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धर्मसत्ता |
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यज्ञ और पर्यावरण संरक्षण का मेल
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विनय कुमार |
सहस्र चंडी महायज्ञ की महिमा का
शास्त्रें में बहुत बखान किया गया है। इसके महत्व को
देखते हुए हिन्दू धर्म के अनुयायी प्राय:इस यज्ञ का
आयोजन करते रहते हैं। इन यज्ञों की आयोजन विधि सभी
जगह लगभग एक जैसी रहती है, किन्तु
आचार्य अविनाश द्वारा आयोजित सहस्र चंडी महायज्ञ
अपने आप में अनोखा है। यह अनोखापन आयोजन विधि को
लेकर नहीं बल्कि यज्ञ के प्रसाद से
सम्बन्धित है।
आचार्य
अविनाश देश के ग्रामीण इलाकों में सहस्र चंडी
महायज्ञ का आयोजन करते हैं समाज की
धार्मिक
श्रध्दा को समयानुकूल दिशा प्रदान करते हुए
श्रध्दालुओं को अभिमंत्रित पौधों
का प्रसाद प्रदान करते हैं। श्रध्दालु इन पौधों
को घर ले जाकर बड़ी जतन से रोपते हैं और उनकी देख-भाल
करते हैं। यही कारण है कि आचार्य अविनाश द्वारा
वितरित लगभग सभी पौधो धीरे-धीरे स्वस्थ वृक्ष बनने
की ओर अग्रसर हैं। सरकार वन विभाग के
माध्यम से
करोड़ों रुपए खर्च करके भी जिस कार्य को नहीं कर पा
रही थी,
उसे आचार्य अविनाश ने जनसहयोग से सहज
ही कर दिखाया है।
एक सुशिक्षित जूनियर इंजीनियर के
पुत्र श्री अविनाश गृहस्थ होते हुए भी अपनी सामाजिक,
धार्मिक
प्रतिबध्दता को लेकर किसी संन्यासी और कर्मठ
समाजसेवी की तरह ही सक्रिय हैं। इलाहाबाद
विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. की पढ़ाई के बाद आपका मन
सरकारी नौकरी या पारंपरिक काम धधों
की ओर आकर्षित नहीं हुआ। उनके मन में ज्योतिष का
ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हुई। अपनी इस
इच्छा को कार्यरूप देते हुए उन्होंने हैदराबाद,
बनारस,
इलाहाबाद और हरिद्वार में पांच
वर्ष तक ज्योतिष की शिक्षा प्राप्त की और तत्पश्चात
इलाहाबाद,
को केंद्र बनाकर ज्योतिषाचार्य के
रूप में कार्य करना प्रारंभ कर दिया।
ज्योतिष के आधार
पर लोगों
का मार्गदर्शन करने के साथ-साथ आचार्य अविनाश
विभिन्न सामाजिक समस्याओं के समाधान
को लेकर भी सक्रिय रहे। पर्यावरण संरक्षण को लेकर
उनके मन में कुछ करने की विशेष इच्छा थी। उनका मानना
था कि प्रत्येक गृहस्थ को अपनी संतान के साथ-साथ कम
से कम किसी एक पौधो का भी पालन-पोषण करना चाहिए। जिस
प्रकार वह अपने बच्चों को एक आदर्श नागरिक बनाने के
लिए प्रयासरत रहता है,
उसी तरह एक पौधो की देखभाल करते
हुए उसे स्वस्थ वृक्ष बनाना भी उसका दायित्व है। इस
मूल सोच के अनुसार देश के कोने-कोने में लोगों को
कार्य करने के लिए केसे प्रेरित किया जाए,
आचार्य अविनाश के सामने यह एक
बड़ी चुनौती थी। केवल उपदेश देने या लोगों को
कार्ययोजना मात्र बता देने से कुछ नहीं होगा,
यह बात
उनके सामने बिल्कुल स्पष्ट थी।
इसी क्रम में उनके मन में आया कि
क्यों न हिन्दू समाज की
धार्मिक
श्रध्दा को एक समयानुकूल दिशा प्रदान की जाए। उनके
इस पुनीत विचार को ईश्वर ने भी मौन सहमति देते हुए
मार्ग की बाधाओं
को धीरे-धीरे दूर करना प्रारम्भ कर दिया। जिन दिनों
आचार्य अविनाश सहस्र चंडी महायज्ञ के माध्यम से
पर्यावरण संरक्षण की योजना बना रहे थे,
उन्हीं दिनों इलाहाबाद
विश्वविद्यालय के छात्र पंकज राय ज्योतिष सम्बन्धी
मार्गदर्शन के लिए उनसे मिले। मूलत: बलिया के रहने
वाले श्री पंकज अंग्रेजी से एम.ए. करने के बाद गायन
में अपना कैरियर बनाना चाहते थे,
किन्तु आचार्य अविनाश से चर्चा
के बाद उन्होंने भी यज्ञ के
माध्यम से पर्यावरण
संरक्षण की योजना से आजीवन जुड़े रहने का संकल्प ले
लिया। धीरे-धीरे इस पुनीत कार्य के लिए वेदाचार्यों
एवं कार्यकर्ताओं की एक टीम बनकर तैयार हो गई,
जो
धार्मिक
प्रयोजन एवं पर्यावरण संरक्षण के कार्य को एक नई
दिशा देने के लिए तत्पर थी। अपने सहयोगियों के साथ
गहन विचार-विमर्श के पश्चात आचार्य अविनाश ने निर्णय
लिया कि पहले अपनी कार्ययोजना को किसी एक क्षेत्र
में कार्यान्वित कर प्रमाणित करना चाहिए कि यह एक
व्यावहारिक योजना है। विभिन्न क्षेत्रों का
तुलनात्मक अधययन करने के पश्चात उत्तार प्रदेश के
आजमगढ़ जिले को कार्य करने के लिए चुना गया। शुरुआती
यज्ञों को आयोजित करने के लिए आवश्यक जनसमर्थन
जुटाने में आचार्य अविनाश एवं उनके सहयोगियों को
काफी प्रयास करना पड़ा। किंतु अब जगह-जगह से उन्हें
इस तरह के यज्ञ आयोजित करने के लिए लोगों के
निमंत्रण आने लगे हैं।
जिस स्थान पर यज्ञ किया जाना होता है,
उसकी पहचान कुछ महीने पहले ही कर
ली जाती है। आयोजन तिथि से कुछ सप्ताह पूर्व आचार्य
अविनाश अपने सहयोगी श्री पंकज एवं कुछ वेदाचार्यों
के साथ आयोजन स्थल पर पहुंचते हैं। पहुंचने के साथ
ही आसपास के गांवों और स्कूल-कालेजों में व्यापक
जनसंपर्वफ अभियान चलाया जाता है। अपने ज्योतिष ज्ञान
के कारण आचार्य अविनाश को लोगों से संपर्क स्थापित
करने में विशेष मदद मिलती है। समाज में
धार्मिक
कार्यों के लिए जो श्रध्दा एवं सहयोग भावना है,
उसके कारण यज्ञ के लिए आवश्यक
संसाधनों का प्रबंध स्थानीय लोगों के सहयोग से ही
किया जाता है। प्रसाद वितरण के लिए पौधों की
व्यवस्था, यज्ञ स्थल पर
मंडप का निर्माण,
खाद्यसामग्री एवं अन्य सभी आवश्यक वस्तुओं को खरीदने
की जरूरत नहीं पड़ती। नौ दिन तक चलने वाले प्रत्येक
यज्ञ में लगभग 50-60
हजार श्रध्दालु
हिस्सा लेते हैं।
यज्ञ आयोजन के प्रत्येक दिन समाज के
किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति को यज्ञ में भाग लेने के
लिए आमंत्रित किया जाता है। प्रतिदिन यज्ञ के
111
यजमान दंपतियों एवं आमंत्रित
अतिथियों की उपस्थिति में पौधों में मंत्रोच्चार के
साथ प्राणप्रतिष्ठा की जाती है और तत्पश्चात इन
मंत्रपूत पौधों को आमंत्रित अतिथि द्वारा यजमान
दंपतियों एवं अन्य श्रध्दालुओं के बीच प्रसाद रूप
में वितरित किया जाता है। पौधो को प्रसाद रूप में
ग्रहण करने के पश्चात प्रत्येक श्रध्दालु सीधो अपने
घर जाकर उसको रोपता है। यज्ञ में भाग लेने वाले
यजमान दंपति एवं अन्य श्रध्दालु प्राय: आसपास के
गांवों और कस्बों के निवासी होते हैं। तथापि,
लोगों के बीच जाति एवं धर्म को
लेकर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। यद्यपि मुसलमान
यज्ञ में भाग नहीं
लेते, परंतु यज्ञ के लिए
आवश्यक संसाधन जुटाने में वे भी बढ़-चढ़कर भाग लेते
हैं और प्रसाद रूप में पौधों को सहर्ष स्वीकार करते
हैं। घोषी और आजमगढ़ शहर में आयोजित यज्ञों के दौरान
मुसलमान बंधुओं
का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ।
आजमगढ़ जिले के
दुर्वासा क्षेत्र में अयोजित तीसरे सहस्र चंडी
महायज्ञ के दौरान एक मुसलमान बुध्दिजीवी अब्दुल अहद
रहबर ने भी श्रध्दालुओं को संबोधित किया था। श्री
रहबर ने भगवान राम के चरित्र को लेकर एक नए महाकाव्य
की रचना की है।
आचार्य अविनाश पिछले कई सालों से जिस
प्रकार यज्ञ के
माध्यम से समाज की एक गंभीर समस्या के
प्रति लोगों में चेतना उत्पन्न कर रहे हैं,
उन्हें कुछ करने के लिए प्रेरित
कर रहे हैं, वह अपने आप
में अद्भुत एवं सराहनीय है। हम अपने
धार्मिक
रीति-रिवाजों,
कर्मकांडों एवं मान्यताओं को किस
प्रकार वर्तमान सामाजिक समस्याओं के समाधान
में उपयोग कर सकते हैं,
आचार्य अविनाश का प्रयोग इसका एक
बहुत अच्छा उदाहरण है। हम एक नई सोच के साथ विभिन्न
क्षेत्रों में ऐसे ही प्रयोगों को बढ़ावा दें,
समाज को
आज इसकी सख्त जरूरत है। सार्थक बदलाव की बयार ऐसे ही
बहेगी। |