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विर्मश |
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बैंकनोटों की त्रासदी |
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जी जगन्नाथ
राजू |
समाज
में सकारात्मक बदलाव के लिए कई तरह
के प्रयोग हो रहे हैं। पर अभी भी कई क्षेत्र ऐसे हैं,
जहां परिवर्तन की खातिर पहल करने
की जरूरत है। मौद्रिक क्षेत्र इन्हीं में से एक है।
किसी भी व्यवस्था में मुद्रा का काफी महत्व होता है।
भारत में मुद्रा के रूप में बैंकनोटों और सिक्कों का
चलन है। बैंकनोटों से जुड़ी कई बातें ऐसी हैं,
जिनसे आमजन बेखबर हैं। हालांकि,
बैंकनोटों से तात्पर्य 10
रुपए, 20
रुपए,
50
रुपए... आदि के छपे कागजी रुपए
से है। बैंकनोटों के
धारक
के लिए बैंकनोटों का अर्थ बैंकनोटों का निधर्रित
मूल्य है। बैंकनोटों के लेन-देन में निधर्रित मूल्य
की वस्तु तथा सेवाओं का आदान-प्रदान हम करते हैं।
बैंकनोट देकर हम विविधा करों की अदायगी भी करते हैं।
किन्तु,
वस्तु तथा सेवाएं अदा न होने से
भी बैंकनोट देना पड़े,
बैंकनोट लेकर वस्तु तथा सेवाएं प्रदान नहीं किया गया
हो, बैंकनोटों का मूल्य
बैंकनोट जारी करने वाला बैंक न दे,
यह बैंकनोटों की
त्रसदी है।
आपने रोडटैक्स जमा नहीं किया,
आपको जुर्माना देना होगा। किन्तु
आपने रोडटैक्स जमा किया है और सड़क नहीं बनी तो भी
सम्बन्धित किसी व्यक्ति को न सजा होगी और न ही उन
पर जुर्माना होगा। आपने आयकर जमा नहीं किया तो आप पर
मुकदमा चलेगा। आपने आयकर,
बिक्रीकर, उत्पाद कर आदि
सब तरह के करों को अदा किया किन्तु सरकारी सेवाएं
खस्ता रहीं। अस्पताल है तो दवा नहीं अथवा डाक्टर
नहीं। विद्यालय है तो शिक्षक नहीं और शिक्षक हैं भी
तो विद्यार्थी शिक्षित नहीं हो रहे। जरूरतमंद लोगों
को सरकारी सेवाएं मिलें इसके लिए हम आयकर,
बिक्रीकर,
उत्पाद कर और
अनेक प्रकार के कर सरकार को देते हैं। उन विविध
करों की उगाही सरकार बड़ी तत्परता से करती है। कर
स्वरूप उगाहे गए बैंकनोटों के बदले जरूरतमंद लोगों
को सरकारी सेवाएं देने के लिए सरकार तत्पर नहीं
दिखती। इसे हमने बैंकनोटों की त्रसदी कहा है।
ऐसा कहने वाले लोग मिलेंगे कि
बैंकनोटों का चलन न होता तो व्यापार ठप्प हो जाए,
उद्योग बन्द हो जाएं,
शासन सम्भव न हो। किन्तु यह नहीं
भूलना चाहिए कि लेन-देन बैंकनोटों में होने से ही
आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं,
श्रमिकों का शोषण हो रहा है और
अमीर-गरीब की खाई गहराती जा रही है। बैंकनोटों का
लोभ ऐसा कि शासक सौदागर की भूमिका में हैं और कुशासन
हमारी नियति बन चुकी है। उग्रवाद,
आतंकवाद की जड़ में बैंकनोटों की
चाहत ही है। गृहयुध्द,
विश्वयुध्द आदि
बैंकनोटों के सहारे लड़े जाते हैं। बैंकनोटों के बल
पर ही प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माधयम से
अपसंस्कृति परोसी जा रही है। इसे हमने बैंकनोटों की
त्रसदी कहा है।
विक्रय मूल्य
(M.R.P)
दिखाकर वस्तु तथा सेवाओं के बदले
निधर्रित मूल्य के बैंकनोट हमसे लिए जाते हैं। ये
बैंकनोट उद्योगपति,
व्यापारी,
दलाल,
बिचौलिए आदि अनेक अन्य व्यत्तिाफयों में बंट जाते
हैं। इन्हीं लोगों के हाथों से कुछ बैंकनोट राजनेता,
धार्मिक
और समाजिक कार्यकर्ता तथा असामाजिक तत्वों एवं
कालाधन के रूप में अनेक अन्य लोगों में भी बंटता
है। हम यह नहीं जानते कि किसी वस्तु अथवा सेवाओं के
बदले दिए गए बैंकनोटों के बंटवारे में किन-किन
व्यत्तिाफयों ने कितने बैंकनोट लिए हैं। यह जान लेना
इसलिए आवश्यक है कि जिस किसी व्यत्तिफ ने बैंकनोट
लिया होगा उसने बदले में निधर्रित मूल्य की वस्तु
तथा सेवाएं प्रदान न की हो तो उस अनुपात में दिए गए
बैंकनोटों का मूल्य हमें नहीं मिलेगा। इसे हमने
बैंकनोटों की त्रसदी कहा है।
बैंकनोटों की त्रसदी के बारे में हम
आगे चर्चा करें इसके पूर्व बैंकनोटों के इतिहास की
चर्चा कर लेना आवश्यक है। भारतीय रिजर्व बैक का गठन
सन्
1935 ई. में हुआ। जब कि भारतवर्ष
में सन् 1770 ई. में
'बैंक आफ हिन्दुस्तान'
नाम से एक निजी बैंक ने
सर्वप्रथम बैंकनोट जारी किया। 1770
ई. से 1935
ई. के मधय कई निजी बैंकों ने
भारतवर्ष में बैंकनोट जारी किए। पूर्वी भारत में
'बंगाल बैंक', 'कलकत्ता
बैंक', 'कामर्शियल बैंक'
'यूनियन बैंक',
आदि प्रमुख निजी बैंकों ने
बैंकनोट जारी किया। दक्षिण भारत में 'कर्नाटक
बैंक', 'एशियाटिक बैंक',
'गवर्नमेंट बैंक', 'बैंक
आफ मद्रास' आदि प्रमुख
निजी बैंकों ने बैंकनोट जारी किया। पश्चिमी भारत में
'बैंक आफ बम्बई',
'ओरिएन्टल बैंक', 'कामर्शियल
बैंक आफ इण्डिया'
आदि प्रमुख निजी बैंकों
ने बैंकनोट
जारी किया। नोट
;छवजमध्द
अंग्रेजी शब्द है जिसका अर्थ
'लिखित
वायदा' से है। 'मैं
धारक
को पचास रुपए अदा करने का वचन देता हूं'
यह लिखित वायदा अर्थात् नोट
लिखकर कोई बैंक जब 10
रुपए, 20 रुपए, 50
रुपए... आदि छाप कर कागजी रुपए
जारी करता है तो बैंक द्वारा जारी किए गए उन कागजी
रुपयों को अंग्रेजी में
बैंकनोट
कहा जाता है। बैंकनोटों के
धारक
को
'रुपए'
अदा करने की बैंक की वचनबध्दता
(लिखित
वायदा) बैंकनोटों की पहचान है।
बैंकनोट
'रुपए'
कदापि नहीं हैं। इन निजी बैंकों
द्वारा बैंकनोट जारी किए जाने के कालखण्ड में
'रुपए'
कहने का अर्थ सोने,
चांदी के सिक्कों से था। एक तोला
चांदी से बना सिक्का 'एक
रुपए' कहलाता था। एक तोला
सोना से बना सिक्का 'एक
मोहर' कहलाता था। सोने की
एक मोहर का मान सोलह रुपए था,
अर्थात सोने के एक सिक्के
(मोहर) के बदले चांदी के सोलह
सिक्कों
;रुपयोंध्द का
लेन-देन होता था। सोने,
चांदी के रुपए के सिक्कों का इतिहास बैंकनोटों के
इतिहास से फराना है। सन् 1540
ई. में मुगल शासक शेरशाह सूरी ने
सोने, चांदी के 'रुपए'
के सिक्के
जारी किये थे। सोना अथवा चांदी के सिक्कों की
प्रतिभूति
(मैबनतपजपमेध्द
जितने
'रुपए'
किसी बैंक के पास जमा होता उतने
'रुपए'
के बैंकनोट निजी बैंक जारी करते
थे। यह निजी बैंकों द्वारा जारी बैंकनोटों का
स्पष्ट अर्थ होता था। बैंकनोट का
धारक
कोई व्यत्तिाफ बैंकनोट देकर बदले में सोने,
चांदी के सिक्के
(रुपए)
बैंक से ले सकता था।
सन्
1770
ई. में 'बैंक
आफ हिन्दुस्तान' नाम से
जिस निजी बैंक ने भारतवर्ष में सर्वप्रथम बैंकनोट
जारी किया उसने बैंकनोटों के
धारक
के प्रति अपनी वचनबध्दता को सदैव सिध्द किया।
'बैंक
आफ हिन्दुस्तान' द्वारा
जारी बैंकनोटों की नकल 'जाली
बैंकनोट' सन् 1810
ई. में देखे गए। लोग उन जाली
बैंकनोटों का लेन-देन न करें यह सावधान
करते हुए असली-नकली बैंकनोटों का अन्तर लोगों को
समझाने का प्रयास बैंक ने किया। उस वक्त अफवाह फैल
गई कि तुरत-फुरत बैंकनोट बैंक में जमा नहीं किए गए
तो बैंकनोटों के
धारकों
को सोने,
चांदी के सिक्के अर्थात 'रुपए'
बैंक से प्राप्त नहीं होंगे।
लोगों ने बैंक द्वारा जारी लगभग 18
लाख 'रुपए'
के बैंकनोट जितने जिसके पास थे
वह बैंक में जमा कर दिए। जमा किए गए उन बैंकनोटों के
बदले में लोगों को सोने,
चांदी के सिक्के ;रुपएध्द
बैंक ने दिए।
सोने,
चांदी के सिक्कों की प्रतिभूति
के एवज में बैंकों द्वारा बैंकनोट जारी किया जाना और
उन बैंकनोटों के
धारक
को बैंकनोटों के बदले में सोने,
चांदी के सिक्के
(रुपए)
देने की गारण्टी होना, इसे बैंकनोटों को
जारी करने की स्वर्णमान व्यवस्था (Gold
Standard System)
कहा गया। द्वितीय विश्वयुध्द के बाद
अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक परिस्थितियों में
आमूल परिवर्तन हुए। वैश्विक स्तर पर एक के बाद एक
देशों में लोकतंत्र की स्थापना होकर उन देशों में
नए-नए विधान
बने। कालान्तर में वैश्विक स्तर पर सब देशों ने
बैंकनोटों
को जारी करने की स्वर्णमान व्यवस्था को नकारते हुए
बैंकनोटों को जारी किया। वर्तमान में स्टेनलेस स्टील
से बने रुपए के सिक्के हैं। रिजर्व बैंक द्वारा जारी
बैंकनोटों के बदले बैंकनोटों के
धारक
को मूल्यहीन स्टेनलेस स्टील के बने रुपए
(सिक्के)
प्राप्त होते हैं। यह भी सच है कि 'भारतीय
रिजर्व बैंक' द्वारा जारी
बैंकनोटों पर ''मैं
धारक
को
(पचास)
रुपए अदा करने का वचन देता हूं''
यह वचनखण्ड मुद्रित होता है,
किन्तु बैंक द्वारा जारी
बैंकनोटों के
धारक
के प्रति रिजर्व बैंक की वचनबध्दता कहीं परिभाषित
नहीं है। इसे हमने बैंकनोटों की त्रसदी कहा है।
बैंकनोटों पर केन्द्रीय सरकार द्वारा
प्रत्याभूत लिखा होता है। केन्द्रीय सरकार द्वारा
प्रत्याभूत प्रतिभूतियों के एवज में रिजर्व बैंक नोट
छाप कर जारी करता है। बैंकनोटों का
धारक
कोई व्यत्ति कुछ एक रुपए का बैंकनोट रिजर्व बैंक
को यदि सफर्द करे तो उसे रिजर्व बैंक उतने रुपए की
वह प्रतिभूतियां नहीं लौटाता है,
जिन प्रतिभूतियों के एवज में
रिजर्व बैंक ने बैंकनोट जारी किया है। बैंकनोटों की
सरकारी गारण्टी तथा रिजर्व बैंक की वचनबध्दता आदि
जानने के लिए विगत पांच वर्षों में मैं तकरीबन दो सौ
पत्र रिजर्व बैंक को लिख चुका हूं। बैंक के मुम्बई
स्थित कार्यालय में पच्चीस बार जा चुका हूं। केन्द्र
सरकार के वित्ता मंत्रलय व प्रधानमंत्री
कार्यालय के चक्कर दो बार लगा चुका हूं। इस सम्बन्ध
में राष्ट्रपति सचिवालय में फरियाद कर चुका हूं।
विभिन्न विश्वविद्यालयों के अर्थशास्त्र विभाग के
प्राचार्यों से भी मिला। कोई उत्तार कहीं से नहीं
मिला और किसी ने इन प्रश्नों का उत्तार नहीं दिया।
बैंकनोटों का मूल्य, बैंकनोटों
की सरकारी गारंटी व रिजर्व बैंक की वचनबध्दता के
सम्बन्ध में न रिजर्व वैंक एक्ट में कहीं
कुछ लिखा हुआ है और न ही अर्थशास्त्र की फस्तकों में
उनकी व्याख्या है। इसे हमने बैंकनोटों की त्रसदी कहा
है।
भारतीय रिजर्व बैंक न स्वयं अपने लिए
और न ही भारत सरकार के लिए बैंकनोट जारी कर रहा है,
बल्कि वह आम जनता के लिए बैंकनोट
जारी कर रहा है। सरकार के लिए यदि रिजर्व बैंक
बैंकनोट छाप रहा होता तो विविधा कर लगाकर जनता से
सरकार बैंकनोटों की उगाही सरकार न करती। वस्तु अथवा
सेवाओं के आदान-प्रदान में बैंकनोटों का लेन-देन आम
जनता करती है और इस लेन-देन व आदान-प्रदान को बनाए
रखने के लिए ही रिजर्व बैंक बैंकनोट जारी कर रहा है।
अतएव आम जनता रिजर्व बैंक के बैंकनोटों का
धारक
है और आम जनता से सरकार बैंकनोट लेती है। इसलिए
बैंकनोटों के निधर्रित मूल्य का महत्व आम जनता के
लिए है। सार्वजनिक महत्व के इस विषय पर चर्चा होनी
चाहिए कि बैंकनोटों का वास्तविक मूल्य क्या है?
जिसे अदा
करने का लिखित वायदा बैंकनोटों पर छपा हुआ है।
सार्वजनिक महत्व के इस विषय पर चर्चा नहीं हो रही
है। इसे हमने बैंकनोटों की त्रसदी कहा है।
राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के
प्रणेता श्रीमान् गोविन्दाचार्यजी आंदोलन की चर्चा
में सार्वजनिक महत्व के विषयों पर पहल और प्रयोग
करने की बात करते हैं। बैंकनोटों के
धारक
के लिए बैंकनोटों का अर्थ जान लेना,
बैंकनोटों का मूल्य और बैंकनोटों
की सरकारी गारण्टी के बारे में जान लेना,
उस 'रुपए'
के बारे में जान लेना,
जिसे रिजर्व बैंक बैंकनोटों के
धारक
को देने के लिए वचनबध्द है,
यह सब कुछ
सार्वजनिक महत्व के विषय हैं। इन विषयों को जानने के
लिए हमने पहल की है और इन्हें जानकर हमने प्रयोग
करने का भी संकल्प लिया है।
संपर्क :
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