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जनजागरण |
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उत्पीड़न के खिलाफ जंग |
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आनंद
कुमार
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नारी
को
आदि शक्ति का दूसरा रूप कहा गया है।
पुराणों
और महाकाव्यों में कहा गया है कि जिस स्थान पर
नारियों का सम्मान होता है,
वह स्थान स्वर्ग के समान है। आज
भी हमारे देश की संस्कृति में नारी को घर की लक्ष्मी
का दर्जा प्राप्त है। पहले महिलाएं घर की चारदीवारी
के अंदर रहकर कार्य करती थीं। लेकिन बदलते समय और
जमाने के साथ महिलाओं ने अपने कदम घर के बाहर ही
नहीं बल्कि अंतरिक्ष तक बढ़ा दिए हैं। आज महिलाएं हर
क्षेत्र में
पुरुषों के साथ कंधो से कंधा
मिलाकर कार्य कर रही हैं। वहीं दूसरी तरफ अभी भी
हमारे समाज में महिलाओं का शोषण जारी है। देश की राजधानी
दिल्ली में ही महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और
अत्याचार की घटनाएं लगातार उजागर हो रही हैं। लेकिन
सिक्के के दूसरे पहलू की तरफ देखे तो आज भी हमारे
समाज में महिलाएं ही सबसे उपेक्षित और शोषित हैं। एक
तरफ तो सरकार के सफेदपोश नेता महिलाओं के आरक्षण और
उन्हें आगे लाने की बात करते है,
वहीं राजधानी
दिल्ली में ही महिलाओं के साथ दुरर्व्यवहार
और अत्याचार
धड़ल्ले से जारी है। इन शोषित और
प्रताड़ित महिलाओं में से कुछ ने तो डर और आतंक के
कारण इन सब चीजों से मुंह फेर लिया। वहीं दूसरी तरफ
कुछ महिलाओं ने अपने ऊपर हुए अत्याचार और उत्पीड़न के
खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। ऐसी ही एक महिला
निर्मला शर्मा हैं,
जिन्होंने न केवल महिलाओं के
न्याय के लिए आवाज उठाई बल्कि पूरे समाज में
व्याप्त सामाजिक बुराई के खिलाफ जंग का बिगुल भी
बजाया।
निर्मला शर्मा ने समाज में हो रहे तमाम अत्याचार,
शोषण और भ्रष्टाचार के विरोध
में आंदोलन की शुरुआत की है। समाज से जुड़े हर वर्ग
के लोगों की मदद करना उनका मुख्य उद्देश्य बन गया
है। 7 मार्च 1947
को उत्तारप्रदेश के एक
मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी निर्मला शर्मा का
शुरूआती जीवन गृहस्थी में ही गुजरा। उन्होंने पंजाब
से मैट्रिक, इलाहाबाद
विश्वविद्यालय से इण्टर और हिन्दी में महाविदुषी की
परीक्षा भी उत्ताीर्ण की। सन् 1963
में 16
साल की अवस्था में उनका विवाह,
आगरा निवासी अमरनाथ शर्मा के साथ
हुआ। अमरनाथ शर्मा सुलझे व्यक्तित्व के मालिक थे,
जिन्होने निर्मला शर्मा के हर
कदम में उनका भरपूर साथ दिया। सन् 1963
से लेकर सन् 1989
तक निर्मला शर्मा ने एक पत्नी,
मां और कुशल गृहिणी की भूमिका
निभाई। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। निर्मला
शर्मा के साथ 1989 में
घटित एक हृदयविदारक घटना ने उनकी दुनिया बदलकर रख
दी। सन् 1989 में वीपी
सिंह सरकार के समय आरक्षण विरोधी
गतिविधियां चला रही थीं,
जिसमें फलिस की बर्बरता का शिकार
छात्रें के साथ कुछ निर्दोष महिलाएं भी हुईं। उन
निर्दोष महिलाओं में निर्मला शर्मा भी शामिल थीं। इस
घटना में फलिस ने महिलाओं के साथ मारपीट की और उन्हे
अपमानित किया। महिलाओं पर लाठियां बरसायी गईं और
उनका बाल पकड़कर घसीटा गया। महिलाओं पर हुए फलिसिया
जुल्म के विरोध में निर्मला शर्मा ने तमाम सफेदपोश
नेताओं से मदद की गुहार की लेकिन किसी ने भी इनकी
मदद नहीं की। निर्मला शर्मा ने फलिसिया जुल्म के
विरोध में एक आंदोलन छेड़ा और अंतत: फलिस को अपने
निंदनीय कार्य के लिए क्षमा मांगनी पड़ी
निर्मला शर्मा के इस साहसिक कदम से प्रभावित होकर कई
लोगों ने उन्हें महिला संगठन बनाने की सलाह दी। इसका
परिणाम सन्
1991
ई. में 'जागृति
महिला समिति' संगठन के
रूप में सामने आया। 'जागृति
महिला समिति' का पहला
आंदोलन अपने नाम को पंजीकरण कराने से ही शुरू हो
गया। घुसखोरी से ग्रसित पंजीकरण कार्यालय में
50 रुपये की जगह 1500
रुपये मांगे जा रहे थे। निर्मला
शर्मा ने इसका फरजोर विरोध किया और 50
रुपये में ही 'जागृति
महिला समिति' के नाम का
पंजीकरण करवाया। इस घटना के बाद निर्मला शर्मा ने
फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने को पूरी तरह से
सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। 'जागृति
महिला संगठन' के तहत पति
द्वारा प्रताड़ित महिलाओं,
दहेज उत्पीड़न से ग्रस्त महिलाओं को न्याय दिलाया और
राजनेताओं की झूठी योजनाओं का पर्दाफाश किया गया। इस
क्रम में 'जागृति महिला
संगठन' ने 'दिल्ली
मिल्क स्कीम' में जारी
कालाबाजारी को भी उजागर किया। सन् 1993
में एक अबला स्त्री को उसका हक
दिलाने के क्रम में निर्मला शर्मा को फलिस की मार,
जेल यातना और गंदी गालियां सहनी
पड़ीं। लेकिन इन सब से हार न मानकर निर्मला जी ने
फलिस की चुनौती स्वीकार की और जीत हासिल की। एक
दुर्घटना में पश्चिम विहार के 73
दुकानदारों की दुकानें जल गईं।
अपने दुखों और उत्पीड़न की गाथा लेकर ये दुकानदार
'जागृति महिला समिति'
पहुंचे और निर्मला शर्मा से
मिले। इन दुकानदारों को न्याय दिलाने के लिए निर्मला
शर्मा आंदोलन में कूद पड़ीं। 29
दिसम्बर 1998
से 7
जनवरी 1999 तक हाड़ कंपा
देने वाली ठंड में भूख हड़ताल की। इस दौरान कई बार
फलिस ने लाठी चार्ज किया और उन्हें अपमानित किया। आज
भी निर्मला शर्मा आंदोलनरत हैं। अब लोग निर्मला
शर्मा को प्यार से माता जी कह कर संबोधिात करते हैं।
इनका कहना है कि मैं अपनी अंतिम सांस तक समाज में
विद्यमान कुरीतियों,
अत्याचार और शोषण के विरुध्द लड़ती रहूंगी चाहे इसके
लिए मुझे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। निर्मला
शर्मा ने कभी कोई फरस्कार नहीं स्वीकारा। उनका कहना
है कि हमारा काम लोगों को न्याय दिलवाना है न की
अवार्ड लेना।
निर्मला शर्मा कहती हैं,
'हम लोग बड़ी जल्दी से आसान
रास्ते ढूंढ लेते हैं,
जो
भ्रष्टाचार को और मजबूत करते हैं। लोगों को चाहिए कि
वे अपने अधिकारों के लिए लड़ें और समाज तथा देश से
भ्रष्टाचार का सफाया करें ।
ईमेल:a
nandsingh2684@gmail.com |