भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका

 जनवरी,  2008

पिछले अंक

हमारे बारे में

संपर्क करें

सदस्य बनें

अपना ई- मेल देखें

 जी-मेल

 हाट-मेल

 याहू-मेल

 रेडीफ-मेल

 सिफी-मेल

हिन्दी समाचार-पत्र

 अमर उजाला

 जागरण

 भाष्कर

 नवभारत टाइम्स

 प्रभासाक्षी

 सहारा समय

 बी.बी.सी हिन्दी

 घर बचओ- देश बचाओ अभियान

 

 विर्मश 

समाज सेवा एक चुनौती

आचार्य शरदकुमार साधक

आजकल वर्तमान समय में शोषक वृत्ति के साथ-साथ सेवावृत्ति भी बढ़ी है। सेवा करने का दायरा बहुत बड़ा है। कोई माता-पिता की सेवा करता है, कोई गुरु की। कोई बीमारों की सेवा करता है तो कोई आपदाग्रस्त लोगों की। किसी को गोसेवा की लगन है, वहीं कोई गंगा सेवा में मगन है। भारत में जितने सेवक प्राचीनकाल या अंग्रेजों के शासनकाल में थे, उनसे कहीं अधिाक वर्तमान लोकतांत्रिक काल में हैं। उनका काम नागरिक सेवा करना है। इसी तरह लोकसेवा करके राजनीतिक पार्टियां सत्ता के दरवाजे दस्तक देती हैं। उनकी सेवा का साधय सत्ता है। सत्ताधारी व सत्ताकांक्षी सेवा प्रकल्प खड़े करते हैं। जो क्षेत्र अछूता रहता है, उसमें स्वयंसेवी संस्थाएं निष्पक्ष सेवा देने की तत्परता दिखाती हैं और जनता को लाभान्वित करती हैं। वैसे देखा जाए तो किसान, मजदूर, कारीगर, व्यापारी, शिक्षक, चिकित्सक, वैज्ञानिक आदि  जनता-जनार्दन के सेवक ही हैं। लेकिन अधिक पाने की इच्छा और त्यागने की अनिच्छा के कारण प्रभुता की हकदार सेवा लघुता की शिकार हो गई है। 'वसुधव कुटुम्बकम्' की चर्चा करने वाले स्वकुटुम्ब की चर्चा में संलग्न हैं। यही देखकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने लोकसेवकों को नसीहत दी थी कि हम अपने कुटुम्बों के लिए मरना जानते हैं किन्तु अब कदम आगे बढ़ाएं। अपनी सेवा का वृत्त इतना पैफलाएं कि सारा गांव उसमें समा जाए। फिर जिला, प्रांत, देश को छूते हुए संपूर्ण जगत को ढंक लें। हम भारत के विनम्र सेवक हैं। भारत की सेवा द्वारा सम्पूर्ण मानवता की सेवा की जा सकती है। यह सिध्दान्त स्वीकार करने से ही विश्व की स्थिति सुधर सकती है और हमारी इस पृथ्वी पर स्थित राष्ट्रों के पारस्परिक राग-द्वेष समाप्त हो सकते हैं। दिमाग ऊंचा और दिल व्यापक होने से सेवा सधाती है।

जनसेवा, समाजसेवा, राष्ट्रसेवा जैसे शब्दों का प्रचलन आजकल बढ़ा है, लेकिन वास्तविक सेवा तो सृष्टि सेवा और राष्ट्र की सेवा ही है। मां जब अपने बच्चे की बहती नाक साफ करती है तब वह यह नहीं मानती कि वह सिर्फ नाक की सफाई कर रही है। वह मानती है कि नाक बच्चे का अस्वस्थ भाग है, उसकी सफाई किये बिना बच्चे की सेवा नहीं हो सकती। आचार्य विनोबा भावे ने इस विषय को विस्तार से समझाते हुए सिखाया कि सृष्टि के अस्वस्थ भाग की सेवा करने से पूरी सृष्टि की सेवा होती है। सेवा की इच्छा करने वाले लोग हमेशा समाज में रहते हैं। वे सर्वजन की भक्ति कर सकते हैं, किन्तु प्रत्यक्ष सेवा अपनी क्षमता के अनुसार कुछ व्यक्तियों की ही कर सकते हैं। ऐसा करते समय वृत्ति सर्वभूतानुकूल रखने से सेवा सार्थक होती है। सेवा भले ही एक व्यक्ति या एक क्षेत्र की करें, लेकिन हैं हम विश्व के और विश्वेश्वर के ही सेवक। आत्म परीक्षण से मन का, मौन से वाणी का एवं कर्मयोग से शरीर का दोष मिटाते रहने से सेवा शुध्दि होती रहती है। जिनकी सेवा करनी है, उनकी समस्याएं सामने रखकर सेवा क्षेत्र निधार्रित करना चाहिए। जनसेवकों को सम्बोधित कविता है:

''पैदा कर जिस देश जाति ने तुमको पाला पोसा/किये हुए हैं निज पर हित का तुमसे बड़ा भरोसा/उससे होना उट्टण प्रथम है सत्कर्तव्य तुम्हारा/ फिर दे सकते हो वसुधा को शेष स्वजीवन सारा।''

सेवा क्षेत्र दो तरह के हैं- सरकारी और अ-सरकारी। सरकारी सेवा की नींव में सेना है, अ-सरकारी सेवा की नींव सामाजिक सहकार है। सरकारी सेवा परावलंबी व अस्वस्थ बना सकती है, अ-सरकारी सेवा स्वावलंबी और स्वस्थ बनने का संबल देती है। सरकारी सेवा से समस्याएं पैदा हो सकती हैं वहीं अ-सरकारी सेवा समाधान दिए बिना पूरी नहीं होती। शासक और सेवक की भूमिका के अनुरूप चेतना काम करती है और गुण दोष फष्ट होते हैं। शासक सत्ता का उपयोग अपनी सुविधा बढ़ाने में करता है। सेवक की प्रवृत्तियों से जनता सुविधा पाती है। शासक संपत्ति को सरकारी नियंत्रण में रखता है। सेवक संपत्ति जनता-जनार्दन को उपलब्धा कराना चाहता है। संपदा का अनियंत्रित उपयोग करना शासक की शान है। संपदा का स्वेच्छा या मर्यादित उपयोग करना सेवक की पहचान है। शांतिवार्ताएं चालू रखना शासक की नीतिगत समझदारी है। सुमति पोषक शांति ही सेवक को प्यारी है। शासक पर्यावरण संतुलन बिगाड़ने वाले उद्योगों को भी प्रश्रय देता है। सेवक पर्यावरण असंतुलन की अनदेखी नहीं कर सकता। शासक शक्ति संपन्नता का पक्षधर होता है। सेवक की प्रतिबध्दता शील सम्पन्नता के प्रति रहती है। काल्पनिक न्याय की प्राप्ति के उपाय के तौर पर शासक युध्द को बर्दाश्त करते हैं और युध्द से समस्या हल होने की आशा रखते हैं। जबकि सेवक युध्द-निषेध तो करता ही है, साथ ही यह भी कहता है कि युध्द से जो समस्या हल होती दिखाई देती हैं वह अस्थाई होती हैं, लेकिन जो बुराई होती है, वह स्थाई होती है। उसे ईश्वर या धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा समर्थनीय नहीं लगती। ऐसी देशभक्ति, बहादुरी या धर्मनीति की वह सराहना करने से भी विरत रहता है, जिसका फल हिंसात्मक होता है। लंकेश के वेश में नहीं बल्कि मुनिवेश में रावण ने सीताहरण किया। वैसे ही सामाजिक शीलहरण करने वाले लोग प्राय: धर्म व राजनीति का वेश धारण कर सेवा का मेवा खाने के लिए मानवीय दुर्बलताओं का व्यवसाय करते हैं। आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक जगत् में इसी तरह के व्यवसायी सेव्य का शोषण, दमन, उत्पीड़न करते हैं और आदर्शों की छाया में पापों की दुनिया पलती है। यह जागतिक त्रसदी है और सेवा परायणता के लिए चुनौती भी।

''अगर तूफां में किश्ती हो तो हो सकती है तदबीरें/ गर किश्ती में तूफां हो तो खुदा हाफिज है।''

 सेवा क्षेत्र में आये तूफां से किश्ती पार ले जाने की आकांक्षा रखने वालों को विनोबा जी ने समझाया- मान लो युध्द हो रहा है। सैनिक जख्मी हो रहे हैं। अपनी जान जोखिम में डालकर भी लोग उनकी सेवा में लगे हैं। शत्रु-मित्र का भेद किए बिना वे जख्मियों को संभाल रहे हैं। उनकी यह सेवा युध्द को मान्य करने वाले समाज का एक हिस्सा मात्र है, उसमें युध्द रोकने की शक्ति नहीं है। वह शक्ति विकसित करने के लिए 'बिना खड्ग बिना ढाल' लिए गांधीजी ने सशस्त्र सेना का मुकाबला करने का प्रशिक्षण दिया। विनोबा जी ने शांति सेना गठित की और लोकनायक जयप्रकाश ने अन्तरराष्ट्रीय  शान्ति सेना का नेतृत्व किया। विनाश में लगने वाले संसाधन विकास में लगाना साधुजनोचित शिष्टाचार है। संस्कृति का मूलार है।

''विद्या विवादाय धानं मदाय, शक्ति: परेषां परपीडनाय।

खलस्य साधार्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥''

सेवा दो तरह से की जाती है। दु:खी, पीड़ित, शोषित व्यक्तियों को येन-केन-प्रकारेण राहत देना एक प्रकार की सेवा है। दूसरे प्रकार की सेवा से राहत पाने वालों का दु:ख, पीड़ा, शोषण हमेशा के लिए मिटता है। साधय के अनुरूप साधन की पवित्रता परिस्थिति बदलने में सहायक होती है। इसीलिए गांधीजी ने सेवावृत्ति को निर्माण का अधिाष्ठान दिया। भूखे को खिलाना यह हुई सेवा। लेकिन भूख लगने पर फिर-फिर मांगने की मजबूरी न रहे, इस विचार से उसे उत्पादन का साधन देना, यह हुआ निर्माण। 'ईमान की रोटी व इज्जत की जिन्दगी' महफूज रखने की दृष्टि से निर्माण में सहभागिता आवश्यक है। इससे सेवा को सामाजिक मूल्य प्राप्त होता है। जो गुण सामाजिक नहीं बनता, वह आखिर में दोष हो जाता है। सेवा के साथ भी ऐसा ही है। संकीर्ण वृत्ति में सेवा करने वाले भाषा, लिपि, सम्प्रदाय, सभ्यता को जोड़ने का साधन न बनाकर तोड़ने का हथियार बना बैठते हैं। वे अगल-बगल में रहते हुए भी सहजीवन को निरापद नहीं रहने देते। कहते हैं-तुम अपनी चारदीवारी में रहो, हम तुम्हें नहीं छेड़ेंगे। हमें भी अपनी चारदीवारी में रहने दो, तुम भी मत छेड़ो। इससे सहिष्णुता नहीं बल्कि सद्गुण विमुखता आती है, श्रेष्ठ भावनाएं ओझल हो जाती हैं।

''यह हवा बदलने की खातिर आंधी की आज जरूरत है।

लपटों पर बैठी दुनिया को गांधी की आज जरूरत है॥''

आजादी के छ: दशकों बाद, अब जबकि आर्थिक दृष्टि से 'गांव हमारा विश्व' एवं सांस्कृतिक दृष्टि से 'विश्व हमारा गांव' बन रहा है, तब हम अपनी, समाज की, सम्प्रदाय की, राज्य की कमियों से कब तक चिपके रहेंगे? परंपरागत कुरीतियों और धर्मांधतापोषी कर्मकाण्डों से मुक्त होकर ही सामुदायिक फरुषार्थ से समष्टि की सेवा करनी चाहिये। भिन्न-भिन्न सभ्यताएं एवं संस्कृतियां परिपूरक हों तो सेवा क्षेत्र व्यापक हो सकता है। वैसा परिवेश बनाने का श्रीगणेश भूदान मूलक ग्रामोद्योग प्रधान अहिंसक क्रांति कर चुकी है। देश भर में भूदान पदयात्र करने वाले विनोबा जी से एक दिन कोई राहगीर पूछ बैठा, 'बाबा, आपकी यात्र कहां जा रही है?' वे बोले, 'जनता रूपी बिठोबा का दर्शन करने जा रही है।' पंढरफर, रामेश्वर, काशी, काबा और येरुशलम ही हमारे तीर्थ नहीं, वरन् प्रत्येक गांव और गांव का हर घर तीर्थ है। घर-घर में रहने वाले नर-नारी हमारे देवता हैं। उन्हीं की सेवा के लिए यह भूदान पदयात्र थी। सेवाकांक्षी भक्त मीरा ने ठाकुर गिरधार से चाकरी में रखने का निवेदन किया था-

''म्हाने चाकर राखो जी / गिरधारी लला म्हाने चाकर राखो जी / चाकर रहसूं बाग लगा सूं नित उठ दर्शन पासूं / वृन्दावन की कुंजगलिन में गोविन्द लीला गासूं जी।''

हृदय में राम, मुंह में नाम, हाथ में काम होने से ठाकुर की मर्जी चाकर की खुदगर्जी को खुदा की मर्जी में परिवर्तित कर देती है। 'सेवाधर्म: परमगहनो योगिनामप्यगम्य:' मानने वाले नर-नारायण से अनुरोध करते हैं:

''अन्तर मम विकसित करो अन्तरतर हे / निर्मल करो उज्ज्वल करो सुन्दर करो हे।''

गांधी जैसे भारत सेवक की प्रार्थना, सेवा को ठोस धरातल देने वाली है और सेवकों की दुविधा हर लेने वाली है। हे भगवन्! हमें वरदान दो कि सेवक और मित्र के नाते जिस जनता की हम सेवा करना चाहते हैं, उससे कभी अलग-थलग न पड़ जायें

हमें त्याग, भक्ति और नम्रता की मूर्ति बना ताकि इस देश को हम ज्यादा चाहें और ज्यादा समझें।

संपर्क: आचार्यकुल, बी 38/13-30 नवोदित नगर एक्सटेंशन, वाराणसी

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन