी आंखों के आंसू सूख गए। एक भी बूंद नहीं आई। मैं भयभीत हो गई अब मुझे समझ में आया कि मैं अकेली हूं। मुझ पर जो मुसीबत आई, इसमें काई भी सहानुभूति दिखाने के लिए तैयार नहीं। इन सबको बस यही चिंता सता रही है कि मैं बच्चे पैदा नहीं कर सकती। किन्तु जो दुर्घटना मेरे साथ हुई उसके बारे में कोई चिंता नहीं। आखिर मेरी मां भी जो पैदा नहीं हुए, जो पैदा नहीं होंगे, उन्हीं बच्चों के बारे में सोचती रहती है। मेरा यह मानसिक क्लेश, मैं कैसे ठीक हो जाऊं और मेरे शरीर में होनेवाली यह पीड़ादायक अनुभूति, इसके बारे में कोई सोचने के लिए तैयार नहीं है।

अस्पताल में नर्स ने कहा, 'खुशी की बात है, चलो तुम बहुत बड़ी मुसीबत से बच गई।' तुरन्त सास ने कहा, 'किसका उध्दार करने के लिए? यह बांझ मेरे बेटे के गले पड़ गई। अब किसलिए जीना?'

बच्चे नहीं होंगे तो क्या मुझे दुख नहीं होता? यह बात मुझे भी तो खटकती है।  मधुसूदन पर पहाड़ गिर पड़ा। मुझे बच्चे नहीं होंगे। उनका वंश नहीं बढ़ेगा। उनके जमीन-जायदाद सब व्यर्थ हो जाएंगे। बस रात-दिन सब लोग इसी के बारे में सोचते हैं। मुझे दवा दे रहे हैं, चिकित्सा ठीक हो रही है। किन्तु ये सब काम यान्त्रिक रूप से हो रहे हैं। अब मैं वह यन्त्र हूं जो काम नहीं करता। मुझे सब उस कपड़े सीने की मशीन की तरह देखने लगे जो एक अड़चन है, फिजूल पड़ी हुई है, काम की नहीं, पुरानी है। घर के सभी सदस्य मुझे देखते ही चिढ़ रहे हैं, मुंह मोड़ रहे हैं।

मैं अस्पताल से घर आ गई। मां-पिताजी कुछ अर्जेंट काम का बहाना बनाकर चले गए। मुझे समझ में आ गया कि मुझे वे ले जाने से डर रहे हैं। वे मुझे लेकर नहीं गए, इसलिए भी सास को गुस्सा आ गया। वैसे तो ये सब मुझे दुख पहुंचा रहे हैं, किन्तु इस मुसीबत के वक्त मेरे पति के कठोर बर्ताव ने मुझे और दुख पहुंचाया। उनका यह सोचना कि मैं किसी काम की नहीं हूं कितना गलत है। क्या केवल बच्चे पैदा करने के लिए उन्होंने मुझसे विवाह किया। स्नेह, प्रेम, साहचर्य आदि का कोई अर्थ नहीं। इतने दिन जैसे उनके साथ बातें करती थी, उनकी बातें सुनती थी, उनके लिए जो चाहिए उसका इंतजाम करती थी, उनको सुख तथा आराम देती थी, पिक्चर जाती थी, घूमने जाती थी, उसी तरह अब मैं क्यों उनके साथ नहीं रह सकती? ऐसा करने में दिक्कत क्या है, ऐसी कितनी औरते हैं, जिन्हें बच्चे नहीं हैं, क्या उन सबके पति उन्हें प्यार नहीं करते। मुझे रुक्मिणी बुआ की याद आ गई। उसकी उमर चालीस साल है। उसने बच्चों के लिए बहुत राह देखी। हर भगवान की मन्नत करती थी। व्रत रखती थी। कई डाक्टरों से इलाज करवाया। एक तरफ दवाई, आपरेशन चालू है तो दूसरी तरफ तीर्थ यात्रएं-पूजा आदि। हमेशा उसका ध्यान बच्चों पर ही रहता था। हर क्षण वह बच्चों के बारे में ही सोचा करती थी। सब लोग उसकी ओर दया की दृष्टि से देखते थे। अन्त में जब यह पक्का हो गया कि उसे बच्चे नहीं होंगे, मेरे मामा अपने भाई के लड़के को लाए और दत्तक लिया। कुछ भी हो, यहां बाझ के लिए तकलीफें-ही-तकलीफें हैं। क्या विवाह बच्चों के लिए ही है? बस पुरुष को बच्चे देने में औरत का जन्म सार्थक होता है? क्या औरत माने गर्भ की थैली, दो ओवरीज हैं? ये दोनों मेरे पास नहीं हैं इसलिए मैं किसी काम की नहीं हूं। लगातार सोचने के बाद मेरे सामने कुछ सत्य आ गए। मैं जिन औरतों को पहचानती हूं प्राय: उनमें किसी को शन्ति नहीं है। दहेज देकर मैंने शादी कर ली किन्तु किसी-किसी के पास दहेज देने के लिए रुपए नहीं हैं इसलिए मेरी कई सहेलियां अविवाहित ही रह गईं। विवाह नहीं हुआ इसलिए उन्हें सब लोग नीच दृष्टि से देखते हैं। वे समाज से युध्द कर रही हैं। निर्मला तथा सरोजा के मां-बाप ने दहेज कम दिया इसलिए उनके ससुरालवाले उन्हें हर रोज सताते थे। अंत में दोनों ने आत्महत्या कर ली। कमला के पति ने कमला को मार डाला। पड़ोस में रहेनेवाली औरत की दोनों संतान लड़कियां ही हैं इसलिए घरवाले उनको बहुत सताते हैं। इतने दिन मैंने इन दुखी औरतों के बारे में क्यों नहीं सोचा? मैं क्यों अन्धी हो गई? देश-भर में औरतों पर जुल्म हो रहे हैं। वे सताई जा रही हैं। उन सबकार् आत्तनाद मुझे क्यों नहीं सुनाई पड़ा। इतने दिन मैं अंधकार में थी। मैं हमेशा यह सोचकर कि दाम्पत्य प्रेम मीठा होता है, घर ही स्वर्ग होता है, पति ही सब कुछ है, सपनों में खो जाती थी। मेरे जैसी अज्ञानी औरतें प्रेम के लिए तरस रही हैं। जो मिलना नहीं उसके ल&#