|
धर्मसत्ता |
|
शादी में किया क्रांति का सूत्रपात |
|
हिमांशु शेखर |
ऐसा
कहा
जाता है कि बगावत का तेवर जवाहर लाल नेहरू
विश्वविद्यालय की फिजाओं में व्याप्त है। यह बात और
पुख्ता इसलिए हो जाती है कि दिल्ली के दक्षिणी छोर
पर बसे इस विश्वविद्यालय ने कई आंदोलनों और
आंदोलनकारियों का सृजन किया है। यहां आन्दोलन का
दायरा नारा लगाने,
धरना देने से कहीं ज्यादा व्यापक
है। 2005 में जे.एन.यू से
पासआउट एक छात्र अमित कल्ला ने अपनी शादी को ही
आंदोलन का हिस्सा बना दिया। जनाब ने अपनी शादी बड़े
क्रांतिकारी ढंग से रचाई है। हालांकि,
आंदोलन और क्रांति जैसे शब्दों
को शादी के साथ सुनना और समझना अधिकांश लोगों को
अटपटा लग सकता है,
लेकिन यह सच है।
आम तौर पर राजस्थान की शादियां ताम-झाम से सराबोर
होती हैं। एक बड़ा वर्ग इसे रसूख का पैमाना मानता है
तो वहीं दूसरी तरफ कम ही सही लेकिन ऐसे लोग भी हैं
जो इस ताम-झाम को महज दिखावा मानते हैं। अमित दूसरी
तरफ वालों में हैं और सही मायने में कहा जाए तो अब
उस कतार में सबसे आगे खड़े हो गए हैं। भारी विरोध के
बावजूद उन्होंने अपनी शादी तमाम आधुनिक आडंबरों को
त्याग कर प्राचीन वैदिक पध्दति से की है।
राजस्थान की शादियों में अभी भी
सामंती छाप स्पष्ट तौर पर दिखती है। राजा-रजवाड़ों की
नकल की ललक इस प्रांत के हर तबके में है,
जो विवाह के वक्त सार्वजनिक हो
जाती है। जोधपुर समेत इस राज्य के कई शहरों में तो
शादियों की खातिर कर्ज देने के लिए बाकायदा निजी
बैंक चल रहे हैं। अमित बताते हैं, 'ये
बैंक चल ही नहीं रहे हैं बल्कि इनका धंधा
सरपट दौड़ रहा है। शादियों में किए जाने वाले
अनावश्यक खर्च की वजह से लोगों के घर तक बिक रहे
हैं।'
राजसी ठसक के लिए विख्यात इस
प्रदेश की शादियों में अभी भी कई ऐसी कुप्रथाओं का
पालन किया जा रहा है, जो
स्पष्ट तौर पर सामंती सोच को दर्शाते हैं। ऐसी ही एक
कुप्रथा तोरण मारन का जिक्र अमित ने बातचीत के दौरान
किया। इसके तहत दुल्हा,
दुल्हन के घर में
प्रवेश करने से पहले एक छद्म तोरण अर्थात दरवाजे को
तलवार से खंडित करने का उपक्रम करता है। इसे कुप्रथा
माने जाने के पीछे ठोस वजह है। सदियों पहले जब एक
राजा दूसरे को जीत लेता था तो वह विपक्षी का
मान-मर्दन करके उनकी कन्याओं से जबरन ब्याह रचा लेता
था या ईमानदारी से कहें तो रखैल बना लेता था। अब अगर
आज भी इसे अपनाया जा रहा है तो अमित का इसे कुप्रथा
करार देना बिल्कुल वाजिब है।
शादी से जुड़ी ऐसी ही कई कुप्रथाओं के
खिलाफ विरोध का बिगुल पेशे से चित्रकार और शौक के
लिए कविता करने वाले अमित कल्ला ने बजाया। उन्होंने
अपने घरवालों से कह दिया कि शादी आप जहां तय करेंगे
वहीं करूंगा लेकिन विवाह के दौरान अपनाई जाने वाली
प्रक्रिया मैं तय करूंगा। अमित ने जब परिजनों को
बताया कि वे विवाह दिन में करेंगे और शादी कार्ड
नहीं छपेगा,
बैंड बाजा नही होगा और दिखावे से
जुड़ी कोई भी चीज उनकी शादी में नहीं होगी,
तो जाहिर है,
इसका विरोध होना तय था। घर से
बाहर तक विरोध के स्वर उठने लगे। अमित की शादी जिस
अवीना नामक युवती से तय हुई थी,
उसके परिजनों की ओर से पारंपरिक
रंग-ढंग अपनाने का खास दबाव था। बकौल अमित, 'बड़ी
मुश्किल हालत थी। सगाई टूटने की नौबत आ गई थी। लेकिन
आखिरकार सब मान गए।' अमित
बताते हैं, 'शादी में
मैंने प्राचीन वैदिक परंपराओं को अपनाने की कोशिश
की। उदाहरण के लिए भगवान राम की शादी दिन में हुई
थी। 1000 ई. के पहले भारत
भर में दिन में ही शादियां होती थीं। लेकिन विदेशी
शासन का दुष्प्रभाव बढ़ने के कारण सुरक्षा के
दृष्टिकोण से रात में शादी करके बेटी को अंधोरे में
ही विदा करने का चलन मजबूरी में शुरू हुआ जो
दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से धीरे-धीरे हमारी परंपरा का
अंग बन गया।'
इस अनूठी शादी में मेहमानों को
निमंत्रण के रूप में पीले चावल की थैली दी गई थी।
सादगी की मिसाल रही अमित और अवीना की शादी के मंडप
में विख्यात कवियों की प्रेरक पंक्तियों के फलेक्स
(बैनर) लगवाए गए थे। इन फलेक्स पर अक्का महादेवी,
अज्ञेय,
पंत,
निराला, कबीर,
नानक आदि की पंक्तियां मेहमानों
को जाने-अनजाने में प्रेरणा से भर रही थीं। अमित इस
संदर्भ में विस्तार से बताते हैं, 'ऐसे
35 बोर्ड लगवाए गए थे। इन
पर कवियों की पंक्तियों के अलावा ललिता सहस्त्रानाम,
शिव पुराण की भी कुछ पंक्तियों
को उकेरा गया था।' जोधपुर
के रेलवे क्लब मैदान में हुई इस शादी के बाद अमित जब
अपनी दुल्हनिया को लेकर घर पहुंचे तो वहां उनके
स्वागत का जिम्मा बिजली के बल्बों की बजाए
दीपमालाओं ने संभाल रखा था। इस शादी में उपहार के
रूप में किताब देने की प्रथा की भी शुरूआत हुई। दहेज
का तो सवाल ही नहीं था। अमित की पत्नी अवीना एक
मनोचिकित्सक हैं। वह शादी के पहले जिन बच्चों के बीच
काम करती थीं,
उन्हें इस शादी में खास मेहमान का
दर्जा मिला हुआ था।
इस शादी को राजस्थान की मीडिया ने
जबर्दस्त समर्थन दिया। आकाशवाणी से तो इस जोड़े को
बुलाकर घंटे भर का कार्यक्रम प्रसारित किया गया।
शादी के बाद के अनुभवों को बांटते हुए अमित कहते हैं,
'पहले विरोध करने वाले ही अब पीठ
थपथपा रहे हैं। अब वे अखबारों की कतरन लिए गर्व से
यह कहते चल रहे हैं कि ये कारनामा उनके अमित ने किया
है।' अमित अपनी शादी के
दूरगामी परिणामों की तरफ धयान आकर्षित कराते हुए
संजीदगी के साथ कहते हैं, 'लोग
चाहते तो हैं कि बदलाव हो लेकिन शुरुआत खुद से करने
का साहस नहीं जुटा पाते। समाज में यदि कोई आगे बढ़े
तो उसके पीछे चलने वाले आसानी से दिखने लगते हैं।
हमारी शादी से प्रेरित होकर उसी दिन चार और लोगों ने
इसी ढंग से अपना ब्याह रचाने का संकल्प लिया,
मुझे उम्मीद है कि धीरे-धीरे
परिस्थितियां बदलेंगी। लोगों के सामने अगर हम रास्ता
रखेंगे तो वे खुद चल पड़ेंगे।'
अमित के सफल प्रयोग ने राह तो
दिखा दी है, उनकी राह के
चार राहगीर भी मिल गए हैं,
लेकिन सामाजिक और
आर्थिक भलाई के लिए इस राह को बड़े पैमाने पर अपनाए
जाने की जरूरत है। इसमें युवाओं की भूमिका काफी
महत्वपूर्ण है। कुप्रथाओं को तोड़ने और फिजूलखर्ची पर
लगाम लगाने के लिए शुरुआत में घर-परिवार और समाज से
बागी का तमगा पाने में भी कोई हर्ज नहीं है। आखिर
युवा विद्रोह नहीं करेंगे तो कौन करेगा।
ईमेल:
shekhar.du@gmail.com |