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विर्मश |
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देश के लिए आशा की किरण |
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के.एन.
गोविन्दाचार्य |
भारत
के
उज्ज्वल भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी यहां की सज्जन
शक्ति है। यह शक्ति आज जिस मनोयोग से भारत के
फनर्निर्माण में लगी है,
उससे यह आशा बंधाती है कि हम
भारत को फिर से सोने की चिड़िया बना सकेंगे। अध्ययन
अवकाश के दौरान और उसके बाद विभिन्न स्तरों के लोगों
से मिलते हुए मुझे देश में सब स्थानों एवं स्तरों पर
एक नये आत्मविश्वास, एक
नयी स्फूर्ति का स्पष्ट आभास हुआ। सब स्थानों पर सब
स्तरों के लोग विभिन्न माधयमों से अपने सामर्थ्य,
अपने कौशल एवं अपनी क्षमताओं का
परिचय दे रहे हैं। सार्वजनिक हित के अनेक नि:स्वार्थ
कार्यों में लोग नये उत्साह एवं मनोयोग के साथ लगे
दिखते हैं। अनेक लोग जलसंरक्षण के कार्यों में लगे
हैं। लुप्त हुए नदी-नालों एवं तालाबों को फनर्जीवित
कर रहे हैं। अनेक देशी खेती के छोटे-बड़े प्रकल्पों
के माध्यम
से भूमि की सहज उर्वरता लौटा लाने का प्रयास कर रहे
हैं। अनेक विभिन्न स्तरों पर पाठशालायें चला कर
साधारण बच्चों के शिक्षण में जुटे हैं। फराने
मंदिरों एवं संस्थानों का जीर्णोध्दार करवा रहे हैं
और इनके माध्यम से सामुदायिक संप्रभुता एवं सक्रियता
के फरातन भारतीय भाव को फनर्जीवित करने का प्रयास कर
रहे हैं। अनेक अन्य लोग ऐसे ही विभिन्न प्रकार के
सार्वजनिक कार्यों में नि:स्वार्थ भाव से लगे हैं।
उन्हें किसी प्रकार के प्रचार या सरकारी प्रोत्साहन
की कोई जरूरत नहीं है। उनका प्रयास समाज का प्रयास
है। उसे समाज से ही ऊर्जा मिलती है। इन सार्वजनिक
कार्यों एवं संकल्पों में से कुछ तो अत्यंत बड़े स्तर
पर चल रहे हैं।
मैंने स्वैच्छिक प्रयासों से बनायी
गयी एवं चलायी जा रही गौशालाओं का एक वृहद तंत्र
देखा है। इसी प्रकार जल संरक्षण एवं देशी खेती से
संबंधित कुछ अत्यंत बड़े प्रकल्प चल रहे हैं। अन्य
अनेक प्रकल्प अपेक्षाकृत छोटे हैं और प्राय: किन्हीं
एक-दो ग्राम समुदायों तक ही सीमित हैं। लेकिन अच्छी
बात यह है कि इन छोटे-छोटे प्रकल्पों की बहुतायत है।
देश के कोने-कोने में हजारों की संख्या में फैले ये
प्रकल्प यह दर्शाते हैं कि भारत की सज्जन शक्ति में
देश को खुशहाल बनाने के लिए कितनी बेचैनी है।
सज्जनशक्ति की सक्रियता केवल रचनात्मक कार्यों में
ही नहीं बल्कि बौध्दिक एवं आंदोलनात्मक गतिविधियों
में भी दिखाई देती है। परंपरागत निधियों के
संरक्षण-संवर्धान एवं भारतीय जीवन को सकारात्मक बल
देने के लिए बहुविध शोध एवं अध्ययन किए जा रहे हैं।
राजसत्ता को जनाभिमुख बनाने के लिए भी प्रयास हो रहा
है। कुछ लोग सूचना के अधिकार का प्रयोग करते हुए
सरकारी तंत्र को अनुशासित एवं उत्तरदायी बनाने की
कोशिश कर रहे हैं,
जबकि कुछ
लोग जनजागरण के द्वारा सरकार की जनविरोधी नीतियों का
विरोध् करने में लगे हुए हैं। इन सब गतिविधियों से
अब यह स्पष्ट हो गया है कि भारत के लोग अपनी किसी
स्वयंस्फूर्त दिशा में चल निकले हैं। अपने
नि:स्वार्थ सार्वजानिक कार्यों के माध्यम से वे
राष्ट्रीय फनर्निर्माण में जुटे दिखते हैं। उनके
प्रयासों से समुदाय सशक्त हो रहे हैं और साधारण
लोगों में आत्मविश्वास लौट रहा है। सक्रिय
सज्जनशक्ति के बिना राष्ट्रीय फनर्निर्माण के इस
स्वरूप की कल्पना नहीं की जा सकती थी।
('लक्ष्य
की ओर'
पुस्तक
से साभार) |