भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका

 जनवरी,  2008

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पहल और प्रयोगों से होगा बदलाव

विमल कुमार सिंह

किसी समाज की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें पहल और प्रयोग करने की कितनी क्षमता है। यह क्षमता उन समाजों में होती है जिन्हें अपने ऊपर विश्वास होता है, जो परिस्थितियों की प्रतिकूलता से भयभीत होकर ठहरने की बजाए अपना रास्ता बनाते चलते हैं। मानव इतिहास के ज्ञात इतिहास को जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमें मालूम होता है कि पहल और प्रयोग का अगुआ हमारा अपना भारत ही रहा है। जब पूरी दुनिया 'पशुता' के साम्राज्य में जीवन यापन कर रही थी, हमारे पूर्वजों ने 'मनुष्यता' की ओर बढ़ने के लिए पहल की और इसके लिए सभी आवश्यक प्रयोग किए। सभ्यता के लिए जो भी बुनियादी चीजें हो सकती थीं, उन्हें हमारे लोगों ने खोजा और विकसित किया। फ्रांस के विद्वान रोम्या ने कहा है, ''मनुष्य ने जिस दिन से सपने देखने शुरू किए, वे सपने कहीं जन्मे, फले और फूले तो दुनिया में वह केवल एक जगह है-भारत। भारत।''

इसे ईश्वर की व्यवस्था कहें या प्रकृति का न्याय, हम जानते हैं कि संसार में सदा के लिए कुछ नहीं होता। यहां सब कुछ चलायमान और परिवर्तनशील है। उन्नति के शिखर पर पहुंचने के बाद अवनति होती ही है। सो हमारी भी हुई। समय बीतने के साथ संभवत: हम कुछ आलसी और कुछ अहंकारी होते गए। पहल और प्रयोग करने की हमारी इच्छा शक्ति समाप्त होने लगी। हम समय के साथ चलने की बजाए जड़ होते चले गए। परिणामस्वरूप हम कमजोर होने लगे। धीरे-धीर इतने कमजोर हो गए कि अपनी रक्षा करना भी हमारे लिए असंभव हो गया और हम गुलाम हो गए। हम गुलाम उन लोगों के हुए जिनके पास पहल करने की इच्छा शक्ति थी और प्रयोग करने का सामर्थ्य था। सैनिक मामलों में यह बात विशेष रूप से सच है।

हजार वर्षों की गुलामी के दौरान भारत के लोगों में पहल करने और प्रयोग करने की क्षमता धीरे-धीरे कम होती गई, लेकिन वह समाप्त कभी नहीं हुई। समाज का एक हिस्सा हमेशा कुछ नया करने में जुटा रहा। हां यह बात अलग है कि समाज का सारा जोर गुलामी के कारण हो रहे नुकसान को कम करने में लग गया। प्रत्यक्ष गुलामी से मुक्त होने के बाद समाज की सज्जन शक्ति एक बार फिर से सकारात्मक प्रयासों में लग गई है। हम कह सकते हैं कि इतिहास का चक्र घूमते-घूमते अवनति के चरम बिंदु को पार कर गया है। वह अब उत्कर्ष की ओर गतिमान है। गुलामी के कालखंड में जो व्यवस्थाएं निर्मित हुईं, उन्हें तोड़कर अब अपनी व्यवस्था बनाने का समय आ गया है। इस दिशा में हमारा मूलमंत्र होगा पहल और प्रयोग, जिसे करने के लिए हमें हिम्मत जुटानी है।

हमें एक ऐसा वातावरण तैयार करना है जिसमें किसी सार्थक बदलाव के लिए की गई पहल या किए गए प्रयोग  के दौरान मिली असफलता को भी आदरणीय माना जाए। इससे पहल और प्रयोगों में समाहित असफलता को लेकर डर कम होगा। हमें यह बताना होगा कि निष्क्रिय बैठे रहने से कुछ अच्छा करने की कोशिश को नमन किया जाए, चाहे वह कोशिश असफल ही क्यों न हो। हम प्रत्येक असफलता से ही सफलता के मंत्र सीखेंगे। आगे बढ़ने का रास्ता ढूंढ सकेंगे। जब परिणाम को महत्व न देते हुए पहल और प्रयोगों को महत्व दिया जाएगा, उन्हें सराहा जाएगा, तभी स्थितियां सुधरेंगीं और हम धीरे-धीरे इच्छित परिणाम प्राप्त कर सकेंगे। पहल और प्रयोग के दौरान मिली असफलताओं पर हंसने वाला, उनका मजाक उड़ाने वाला समाज कभी भी आगे नहीं बढ़ सकता है। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा अनादिकाल से होता आ रहा है और होता रहेगा।

एक नए आत्मविश्वास के साथ भारत उठे और विश्व में अपना यथोचित स्थान ग्रहण करे, इसके लिए कई लोग सक्रिय हैं। के.एन. गोविन्दाचार्य उन्हीं में से एक हैं। पूरे देश की सज्जनशक्ति को जुटाने और उसके बीच संवाद, सहमति एवं सहकार की स्थिति उत्पन्न करने के लिए वे लगातार काम कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि भारत की सज्जन शक्ति आदेश और आज्ञापालन की जगह साहस, पहल और प्रयोग के सिध्दांत पर चले। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जहां कहीं भी चुनौतियां हैं, उनसे डरने या बचने की बजाय उनसे टक्कर ले। उनका कहना है कि समाज को सभी कार्यों के लिए सरकार पर निर्भर रहने की बजाए अपने ऊपर विश्वास करना सीखना होगा। उन्हीं की प्रेरणा से 'भारतीय पक्ष' की ओर से 'पहल और प्रयोग' विषय वस्तु पर यह विशेषांक प्रकाशित किया जा रहा है।

प्रस्तुत विशेषांक में हम उस भारत की एक छोटी सी झांकी प्रस्तुत कर रहे हैं, जो प्रतिकूल व्यवस्था से हताश न होकर उसे चुनौती देने में लगा है। उसमें पहल करने की इच्छा शक्ति है और प्रयोग करने का साहस भी है। आज जिस प्रकार का माहौल है, उसे देखकर लगता है कि समाज में ऐसे लोग बहुत कम हैं। लेकिन, वास्तव में ऐसा है नहीं। बड़े-बड़े महानगरों से लेकर छोटे-छोटे गांवों, यहां तक कि दूरदराज के जंगलों में भी ऐसे लोग बिखरे हैं जो वर्तमान व्यवस्था की चुनौतियों से घबराते नहीं हैं। बड़े दृढ़ निश्चय के साथ वे समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए काम में जुटे हैं। ये लोग टीवी चैनलों और अखबारों में कम ही दिखाई देते हैं। किन्तु ये उन लोगों को सहज ही दिखायी देते हैं जिन्हें इनकी सबसे अधिााक जरूरत होती है। अन्य लोगों को तो इन्हें ढूंढना पड़ता है।

ढूंढने का यह काम हमें भी करना पड़ा। पहले लगा कि विशेषांक के लिए पर्याप्त सामग्री जुट पाएगी क्या? लेकिन जब हमने काम शुरू किया, लोगों से चर्चा करनी शुरू की तो हमारे लिए यह मुश्किल हो गया कि किसको छापें, किसको छोड़ें। समाज में ढेरों ऐसे काम हो रहे हैं जिनसे देश की तस्वीर सुखद ढंग से बदल रही है। कामों की सूची बहुत लंबी थी, कह सकते हैं अनंत थी। लेकिन न तो हमारे पृष्ठ अनंत हो सकते थे और न ही हमारी क्षमता। विशेषांक को 160 पृष्ठों से ऊपर ले जाने के बाद भी हमें मलाल है कि हम कई ऐसे अच्छे कामों को इसमें शामिल नहीं कर पाए जो वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण हैं। विशेषांक में हम जिन कार्यों की जानकारी दे रहे हैं, उनके अलावा देश भर में ढेरों कार्य हो रहे हैं। कई तो यहां वर्णित कामों से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। हमारा प्रयास तो नदी में से एक अंजुरि पानी लेने जैसा ही कहा जा सकता है।

यह सच है कि समाज में ढेरों अच्छे कार्य हो रहे हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त तो नहीं ही कहा जा सकता। जरूरत है ऐसे कामों को और गति देने की, उन्हें फैलाने की। लोगों में यह भ्रांति तोड़ने की जरूरत है कि सामाजिक कार्य समर्थ और सक्षम लोग ही कर सकते हैं, या वे लोग कर सकते हैं जिन्हें अपने घर-परिवार से कोई मतलब नहीं है। प्रस्तुत विशेषांक में हमने इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश की है। हम यह दिखाना चाहते हैं कि पहल और प्रयोग के लिए प्रतिभा या संसानों की बहुत जरूरत नहीं होती। ये चीजें पूरक मात्र होती हैं। अकेले इनके दम पर कोई सामाजिक कार्य नहीं किया जा सकता। किसी भी सामाजिक कार्य को करने के लिए मूल आवश्यकता है समाज में सार्थक बदलाव करने की इच्छाशक्ति और उसे जमीनी हकीकत में बदलने का दमखम। जिस किसी व्यक्ति के अंदर यह सब है, उसके लिए यह विशेषांक पढ़ना निर्णायक सिध्द हो, ऐसी हमारी अपेक्षा है। हम कुछ अच्छे लोगों को कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित कर सके तो इसे हम अपनी सफलता मानेंगे।

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन