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 जनवरी,  2008

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एक मिशाल

पहाड़ से भी पक्का था इरादा जिसका

गुंजन कुमार

लगभग एक महीने तक कैंसर से लड़ने के बाद 17 अगस्त 2007 की शाम को दशरथ मांझी र्ऊं 'माउंटेन कटर' का निधान हो गया। बिहार के गया जिले के गलहौर, दशरथपुर गांव के समीप पहाड़ को काटकर रास्ता बनाने वाले दशरथ मांझी इस जग से विदा होने के बाद भी कई लोगों के प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। मांझी के गुजरने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनकी सराहना करते हुए कहा था कि उनके कार्यों के पीछे पत्नी प्रेम जरूर रहा लेकिन उससे भी ज्यादा समाज सेवाभाव उनके प्रेरणा का स्रोत रहा है। मांझी के नाती के अनुसार उनका जन्म 1927 में हुआ था। उन्होंने 1960 से 1982 तक लगातार काम करते हुए अपने गांव के समीप स्थित गलहौर पर्वत को काटकर गलहौर गांव से अमेठी तक 360 फुट लंबी एवं 25 फुट चौड़ी सड़क का निर्माण किया था। मांझी की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री ने इस सड़क का नाम दशरथ मांझी पथ रखने की घोषणा की थी। 1982 में सड़क निर्माण का कार्य पूरा करने के बाद मांझी उसी समय से इस सड़क के पक्कीकरण के लिये लड़ रहे थे। इसे विडंबना ही कहेंगे कि उन्हें जितनी मेहनत पहाड़ को काटने के लिए करनी पड़ी उससे कहीं ज्यादा सरकार से उस सड़क के पक्कीकरण के लिये जूझना पड़ा। जिस जुनून में उन्होंने पहाड़ पर विजय हासिल की, उसे कई बार प्रदेश सरकार पस्त करने का काम कर चुकी थी। पहाड़ काटकर बनाई गई सड़क का पक्कीकरण कराने के लिए मांझी कागजों में उलझकर रह गए। कई बार तो उन्हें मुख्यमंत्री निवास से दुत्कार कर भगा दिया गया, लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। 25 वर्षों तक सड़क पक्कीकरण की जो लड़ाई मांझी ने लड़ी आखिरकार वर्तमान नीतीश सरकार ने उनका सम्मान करते हुए उसे मंजूरी दे ही दी।

गलहौर गांव से अमेठी तक मांझी के खुद के परिश्रम से बनी इस सड़क के निर्माण के बाद चालीस किलोमीटर का फासला घटकर मात्र आठ किलोमीटर रह गया। इस सड़क के बन जाने से हजारों ग्रामीण लाभान्वित हो रहे हैं। पहले लोगों को गलहौर गांव से अमेठी जाने के लिये पहाड़ पर चढ़कर फिर नीचे उतरना होता था या फिर बहुत ही संकरी गुफा में बैठकर सरकते हुये गुफा पार करनी होती थी। ऐसे में कई बार लोगों के शरीर में खरोंच भी आ जाती थी।

मांझी को पहाड़ काटने की प्रेरणा एक घटना से मिली। हुआ यूं कि मेहनत-मजदूरी करने वाले मांझी एक दिन अपने खेतों में काम कर रहे थे। उनकी पत्नी फगुनी देवी दिन का भोजन और पानी लेकर मांझी के पास जा रही थीं। जल्दी पहुंचने के लिये फगुनी देवी उस गुफा से पहाड़ पार करने लगीं जिससे पानी से भरा मटका फूट गया और उनका पूरा शरीर लहूलुहान हो गया। फगुनी घर से पुन: पानी लेकर देर से मांझी के पास पहुंचीं। भूख से क्रोधिात मांझी ने जब उनकी कहानी सुनी और उनके शरीर को देखा तो उसी समय उन्होंने पहाड़ के बीच से रास्ता बनाने का प्रण किया। मांझी उसी दिन पास के बाजार से छेनी और हथौड़ा खरीद लाए। दूसरे दिन से ही वे पहाड़ काटने में लग गए। उन्हें अपने कामों से जब भी फुर्सत मिलती वे पहाड़ काटने में लग जाते थे। कभी-कभी वह रात में भी पहाड़ पर छेनी-हथौड़ा बरसाते रहते थे। इस काम में उन्होंने अपनी पूरी जवानी बिता दी। इसी बीच मांझी की पत्नी का स्वर्गवास भी हो गया। फिर भी उन्होंने अपने काम को नहीं रोका। आस-पास के लोगों के अलावा घर वाले भी उन्हें सनकी और पागल कहने लगे थे। लेकिन जब पहाड़ लगभग कट चुका तो सभी उन्हें भगवान का रूप मानने लगे और 'बाबा' कहकर पुकारने लगे। इस जुनून के पीछे बेशक 'पत्नी प्रेम' था, ठीक उसी तरह का, जिस प्रकार ताजमहल बनवाने वाले शाहजहां को अपनी बेगम मुमताज से था। दशरथ मांझी को भी 'पत्नी प्रेमी' का दर्जा मिला, लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर था। एक 'राजा' था तो दूसरा 'मजदूर'। शाहजहां ने अपनी बेपनाह मोहब्बत को मूर्त रूप देने के लिये धान को पानी की तरह बहाया तो दशरथ मांझी ने अपना पसीना। इसके अलावा दोनों में सबसे बड़ा फर्क यह है कि शाहजहां ने पत्नी प्रेम में उसी के समान भव्य सुन्दर महल का निर्माण करवाया जिसकी सुंदरता को लोग निहारते भर हैं। जबकि मांझी ने पत्नी प्रेम में एक ऐसे अकल्पनीय काम को अंजाम दिया, जिससे कई गांवों के हजारों लोग लाभान्वित हो रहे हैं। मांझी के काम में पत्नी प्रेम के साथ-साथ समाज सेवा भी समाहित है।

पहाड़ का सीना चीरकर सुगम रास्ता बनाने के बाद भी दशरथ सामाजिक कार्यों में आजीवन जुटे रहे। पहाड़ी इलाका होने के कारण उस इलाके की महिलाएं गर्मी में दस-बारह किलोमीटर दूर से पानी भरकर लाती हैं। क्योंकि गांव के कुएं गर्मियों में सूख जाते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिये भी मांझी ने लंबी लड़ाई लड़ी। सरकारी दतरों के वर्षों तक चक्कर काटने के बाद कुछ गांवों में उन्होंने हैंडपंप लगवाए। दृढ़ संकल्प और इच्छा-शक्ति से उन्होंने एक और इतिहास रच डाला। अपने गांव में लोगों के मुंह से 'दिल्ली दूर है' की बात सुनते-सुनते दशरथ मांझी ने गांव से हजारों मील दूर दिल्ली की दूरी अपने पैरों से नाप ली। दो महीने में अपने गांव से दिल्ली पैदल आने के बाद वे खाली हाथ नहीं लौटे। तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री जगजीवन राम से उन्होंने अपने गांव में एक अस्पताल खुलवाने के लिए जमीन दान में ले ली। भारत सरकार ने उन्हें पांच एकड़ जमीन अस्पताल खोलने के लिये दे दी। हालांकि, बाहरी गांवों की जमीन होने के चलते उन्होंने वह जमीन छोड़ दी और सभी गांव वालों ने मिलकर पच्चीस एकड़ जमीन अस्पताल खोलने के लिए उन्हें सौंप दी। मांझी ने अपने इस दूसरे अधाूरे काम को पूरा करने के लिये मौत से पूर्व सरकार से मंजूरी ले ली। नीतीश सरकार ने भी उनका सम्मान करते हुये उस अस्पताल का नाम मांझी के नाम पर रखने की घोषणा कर दी है। उनसे प्रेम करने वाले लोग उनकी मौत से अधिाक दुखी इस बात से हैं कि सड़क पक्कीकरण और अस्पताल निर्माण का काम उनके जीते जी नहीं हो पाया। दशरथ मांझी ने  वह काम कर दिखाया जिसके लिए आज अत्याधुनिक औजारों की जरूरत महसूस होती है। उनका यह काम इतिहास में दर्ज हो चुका है, जो मौजूदा पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए भी निश्चित तौर पर प्रेरणास्रोत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनकी प्रेरणा से कई दशरथ मांझी पैदा होंगे।

ईमेल: smartgunjan@gmail.com

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