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विर्मश |
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गांधीगीरी की मिसाल |
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प्रसून लतांत |
अपने
वक्त में बापू एक मिसाल थे और आज के जमाने में उनके
विचार मशाल का काम कर रहे हैं। गांधी
के
दर्शन को लेकर आज भी फिल्में बन रही हैं। नाटक मंचित
हो रहे हैं। और खास बात यह है कि इस नाउम्मीद होती
दुनिया में उनकी व्यावहारिक तालीम से ही आस लगाई जा
रही है। हाल में एक चर्चित फिल्म
के जरिए गांधीगीरी
नामक एक नया जुमला चल पड़ा है। परंपरावादी गांधीजनों
को इस शब्द पर उज्र हो सकता है। पर चलताऊ अंदाज में
चलने वाली दुनिया को इस गांधीगीरी
में ही राह दिखती है। मुन्ना भाई की तरह अपने देश
में ऐसे सैकड़ों लोग हैं जिनकी गांधीगीरी
सार्थक सिध्द हुई है। यह उनके आसपास के लोगों के
जीवन के अंधेरे को मिटाने में लगी हुई है। आमलोगों
के बीच अभावों और कष्टों से जूझते हुए उभरे ऐसे
लोगों की कहानी भले मीडिया में प्रचार नहीं पा सकी
है,
लेकिन उनकी कोशिशों ने अनेक
लोगों की बेमतलब हो गई जिंदगी को भी जीने का मकसद दे
दिया है। ऐसे साधारण
लोगों की गांधीगीरी
यह संदेश दे रही है कि ठान लो तो हर मुश्किल आसान हो
जाती है। ऐसे लोग देश के हर कोने में मिल जाएंगे।
शुरुआत करते हैं उड़ीसा की उर्मिला बेहरा से,
जिनकी गांधीगीरी
पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित है। शायद इसीलिए वे
आज अपने राज्य में
'गछ
मां'
के नाम से विख्यात हो गई हैं।
उन्होंने पिछले पंद्रह सालों में अपने इलाके में एक
लाख से भी अधिक वृक्ष लगाकर हरियाली के प्रति
श्रध्दा और पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबध्दता की
नजीर पेश की है।
उर्मिला कोई पर्यावरणविद् नहीं
हैं। वे ग्लोबल वार्मिंग जैसे शब्दों से भी एकदम
अनजान हैं। लेकिन एक चीज बहुत अच्छी तरह जानती-समझती
हैं कि पेड़ मनुष्य और
धरती के लिए बहुत ही जरूरी
है। इसलिए पेड़ लगाना उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य
बना रखा है। पेड़ लगाने की चाह उर्मिला के मन में दो
बेटियों की मां बनने के बाद जगी। बेटे के अभाव में
उन्होंने अपने आंगन में एक पेड़ लगाकर उसे ही बेटे की
तरह प्यार व ममता देना शुरू कर दिया। इससे उनके मन
को न सिर्फ संतोष मिला बल्कि निरंतर अनगिनत पेड़
लगाने की भी प्रेरणा मिली। घर के आंगन से शुरू हुआ
पेड़ लगाने का उनका यह सिलसिला अब आसपास के साठ
गांवों में फैल चुका है। उर्मिला के इस काम का सबसे
अहम पहलू यह है कि खुद गरीब होने के बावजूद उन्होंने
इसके लिए सरकार या किसी संस्था के एक पैसा भी नहीं
लिया है,
बल्कि इस काम के लिए उन्हें अपनी
ही जमीन का एक हिस्सा बेचना पड़ा। अब उनके पास एक एकड़
से भी कम जमीन बची हुई है। लेकिन,
उनके काम का महत्व लोग समझने लगे
हैं, इसलिए अब वे अकेली
नहीं हैं। उनके साथ साठ-सत्तार लोग खुद जुड़ गए हैं।
उन्होंने पेड़ लगाने के काम को अधिाक व्यापक और कारगर
ढंग से करने के लिए 'वृक्ष
मां समिति'
का गठन किया है।
इसी तरह महाराष्ट्र के अमरावती जिले
की सिंधुताई सपकाल की गांधीगीरी
पर भी गौर किया जा सकता है। अपने राज्य में वे
'मदर आफ थाउजेंड'
यानी हजारों संतानों की मां के
नाम से जानी जाती हैं। सिंधुताई जब दस साल की थीं,
उनका विवाह एक अधेड़ के साथ कर
दिया गया। इसके बाद उन्होंने दो बच्चों को जन्म
दिया। लेकिन जब वह तीसरे बच्चे की मां बनने वाली थीं
तो उन पर लांछन लगाकर उन्हें घर से निकाल दिया गया।
अपनी तीसरी संतान को जन्म देने तक उन्होंने जानवरों
के रहने की जगह पर ही गुजारा किया। इसके बाद वे
रेलवे स्टेशन पर रहने चली गईं,
जहां उनकी मुलाकात घर से भागे,
भगाए और
सताए गए अनेक बच्चों से हुई। सिंधुताई ने अपने
बच्चों के साथ उन बच्चों को भी अपनी ममता की छांव
दी।
शुरुआती दौर में इन सभी बच्चों के
जीवन-यापन और अच्छे भविष्य के लिए साधन जुटाने में
सिंधुताई को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पर
आज तीस साल के अंतराल में सिंधुताई ने अपनी कामयाबी
की ऐसी इबारत लिख दी है कि कोई उनके प्रारंभिक जीवन
की विडंबनाओं और दुख को सुनकर द्रवित और हतप्रभ हो
सकता है।
सिंधुताई ने महाराष्ट्र के चार
जिलों में दर्जनों संस्थाओं का जाल बुन दिया है।
वहां बेसहारा बच्चों और महिलाओं को न सिर्फ आश्रय
दिया जाता है,
बल्कि वे भविष्य में कुछ बेहतर
कर सकें, इसके लिए
प्रशिक्षण् के साथ अन्य व्यवस्थाएं भी की जाती हैं।
अब सिंधुताई को चारों ओर सम्मान ही सम्मान मिलता
है। लेकिन जब उन्होंने अपने स्तर से आज के वर्तमान
को गढ़ना शुरू किया था,
तब उनके पास
बदहाली के अलावा कुछ नहीं था।
सहारनफर की साठ वर्षीया शिमला सैनी
की कहानी भी कम प्रेरक नहीं। जब विवाह कर वे ससुराल
आईं तो परंपरा और रीति-रिवाज के नाम पर थोपी जाने
वाली कई चीजें ढोंग लगीं। सिंदूर,
चूड़ियां
और रंगीन कपड़े त्याग कर उतर गईं गांव की कष्ट भोगती
महिलाओं के जीवन में खुशियां लाने के काम में। पहले
तो सभी ग्रामीण बहनों को संगठित कर शराब का विरोध
किया। फिर देखा कि गांव के स्कूल में लड़कियों को
शिक्षा से जान-बूझकर अलग रखा जा रहा है। उन्होंने
अपने प्रयास से अलग से एक नया स्कूल खोला और वहां
लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित की। जब महिलाएं शिक्षित
होने लगीं तो उन्हें स्वयं सहायता समूह से जोड़कर
आर्थिक दृष्टि से आत्मानिर्भर बनाने का सिलसिला शुरू
किया। उन्हें अपने हर काम में महिलाओं का साथ मिला
और वे कामयाब भी हुईं। उनका गांव सबदलफर पड़ोस के
गांवों के लिए अनुकरणीय गांव बन गया है।
वेश्याओं
का जीवन हमारे समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है।
कोई इस अंधोरे से निकल कर मिसाल बन जाए तो यह किसी
अचरज से कम नहीं। मुजफरफर में चतुर्भुज स्थान की
रानी बेगम पहले वेश्याओं के कोठे पर
धकेल दी गई,
पर वह
स्वयं चेतना से कोठे से बाहर निकलने में कामयाब हुई
और अपनी जैसी अनेक लड़कियों का जीवन बदल दिया।
उन्होंने स्कूल खोला फिर लड़कियों को प्रशिक्षण देकर
उन्हें वैकल्पिक रोजगार से जोड़ा।
उड़ीसा की कादंबिनी भुइयां पढ़ाई पूरी
करने के बाद अपना भविष्य तय करने प्रसिध्द समाज
सेविका रमा देवी के पास गईं। उन्होंने जो रास्ता
दिखाया वह उस पर आज भी चल रही हैं। उन्होंने महिलाओं
के उध्दार के अनेक कार्यक्रम किए,
पर अपना
विशेष धयान भुवनेश्वर के पास नाहरकांठा में वेश्याओं
की बच्चियों का जीवन बदलने में लगा दिया। उनकी कोशिश
रंग लाई। ये बच्चियां अपनी माताओं की हमराह बनने से
बच गईं और सम्मानपूर्वक जीवन जीने लगी हैं।
सरकारी अनुदान और निजी संस्थाओं की
आर्थिक सहायता से स्कूल चलाने की बात आम है लेकिन
क्या भीख में मिलने वाले चावल के सहारे भी कोई स्कूल
चल सकता है। इसको साकार कर दिखाया है कोलकाता से दो
सौ किलोमीटर दूर दक्षिणपाड़ा में प्रशांत नाम के एक
व्यक्ति ने। कभी नक्सली आंदोलन में शामिल रहे
प्रशांत ने इस ख्वाब के लिए अपने दो मंजिले पक्के
मकान को स्कूल में तब्दील कर दिया है। जहां गरीब
बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है। तीन साल पहले
शुरू हुए इस स्कूल में महज सात छात्र थे। लेकिन अब
इनकी संख्या पचास से ऊपर पहुंच गई है। प्रशांत के
मुताबिक कुछ दिन तो सब ठीक चला। लेकिन छात्रें की
तादाद बढ़ने लगी तो घर की फसल और नगदी से स्कूल चलाना
मुश्किल हो गया। स्कूल के लिए और
धन जुटाने की
उधोड़बुन में फंसे प्रशांत को अचानक एक नया विचार
सूझा। उन्होंने स्कूल की ओर से कटवा कस्बे और आसपास
के चार गांवों में करीब डेढ़ सौ घरों में मिट्टी की
एक-एक हांडी रखवा दी और लोगों से अपील की कि वे
हांडी में रोजाना एक मुट्ठी चावल डालें। सच्चे मन से
की गई इस अपील का असर यह हुआ कि हर महीने इन तमाम
हांडियों से दो क्विंटल चावल जमा होने लगा। इसमें से
आध
तो
छात्रें को भोजन कराने में खर्च हो जाता है और बाकी
चावल को बेचकर उससे मिलने वाली रकम से छात्रें को
कापी-किताब व कलम खरीद कर दी जाती है। प्रशांत की
लगन को देखकर गांव वाले उत्साह से चावल दान में देते
ही हैं,
पर अब तो कई युवक-युवतियां भी
उनके काम हाथ बंटाने लगे हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में कई और जगहों
पर बेमिसाल गांधीगीरी
पेश की जा रही है। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के
सिमगां गांव में पीयून गुरुजी के संबोधन सुनने पर
कोई भी चौंक जाता है। यहां के सरकारी स्कूल में
एकमात्र शिक्षक के तबादले के बाद जब लंबे समय तक कोई
नया शिक्षक नहीं आया और बच्चे स्कूल से हर रोज लौटने
लगे तो स्कूल के चपरासी ही शिक्षक की भूमिका में आ
गए। चपरासी कमल यादव ही पिछले कई सालों से स्कूल के
बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं।
इसी तरह बच्चों को पढ़ाने के काम में
फलिस वाले भी पीछे नहीं हैं। वे अपनी गांधीगीरी
की मिसाल भारत-पाकिस्तान की सीमा से सटे राजस्थान के
बाड़मेर जिले के रामसर फलिस थाने में कायम कर रहे
हैं। इस पुलिस थाने की पाठशाला में प्रतिदिन अस्सी
से ज्यादा बच्चे आते हैं। फलिस यहां गुरुजी की
भूमिका में हैं। इस पाठशाला में ज्यादातर बच्चे या
तो मुस्लिम लोकगायक मांगणियार बिरादरी के हैं या वे
बच्चे,
जो गरीबी के कारण स्कूल की दहलीज
नहीं चढ़ सके। थाने की बैरक को स्कूल का रूप देने
वाले फलिस इंसपेक्टर सुरेंद्र कुमार ने पहले एक-एक
सिपाही को इस काम के लिए प्रेरित किया। स्थानीय
लोगों ने भी मदद की। थार के मरुस्थल में विकास की
रफ्रतार
धीमी
है। पिछड़ेपन का घना अंधोरा है। ऐसे में थाने के बैरक
से शुरू हुआ सुरेंद्र कुमार का यह छोटा-सा प्रयास
परिवर्तन की गति तेज करने में अपनी भूमिका निभा रहा
है।
शारीरिक अक्षमता के बावजूद बिहार के
भागलफर जिले के नाथनगर क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय
की लड़कियों के बीच अनपढ़ता के अंधकार को दूर करने
में बीबी मोहम्मदी की गांधीगीरी
कमाल की है। शिक्षा के मामले में अत्यंत पिछड़ा माने
जाने वाले नाथनगर जैसे क्षेत्र में बचपन से
पोलियोग्रस्त मोहम्मदी ने जैसे-तैसे अपनी पढ़ाई पूरी
की,
पर इतने भर से उसे सुकून नहीं
मिला। वह अपने क्षेत्र की लड़कियों की निरक्षरता को
लेकर बहुत बेचैन रहती थीं। ऐसे में एक दिन उन्होंने
बगैर किसी से कोई मदद लिए अपने ही छोटे से घर में
लड़कियों को बुलाकर पढ़ाना शुरू कर दिया। उनकी मेहनत
का लोगों ने तब लोहा मान लिया जब उसने रोजाना तीन
शिफ्रटों में कोई साढ़े तीन सौ लड़कियों को पढ़ाना शुरू
कर दिया। उनकी इस निस्वार्थ और अपनी क्षमता से अधिक
कोशिश की ओर पूरे इलाके का धयान गया। इसका अंजाम यह
हुआ कि अब इस क्षेत्र में खुद अभिभावक ही अपनी
बच्चियों को पढ़ाने के लिए आगे आने लगे हैं। मोहम्मदी
ने अपनी यह कोशिश मुस्लिम बुनकरों के उस क्षेत्र में
शुरू की जहां लड़कियां तो दूर लड़कों को भी शिक्षा
देना जरूरी नहीं समझा जाता था।
भागलफर के ही पोठिया गांव के डा.
धरणीधार चौधरी आज की पीढ़ी के लिए खास मिसाल हैं।
वे बीस साल तक अमेरिका में रहे। एक बार जब अपने इस
गांव में वापस आए तो देखा कि वहां का हाल वैसा ही है,
जैसा छोड़ कर गए थे। बस फिर क्या
था! उन्होंने वापस अमेरिका जाने का फैसला रद्द कर कर
दिया और गांव के विकास में ही जुट गए। बच्चों को
पढ़ाने और नौजवानों को कुशल
बनाने लगे। अब उनका गांव विकास के नक्शे पर आगे आ
गया है और डा. चौधरी की गांधीगीरी
आसपास के गांवों पर भी असर डालने लगी है।
बंगलौर के पी राजा की गांधीगीरी
तो बहुतों
को
प्रभावित कर रही है। उन्हें बचपन में उनकी आपराधिक
प्रवृत्ति के कारण घर से निकाल दिया गया गया था। वे
अपराध की दुनिया में रम गए। इलाके में अपने करतूत
से पी राजा,
गुंडा राजा के नाम से कुख्यात होते चले गए। लेकिन एक
दिन तेजी से कार चलाते हुए वह एक भिखारी को बुरी तरह
घायल कर बैठे। बस उनसे हुई यह भूल उनकी जिंदगी को
बदलने की वजह बन गई। इसके बाद से वे गरीब बच्चों और सड़क पर बेमतलब जीवन जीते लोगों
के जीवन में खुशियां पैदा करने में जुट गए। उन्होंने आर्क
मिशन नाम की संस्था बनाकर लोगों की मदद शुरू कर दी
है। पर इसके साथ वे रोजाना आटो रिक्शा लेकर निकलते
हैं जिसमें प्राथमिक उपचार के सामान के साथ कंघी,
धुले
कपड़े और अन्य चीजें होती हैं। सड़कों पर मैले-कुचैले लोगों को नहलाना-धुलाना
उनके कपड़े बदलना,
बाल संवारना और फिर अपनी संस्था में
लाकर आगे की कार्रवाई करना उनकी रोज की चर्या हो गई
है। अब उनकी संस्था को लोग होम फार होप कहते हैं।
इसी
तरह की कोशिश कोलकाता के श्याम दा के नाम से चर्चित
श्याम बंदोपाधयाय भी करते रहे हैं। वैसे तो उन्होंने
जब होश संभाला तो खुद को सियालदह रेलवे स्टेशन पर
पाया। सिर पर कोई साया नहीं था,
पर स्थानीय विधायक
की मदद से उन्हें राज्य परिवहन में नौकरी मिल गई।
लेकिन वे सड़कों पर कष्ट झेलते हुए जीने वाले
भिखारियों की मदद में ही ज्यादा जुटे रहते। नौकरशाही
को उनका यह परोपकार पसंद नही आया और उन्हें नौकरी से
निकाल दिया गया। श्याम दा नौकरी से निकाले जाने के
बाद अपने काम में और रम गए। अब उनकी दिनचर्या सुबह
उठकर लोगों से पैसे,
अनाज,
फराने कपड़े और
दवाएं इकट्ठा कर बीमार और भूखे भिखारियों की सेवा
करना ही बन गई। बाद में उन्होंने कोलकाता में इनकी
विधिवत सेवा-सुश्रुषा करने के लिए अरविंद नर्सिंग
होम खोला। यहां भिखारियों का इलाज किया जाता है।
उन्होंने भिखारी गवेषणा केंद्र की स्थापना की। इस
केंद्र के जरिए पूरे देश में भिखारियों की समस्या का
अधययन किया गया और वे सूत्र खोजने के प्रयत्न किए
जाते हैं जिससे उनके जीवन में बदलाव आए।
बनारस के आराजी लाइन ब्लॉक के टड़िया
गांव के निवासी प्रकाश सिंह रघुवंशी की गांधीगीरी
देसी बीज बचाने पर केंद्रित है। प्रकाश देश भर में
घूम-घूम कर किसानों को जहां विदेशी कंपनियों के
खतरनाक इरादों से सावधान
कर रहे हैं,
वहीं वे
स्वयं तैयार किए गए उन्नत किस्म के बीजों का निशुल्क
वितरण भी करते हैं। किसान मिलन की यात्र करते हुए वो
अब तक एक लाख से अधिक सौ ग्राम गेहूं के बीजों के
पैकेट किसानों के बीच वितरित कर चुके हैं। इसी तरह
सूर्यकांत जालान ने वाराणसी-मिर्जाफर रोड पर स्थित
डगमगफर के लोगों को साथ लेकर ऐसा समृध्द किया है कि
यहां पैदा की जाने वाली सब्जियां और दूध आसपास के
सौ गांवों सहित शहरों को भी आपूर्ति की जाती हैं।
इसके अलावा उन्होंने शिक्षा और अन्य रोजगार को गांव
में ही उपलब्ध कर बता दिया है कि लोग चाहें तो
संगठित होकर अपने गांव को ही स्वर्ग बना सकते हैं।
और आजीविका के लिए महानगरों की ओर भागने की जरूरत
नहीं है।
गांधीगीरी
की मिसाल खड़ी करने वालों की कतार वैसे देश की आबादी
के हिसाब से बहुत छोटी है,
लेकिन दिल्ली,
फरीदाबाद,
नोएडा और गुड़गांव की मजदूर
बस्तियों में मेरी बरुआ,
एस ए आजाद, रेणु चोपड़ा,
हरिनंदन प्रसाद,
अनुराधा
बख्शी,
अंजना राजगोपाल,
श्रीरूपा मित्र चौधरी और रीना
बनर्जी आदि ने अपने-अपने प्रयासों से हजारों बेसहारा
बच्चों और महिलाओं का जीवन बदल दिया है। इनकी गांधीगीरी
की कहीं कोई चर्चा नहीं होती पर इनसे रोशनी पाने
वाले लोगों से पूछें तो उनका यही जवाब है कि अगर आज
ये न होते तो हम कहीं के नहीं होते।
ईमेल:
platant@yahoo.co.in
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