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 जनवरी,  2008

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देसी खेती से आई समृध्दि

                                                                  रवि शंकर

पश्चात्य संस्क्रति और आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव से देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि बुरी तरह प्रभावित हुई है। आधुनिक तकनीक के नाम पर जहां खेती के परंपरागत साधनों को विदा किया जा रहा है, वहीं खेती के विकास के लिए सोच और तरीके भी विदेशी होते जा रहे हैं। यही कारण है कि कभी भारतीय वृफषि की धुरी माने जाने वाले गाय व बैल आज सर्वाधिक उपेक्षित हैं। रासायनिक खादों का प्रचलन बढ़ने के कारण गोबर के उपले जलाए जा रहे हैं और ट्रैक्टर के बढ़ते उपयोग के कारण बेकार हुए बैलों का मांस निर्यात किया जा रहा है। इस अर्थ चर्क में कोई यह नहीं सोच रहा कि जिस कृषियोग्य भूमि से अधिकाधिक उपज प्राप्त करने के लिए यह किया जा रहा है, उसकी क्या हालत हो रही है।

श्री केलाश चौधरी पुश्तैनी रूप से खेती करते आ रहे हैं। प्रारम्भ में वे भी अन्य किसानों की तरह अपने खेतों में रासायनिक उर्वरकों का ही इस्तेमाल करते थे। 1993 में उन्होंने कहीं पढ़ा कि रासायनिक खेती से जमीन बंजर होती है और उसकी पानी रोकने की क्षमता भी घटती है। वे स्वयं भी अनुभव कर रहे थे कि उनके खेतों की जमीन सख्त होती जा रही थी और पैदावार भी स्थिर हो गई थी। पैदावार बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष खाद की मात्र बढ़ानी पड़ रही थी। एक जागरूक किसान होने के कारण श्री चौधरी ने और पता किया तो उनके धयान में आया कि रासायनिक खेती टिका नहीं होती। टिकाऊ तो देसी खेती ही होती है जिसे उनके पूर्वज हजारों वर्षों से करते आ रहे हैं। परंपरागत खेती में यदि नवीन शोध कार्यों को शामिल कर लिया जाए तो रासायनिक खाद की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं रहती। यह अनुभव कर उन्होंने 1995 में गोबर खाद बनाना शुरू किया। कोटफतली स्थित वृफषि विज्ञान केंद्र के एक वैज्ञानिक डा. जसवंत सिंह शेखावत ने उनकी इसमें काफी सहायता की। शेखावत ने उन्हें कम्पोस्ट बनाने की तकनीक सिखाई। दो वर्ष तक उनके निर्देशन में श्री चौधरी ने कम्पोस्ट बनाया। 1998 में सोसाइटी फार आर्गेनिक एग्रीकल्चर मुवमेंट (सोम) नामक एक संस्था से उन्हें 40 किलो केंचुए मिले। उन्हें लेकर श्री चौधरी ने वर्मी कम्पोस्ट भी बनाना शुरू किया। श्री चौधरी के पास कई गाय-बैल हैं। लेकिन कम्पोस्ट बनाने के लिए वे पास की गोशालाओं से भी गोबर खरीदते हैं। इस प्रकार कुल 100 बीघे खेतों में आज वे पूरी तरह से देसी खेती करते हैं। केवल दसवीं कक्षा उत्तर्ण श्री चौधरी ने इसके लिए अनेक प्रकार के प्रशिक्षण भी लिए और आज अपनी जागरूकता के कारण उनका ज्ञान काफी समृध्द हो गया है। 1998 में उन्होंने भोपाल में इसका तीन वर्ष का प्रशिक्षण लिया। वहां उन्होंने जैविक कीटनिरोधक बनाना सीखा। सामान्यत: नीम, आक, धतूरा, मट्ठा, गोमूत्र, तम्बावूफ, लहसुन और हवन की भभूत आदि से जैविक कीटनिरोधक बनाए जाते हैं। 1999 में उन्होंने औषधीय पौधों की खेती का प्रशिक्षण लिया और वर्ष 2000 से उन्होंने  आंवले के पेड़ लगाने शुरू किए। फिर बेल के भी पेड़ लगाए। वर्ष 2004 में आंवले की पहली फसल आई।

आंवले की पहली फसल आने पर श्री चौधरी को पहली और प्रमुख कठिनाई आई। आंवला उस वर्ष काफी सस्ता बिक रहा था। बाजार काफी मंदा था। फलत: अच्छी फसल के बाद भी उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ। श्री चौधरी इससे निराश नहीं हुए और नए रास्ते तलाशते रहे। फिर वे उत्तार प्रदेश के उन क्षेत्रें में गए जहां आंवले की खेती होती है। वहां उन्होंने देखा कि आंवले के प्रसंस्करण के गृह उद्योग काफी संख्या में चल रहे हैं। वहां से दो-तीन कारीगरों को अपने यहां बुलाया। 25 अक्तूबर, 2004 से उन्होंने आंवलों के प्रंसस्करण के लिए घर पर ही प्रंसस्करण केंद्र शुरू किया। फिर क्या था? श्री चौधरी ने आंवले के अचार, मुरब्बे, लड्डू जैसी चीजें बनानी शुरू की। इन उत्पादों की मारकेटिंग की। फलत: अब आंवले की खेती उन्हें अच्छा लाभ दे रही है। अब उन्होंने एक और प्रसंस्करण केन्द्र शुरू कर दिया है। इस केन्द्र को खोलने में उन्हें खादी आयोग की भी सहायता मिली। खेती तो सभी किसान करते हैं परंतु श्री चौधरी ने जिस प्रकार रासायनिक खेती को छेड़कर देसी खेती को अपनाया, वह एक उदाहरण है। उनका पूरा परिवार इस काम में लगा रहता है। वे और उनके बेटे खेती और उत्पादों की बिक्री का काम संभालते हैं तो उनकी बहुएं प्रसंस्करण केन्द्र में जुटी रहती हैं। श्री चौधरी ने देसी खेती से लाभ उठाने के बाद आस-पास के अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रेरित किया। उन्हें सभी जरूरी सहायताएं भी दीं। राजस्थान जैसे इलाके में जहां की मिट्टी गंगा तराई के मैदानी इलाकों के समान उपजाऊ नहीं है, श्री कैलाश चौधरी ने देसी खेती के सफल प्रयोग से एक मिसाल प्रस्तुत की है।

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन