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 जनवरी,  2008

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बीजों के फनर्जीवन की पहल

                                                                कुन्दन सिंह चम्याल 

पिछले दिनों शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी के कुल हजार पदों के लिए एक लाख आवेदन पत्र आए। यानी एक पद के लिए 100 लोगों ने आवेदन दिया। उत्तराखंड राज्य के बेराजगार युवाओं की संख्या का, यह आवेदन करने वाला एक छोटा सा भाग है। इस राज्य में लगभग सभी के पास कृषि भूमि है। काम खोजते इन युवाओं में अधिकांश किसान परिवार के होंगे। ये लोग खेती इसलिए छोड़ रहे हैं क्योंकि, अब खेत की उपज से उनका पेट नहीं भरता है।

पहाड़ में खेती की ऐसी दुर्दशा क्यों हो गई है? इसका कारण नजर आता है- सरकारी नीतियां। यहां जो विविधा प्रकार का अनाज लोग परंपरा से उगाते थे, वह अब नहीं उपजाया जाता। बदलाव आया है सरकार द्वारा प्रचारित, प्रसारित, समर्थित संकर बीजों, रासायनिक खादों, नई नकदी फसलों और नई 'उन्नत खेती' के तरीकों से इन सबको अपनाने में सरकार ने आरंभ में बहुत सहायता दी। वह अब समाप्त है। बाहर से आए संकर बीजों और कीटनाशकों के मूल्य में इतनी वृध्दि हुई कि किसान उन्हें खरीदने में असमर्थ हो गए हैं। नए बीजों, रासायनिक खादों, कीटनाशकों ने भूमि तथा उसके आस-पास पानी को विषाक्त कर दिया है। उर्वरता घटा दी है। अब लोग खेती छोड़ने को विवश हैं, वे राज्य तथा उसके बाहर नौकरी खोजने लग गए हैं। ऐसी स्थिति में पारंपरिक खेती को फनर्जीवित कर किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उत्तराखंड के कुछ लोगों ने 'बीज बचाओ आंदोलन' चलाया है। यह तय किया गया है कि जो किसान पारंपरिक बीजों द्वारा खेती करते हैं, वह उनका आपस में आदान-प्रदान करें और उसे बढ़ाएं। यह भी बताएं कि इन बीजों से कितना उत्पादन बढ़ा है। वह कितना सूखा सह सकते हैं और क्या कीटों से फसल की रक्षा कर सकते हैं? जिन किसानों ने पारंपरिक बीजों का प्रयोग किया है, उनके अनुसार उनकी एक हेक्टेयर भूमि में थापाचानी धान की उपज 70 क्विंटल तथा उसका फआल यानी भूसा 60 क्विंटल हुआ। इसके मुकाबले नए कस्तूरी बीज से 40 क्विंटल धान तथा 32 क्विंटल पुआल मिला।

इस तरह कई फसलों के पारंपरिक तथा नए संकर बीजों की खेती की उपज के कई प्रयोग किए गए। इसके तुलनात्मक अध्ययन किए गए हैं। सरकार की सहायता-प्रसार से कई बौनी फसलों तथा उनके लिए रासायनिक खादों को इतना अधिक बढ़ावा मिला कि अब कम ही किसानों के पास फराने पारंपरिक बीज बचे हैं। जिनके पास बचे हैं, वे केसे औरों की सहायता कर सकते हैं? क्या वे किसानों को अपनी समृध्दिदायी खेती की ओर लौटा सकते हैं? इन प्रश्नों पर खूब चर्चा होती है। किसानों से पत्र व्यवहार द्वारा तय किया जाता है कि कौन कितनी मात्र में पारंपरिक बीज एक दूसरे को देने में सक्षम होगा। और केसे उनका आदान-प्रदान होगा। यह देखने में आया है कि पारंपरिक बीजों की पैदावार संकर बीजों की उपज से अधिक पौष्टिक होती है। आंदोलन में लगे लोगों ने विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी कई पहाड़ी फसलों जैसे कौणी, ओगल, फाफर और रयांस, गहथ, उडद आदि दालों को फिर विस्तार से उगाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। बीज बचाओ अंदोलन के कार्यकर्ताओं की यह कोशिश उम्मीद जगाती है और ऐसा लगता है कि उत्ताराखंड के किसान जल्द ही अपनी मेहनत से खेती के गुण सम्पन्न पूर्व स्वरूप को प्राप्त कर लेंगे।

संपर्क: केन्द्रीय पुस्तकालय के निकट, खत्याड़ी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन