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जनजागरण |
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सामाजिक सुचिता की डगर पर |
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राकेश कुमार |
समाज
और
मनुष्यता के प्रति अपने उत्तारदायित्व को समझना और
उसे निभा पाना निजी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं
की पूर्ति के बीच काफी हद तक नामुमकिन ही हो जाता
है। 'मैं'
और 'मेरे'
से बड़े उद्देश्य के लिए जीवन
समर्पित करने के लिए किसी भी दूसरी लक्ष्य साधना से
ज्यादा दृढ़ इच्छा शत्तिफ की जरूरत होती है। इसी
प्रकार की इच्छाशिक्त
को अपने जीवन के हर क्षण प्रदर्शित किया है उदयफर
(राजस्थान) के मदन मोदी ने। अप्रैल 1953
को जन्मे श्री मोदी ने हिंदी और
दर्शन से स्नातकोत्तार की शिक्षा ली। मोदी ने अपने
जीवन से लेकर अपने अंचल में रहने वाले सभी मनुष्यों
के जीवन को मानवता के उच्चतम शिखर पर ले जाने का असाधारण
संकल्प लिया है। ये संकल्प किसी मठ मंदिर में नहीं
बल्कि जीवन की कठोर जमीन पर अपने अडिग फैसलों के रूप
में सबके सामने है।
श्री मोदी ने पत्रकारिता को अपने
क्षेत्र के वंचित और शोषित वर्ग की आवाज बुलंद करने
का जरिया बनाया। अपनी जाति परंपराओं
की
कठोरताओं के बीच बेहद युवा अवस्था में ही पहली बार
क्रांतिकारी फैसला करते हुए दहेज प्रस्ताव ठुकराकर
बाल विधवा से विवाह किया। आदर्शों को निजी-जीवन में
इस तरह जीने के संकल्प के बाद समाज और परिवार से
सहयोग के स्थान पर संघर्ष की सौगात अवश्यंभावी ही
थी। लेकिन कठिनाइयों और विरोधा ने मोदी के संकल्प को
खरा सोना बना दिया। मोदी ने दहेज और दहेज हत्याओं के
विरुध्द कई अभियान चलाए। दहेज प्रतिबंधक अधिनियम
1961
को अधिक सशक्त और कारगर बनाने के
लिए प्रयास शुरू किया। 1982
में संसदीय समिति ने निजी स्तर
पर तैयार मोदी का प्रतिवेदन स्वीकार किया और कानून
में सभी बातों को शामिल कर लिया गया। सामाजिक शुचिता
के प्रयास में लगातार जुटे रहे मोदी ने नाथद्वारा
मंदिर में हरिजन प्रवेश का मुद्दा उठाया और इस मामले
पर आंदोलन चलाया। अन्य स्थानों पर भी छुआ-छूत के
खिलाफ अभियान छेड़ा।
धार्मिक
ज्यादतियों के शिकार एक मुनि सुमन कुमार को मुक्त
करवाया। वे देश के अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं
में लिखते हुए समाज में फैली बुराइयों और अनाचारों
से लड़ने का ईमानदार प्रयास करते रहे हैं। सांधय
दैनिक
'मनु
टाइम्स' का संपादन भी
उन्होंने किया। इस दौरान फरवरी 1984
में दलित अत्याचारों के विरूध्द
उठी उनकी लेखनी से नाराज सामंती तत्वों ने प्रेस जला
दिया। इसी पत्र में धर्म की आड़ में कतिपय साधुओं
द्वारा किए जा रहे अनाचार का खुलासा करने पर अप्रैल
1987
में मोदी पर कातिलाना हमला हुआ
जिसमें उनका बायां कान पूरी तरह काट दिया गया।
मदन मोदी ने लंबे समय तक खनन और उससे
उपजे पारिस्थितिकी,
पर्यावरणीय एवं आर्थिक प्रभावों का शोधपूर्ण अधययन
किया। वे विभिन्न प्रकार की फैलोशिप और पत्रकारिता
से ही जीविकोपार्जन करते हैं।
मदन मोदी का आदिवासियों के बीच
व्यापक काम है। उन्होंने आदिवासी समाज में
एकता,
सुधार
और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए
'आदिवासी
एकी आंदोलन' शुरू किया।
श्री मोदी ने 2001 में इस
आंदोलन के तहत पचपन दिनों में 931
किलोमीटर की पदयात्र कर
आदिवासियों को एकजुट किया और उनकी समस्याओं के मूल
पर प्रहार की व्यूह रचना की। इस दौरान 722
आदिवासी परिवारों ने शराब,
शिकार और
तम्बाकू से तौबा की। लगातार सत्याग्रह और अहिंसक
विरोध प्रदर्शनों के जरिए बिना किसी आर्थिक सहायता
के आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत मोदी देश
की सज्जन शक्ति के लिए प्रेरणा ड्डोत हैं।
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