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धर्मसत्ता |
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सामाजिक समरसता की पहल |
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ऋतेश पाठक |
बिहार के एक सेवानिवृत पुलिस अधिकारी ने ऐसी पहल की
है जो सामाजिक संरचनाओं को लेकर व्याप्त कई
भ्रांतियों को दूर करती है। उनका यह प्रयास एक दशक
से जारी है।
'दलित'
एक
ऐसा शब्द है जो भारत में लाखों लोगों के लिए
रोजी-रोटी का जरिया बन गया है। हजारों
संगठन इस शब्द की वजह से चल रहे हैं। लाखों पन्नों
से ज्यादा साहित्य इस शब्द को आधार
बनाकर छप चुका है। बावजूद इसके,
दलितों की स्थिति में तत्क्षण सुधार
ला सकने वाले प्रयास विरले ही दिखाई देते हैं। बिहार
के एक सेवानिवृत्ता पुलिस अधिाकारी ने ऐसी ऐतिहासिक
पहल की है जो सामाजिक संरचनाओं को लेकर व्याप्त कई
भ्रांतियों को दूर करती है। धयान देने की बात है कि
उनका यह प्रयास एक दशक से जारी है और न सिर्फ पर
दलित केन्द्रित प्रयास है बल्कि
धार्मिक
गतिविधियों और संस्कृति के परिष्कार में भी लगा हुआ
है। ये महोदय हैं भूतपूर्व आईपीएस आचार्य किशोर
कुणाल,
जो फिलहाल बिहार राज्य
धार्मिक
न्यास बोर्ड के अधयक्ष हैं और मठ-मंदिरों को बेहतर
बनाने में लगे हुए हैं।
ताजा तरीन मामला पटना के पास पालीगंज में रामजानकी
मंदिर में एक दलित जनार्दन मांझी को पुजारी नियुक्त
करने का है। इस वर्ष कबीर जयंती के दिन जनार्दन
मांझी को पुजारी नियुक्त करने के पहले वह बिहटा के
शिव मंदिर में और हाजीपुर के विशालनाथ महादेव मंदिर
में दलितों को पुजारी के रूप में नियुक्त कर चुके
हैं। ये तीनों ही काम उन्होंने
धार्मिक
न्यास बोर्ड के अधयक्ष की हैसियत से किया। लेकिन इस
शृंखला का श्रीगणेश जब उन्होंने किया था तब वे सरकार
की ओर से ऐसे कार्य के लिए अधिकृत नहीं थे।
30
जून 1993
को उन्होंने पटना के प्रसिध्द
महावीर मंदिर के पुजारी के रूप में फलाहारी
सूर्यवंशी दास नाम के दलित साधु
को
पुजारी बनाया। तब श्री कुणाल महावीर मंदिर के सचिव
थे।
कई
बार सुनने को मिलता है कि श्री कुणाल के इस कदम से
बड़े धार्माचार्य खफा हुए,
लेकिन सूर्यवंशी दास की ताजपोशी
के लिए आयोजित समारोह में तीन बड़े संतों-श्री
रामचंद्र परमहंस (राम जन्मभूमि न्यास के तत्कालीन अध्यक्ष,
महंत अवैद्यनाथ (बाबा गोरखनाथ
धाम
के तत्कालीन मठाधीश)
और महंत अवधा किशोर दास की आधिाकारिक मौजूदगी ने
साबित कर दिया कि धार्माचार्य भी जाति-परंपरा की बाधाओं
को समाप्त करने के लिए सहमत हैं। यह सिलसिला अभी
थमनेवाला नहीं है। लगातार मंदिरों का चयन कर वहां
दलित पुजारियों को स्थापित किया जा रहा है। बोधागया
के बोधिमंदिर के पास स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर
शायद अगला पड़ाव हो। इसके बाद बेगूसराय के नवरत्न
मंदिर में ऐसा करने की योजना है। नालंदा जिले के
हिलसा स्थित बाबा राम जानकी ठाकुरबाड़ी के न्यास का
नियंत्रण पूरी तरह दलितों के हाथों में दिलाने में
भी न्यास ने सहायता की है। दलित संचालित इन मंदिरों
को अलग-थलग न देखा जाए इसके लिए लगातार संगत-पंगत
(सामूहिक भोज) का आयोजन किया जाता है। सभी तबके के
लोग इसमें शामिल होते हैं। उप-मुख्यमंत्री सुशील
कुमार मोदी भी कई संगत-पंगत में शिरकत कर चुके हैं।
ऐसी भी खबरें हैं कि स्थानीय लोग इन मंदिरों में
दैनिक पूजा और चालीसा पाठ में काफी दिलचस्पी ले रहे
हैं।
मंदिरों में पूजा-पाठ के प्रतिष्ठित कार्य का
दायित्व दलित लोगों को सौंपने से उत्पन्न विरोधाभासों
को दूर करते हुए आचार्य कुणाल कहते हैं,
''पुजारी और पुरोहित के कार्यों
को अलग-अलग कर देखने की जरूरत है। कर्मकांड के लिए
विद्वान की जरूरत हो सकती है लेकिन भगवान की पूजा
कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इसलिए पुजारी के रूप में
इन लोगों को स्थापित करने पर कोई प्रश्न नहीं होना
चाहिए।'' उल्लेखनीय है कि
आचार्य खुद संस्कृत के विद्वान हैं और कामेश्वर सिंह
दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के उप-कुलपति रह चुके
हैं। जैसा कि हमने शुरू में बात की थी कि श्री कुणाल
की गतिविधियां सिर्फ दलित क्रेन्द्रित
न होकर
धार्मिक
गतिविधियों के परिष्कार से भी जुड़ी हुई हैं। महावीर
मंदिर परिसर में ही इनके प्रयास से पाणिनी प्रज्ञा
पीठम् की स्थापना की गयी है। इसमें बच्चों को पाणिनी
व्याकरण और वेदांत की शिक्षा मुफ्रत दी जाती है।
इतना ही नहीं
धार्मिक
ग्रंथों में व्याप्त विसंगतियों को दूर करने के लिए
भी वह काम कर रहे हैं। श्री कुणाल बताते हैं कि देश
भर में प्रचलित सत्यनारायण पूजा कथा में
'कथा'
कहीं है ही नहीं,
सिर्फ उसके पाठ से होने वाले
लाभ-हानि को कथा रूप में बांचा जाता है,
रूद्र अष्टाधयायी में आठ अधयाय
नहीं मिलते। ऐसी विसंगतियों को दूर करने के लिए शोधा
करके नयी पुस्तकें तैयार की जा रही हैं।
पूजा-पाठ से इतर भी सेवा-कार्य इनके द्वारा चलाये जा
रहे हैं वहां भी साधु-संतों
का खास ख्याल रखा जाता है। महावीर मंदिर की आय से
स्थापित महावीर कैंसर संस्थान किफायती दरों पर कैंसर
का इलाज उपलब्धा कराता है। गरीबी रेखा के नीचे रहने
वाले लोगों से तो नाम मात्र का शुल्क लिया जाता है।
वहीं साधु-संतों
का मुफ्त इलाज होता है। श्री कुणाल कहते हैं कि निकट
भविष्य में विशेष रूप से साधु-संतों
के लिए नि:शुल्क अस्पताल बनाने की योजना है। दलित
तबके को कथित सवर्ण तबके की बराबरी में खड़ा करने का
उनका प्रयास निश्चित रूप से सामाजिक समरसता की मिसाल
पेश करता है। अगर इस तरह के प्रयास जारी रहे तो
निश्चित ही हम जाति रहित समाज या जातिभेद रहित समाज
निर्माण की दिशा में शीघ्र अग्रसर हो सकते हैं।
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riteshinmedia@gmail.com |