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जनसेवा |
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स्नेह का आश्रम: निवेदिता आश्रम |
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भारतीय पक्ष
ब्यूरो |
अनाथ शब्द को सुनते ही हमारे मन में
वैसे बच्चों की छवि उभरती है,
जिनके माता-पिता या अन्य कोई
सगे-संबंधी
नहीं होते,
जिन्हें समाज से प्यार और अपनेपन
की जगह नफरत और तिरस्कार मिलता है। रेलवे स्टेशनों,
सड़कों,
चौराहों पर
वक्त-बेवक्त घूमते नजर आने वाले इन अनाथ बच्चों का न
तो अपना कोई वर्तमान होता है और न सार्थक भविष्य।
ऐसे ही रेलवे स्टेशनों पर घूमने वाले
अनाथ बच्चों की स्थिति से द्रवित हो महेश वाधवानी ने
इन बच्चों के लिए निवेदिता आश्रम नामक संस्था की
शुरुआत झारखंड की राजधानी
रांची में की। यह आश्रम उन बच्चों को केवल छत,
तन ढंकने के लिए वस्त्र और पेट
भरने के लिए भोजन ही उपलब्धा नहीं कराता है बल्कि
इसके माध्यम से बच्चों को सम्पूर्ण पारिवारिक माहौल
भी मुहैया करवाया जाता है। ऐसी कोशिश की जाती है कि
बच्चों के जीवन में स्वाभिमान और स्वावलम्बन की
भावना पनप सके और वे प्रतिभावान एवं चरित्रवान
व्यक्ति बनें। इससे पहले भी महेश वाधवानी ईसाई
मिशनरियों के माध्यम से अनाथ बच्चों की सेवा में लगे
हुए थे। लेकिन वे उनकी कार्य-प्रणाली
से नाखुश थे। वहां उन्होंने पाया कि ये मिशनरियां
बच्चों को वस्त्र, भोजन आवास
उपलब्धा कराने तक ही अपनी जिम्मेदारी मानती हैं।
उनके लिए बच्चों का समुचित एवं सर्वांगीण विकास कोई
मायने नहीं रखता। इसलिए उन्होंने वहां अपनी सेवा बंद
कर दी। इसी अनुभव के आधार
पर उन्होंने तीन बच्चों के साथ अपने इस आश्रम की
शुरुआत की। आज उनके प्रकल्प में कई बच्चे हैं जिनमें
से कुछ विकलांग भी हैं। आश्रम में बच्चों को शामिल
करने की कोई आयुसीमा नहीं है। ये उन्हीं बच्चों को
अपने परिवार में शामिल करते हैं जिन्हें इनकी
आवश्यकता है। अभी कुछ दिनों पूर्व रेलवे स्टेशन से
एक बच्चे को,
जो असामाजिक तत्वों के हाथ लगने
वाला था,
एक ई.सी.एल. कर्मचारी ने छुड़ाकर
इन्हें सौंपा। आज वह बालक इनके परिवार का सदस्य है।
सभी बच्चों के शैक्षिक विकास के लिए
उनका विद्यालय में नामांकन करवाया गया है। श्री
वाधवानी ने उनके समग्र विकास के लिए तकनीकी शिक्षा
की भी व्यवस्था की है,
जो उन्हें दिव्यायन संस्था
द्वारा प्राप्त होती है। इनमें मुख्य है - सिलाई
करना, जूट के समान बनाना,
पत्थरों
से मूर्तियां बनाना आदि। इस व्यावसायिक शिक्षा का
कार्यकाल तीन से छ: महीने तक का होता है। विकलांग
बच्चों एवं बच्चियों के लिए भी इन्होंने विशेष
व्यवस्था कर रखी है।
आश्रम के सामने परेशानियों की भी कमी
नहीं है। आर्थिक समस्या इसकी मुख्य समस्या है।
इन्हें सरकार से किसी प्रकार का सहयोग या अनुदान
नहीं मिलता है। कभी-कभी आर्थिक तंगी और आश्रम की
जरूरतें इन्हें कर्ज लेने पर भी विवश कर देती हैं।
कुछ असामाजिक तत्व भी इनके दानदाताओं
और सहयोगियों को अफवाह फैलाकर भ्रमित करते हैं। फिर
भी श्री वाधवानी अपने निश्चय पर अडिग हैं और वे
अपने सेवा भाव में कोई कमी नहीं आने देते। श्री
वाधवानी कहते हैं,
''मुझे सरकार से कुछ नहीं चाहिए।
मुझे सिर्पफ समाज से सहयोग चाहिए।''
वे आगे कहते हैं, ''मैं
इस आश्रम का संस्थापक या व्यवस्थापक नहीं हूं। यह
मेरा परिवार है और मैं इन बच्चों का अभिभावक हूं।''
उनके
आश्रम के कई बच्चों को अपना घर मिल गया है। उन्हें
दम्पतियों ने गोद लिया है।
संपर्क: निवेदिता आश्रम,
बिरसा संस्थान,
आरोग्य भवन,
बरियातु रोड,
रांची,
झारखंड |