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एक मिशाल |
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सामाजिक
नव रचना की कर्मभूमि |
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श्रीनाथ मेहरा |
सिध्द
समाज सेवी,
भारतीय जनसंघ के पूर्व महामंत्री
एवं राज्यसभा सांसद नानाजी देशमुख ने पंडित दीनदयाल
उपाधयाय के विचारों एवं चिंतन को साकार रूप देने के
लिए 1972 में दीनदयाल शोध
संस्थान की स्थापना की। राजनीतिक क्षेत्र में कार्य
करते हुए जब श्री नानाजी अपने उत्कर्ष पर थे,
तभी उन्होंने राजनीति को अलविदा
कह दिया और सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।
सामाजिक कार्य करने के लिए नानाजी ने क्षेत्र चुना
मधय प्रदेश (जिला-सतना) एवं उत्तार प्रदेश की सीमा
से लगते प्रभु श्रीराम की कर्म स्थली - चित्रकूट को।
उनका मानना है कि इस स्थान पर सत्ता संघर्ष नहीं हो
सकता है। भगवान श्रीराम भी यहां इसी कारण आए थे।
उन्होंने अपने कार्य के लिए शुरुआत में 80
गांवों को चुना। लक्ष्य
निधर्रित किए शिक्षा,
स्वास्थ्य,
स्वावलम्बन एवं सदाचार। इन्हीं को
लक्ष्य करके कार्य के विविध आयाम खड़े करना शुरू
किया।
श्री नानाजी देशमुख का कहना है कि यह
साधना पथ है,
दीनदयालजी की उस अधूरी
साधना पूर्ति और सामाजिक-आर्थिक विषमताओं से मुक्त
एवं उदात्ता भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित
एक सशक्त,
समृध्द एवं गतिमान भारत के
नव-निर्माण के उनके अधूरे
स्वप्न को साकार करने का। चित्रकूट एक प्रयोगशाला है,
जिसमें सत्ता और वोट की राजनीति
को परे रखकर, मौन
रचनात्मक कर्म की भट्टी में तपकर सामाजिक-आर्थिक
पुनर्रचना का नमूना खड़ा करने का भागीरथ प्रयास हो
रहा है। नानाजी के अनुसार यह न केवल स्वाधीन भारत के
समक्ष राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का आदर्श प्रस्तुत
करेगा बल्कि सारे विश्व के लिए अनुकरणीय बनकर भारत
की ऐतिहासिक भूमिका को पूरा करेगा। नवयुग निर्माण की
यह प्रयोगशाला है,
जिसमें दीनदयालजी
के चिंतन और कर्म का सहज संगम विद्यमान है।
व्यक्तिगत या
कारखानों की समृध्दि व प्रगति सामान्य गरीब लोगों
एवं प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करती रही है।
तथाकथित रूप से विकसित कहे जाने वाले देशों में यह
बड़ी मात्रा में प्रचलित है। विश्व की अधिाकांश जनता
गरीबी की यातनाएं काफी समय से भोग रही है।
दीनदयाल शोध संस्थान ने चित्रकूट से
लगते आसपास के
80
गांवों में सामूहिक स्वावलम्बन
के माधयम से कई सामाजिक कुरीतियों को दूर किया है।
संस्थान की प्रेरणा से सभी गांववासी मिलकर व्यक्तिगत
उन्नति के लिए नहीं,
बल्कि पूरे गांव की खुशहाली के लिए कार्य कर रहे
हैं। विकास का लाभ गांव की पूरी जनता को मिल रहा है।
बदलाव के हालात यह हैं कि इन गांवों में अब कोई भी
धनवान किसी गरीब व्यक्ति का शोषण नहीं कर पाता है।
समाज में जो विषमताएं वर्षों से चली आ रही थीं
उन्हें आपसी सद्भावना एवं परस्पर सहयोग से बदला गया
है। चित्रकूट क्षेत्र के 80
गांवों के जनजीवन में एकात्म
मानव जीवन दृष्टि ही नहीं बल्कि गांधीवाद,
समाजवाद एवं सर्वोदयवाद के भी
प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। सभी तरह से खुशहाल होने
के कारण प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन से संतुष्ट है।
पहले गांवों में मुकदमेबाजी की बीमारी से कई घर
परेशान थे। इस कारण गांव में कलह का वातावरण व्याप्त
था। ऐसे में गांवों की तरक्की में बाधा
उत्पन्न होती थी।
दीनदयाल शोध संस्थान के
'समाज शिल्पी
दम्पत्तियों,' ने गांव
वालों को समझाया कि मुकद्मेबाजी से छुटकारा पाए बिना
गांव में एवं उनके जीवन में खुशहाली सम्भव नहीं है।
बात ग्रामीणों को समझ में आई,
उन्हें अपनी दुर्दशा का कारण भी
समझ आया। फलस्वरूप चयनित ग्रामीणों ने आपस में मिल-
बैठकर न्यायालय से मुकदमों को वापस लेना आरम्भ किया।
इस प्रकार सामूहिक प्रयत्न से 'स्वावलम्बन
अभियान'
सफल हुआ। अब तो स्थिति यह है कि
ग्रामीणों में अपना गांव विवाद मुक्त करने की होड़-सी
लगी है।
विश्व में एलोपैथी को सबसे अधिक
महत्व मिला है। भारत में करीब
6
लाख गांव हैं। एलोपैथी जैसी
महंगी चिकित्सा पध्दति अब तक न वहां पहुंची है और न
कभी पहुंच पाएगी। इन दवाओं में निरंतर अनुसंधान
भी होता रहा है। लेकिन इनके
'साइड
इफैक्ट' दूर नहीं हो पा
रहे हैं। आधुनिक
उपकरणों से लैस नए-नए अस्पताल रोज खुल रहे हैं,
अंग्रेजी दवाओं की दुकानों का
जाल भी बिछ रहा है। 'डाक्टरी'
का पेशा खूब फल-पूफल रहा है।
इसके बावजूद कई असाध्य
रोग बेकाबू हो रहे हैं। खतरनाक बीमारियों से ग्रस्त
रोगियों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है। यह स्वास्थ्य
प्राप्ति की ठीक दिशा नहीं है। दीनदयाल शोध संस्थान
ने चित्रकूट में आरोग्यधाम
नाम से आजीवन स्वास्थ्य अनुसंधान
वेंफद्र स्थापित किया है। यहां आयुर्वेद,
योगोपचार,
उचित खानपान एवं
प्राकृतिक चिकित्सा के समन्वित प्रयोगों द्वारा
आजीवन स्वास्थ्य प्राप्त करने का कार्य किया जा रहा
है और इसके परिणाम भी आशातीत मिल रहे हैं।
इसी आधार
पर आरोग्यधाम
ने 'दादी
मां का बटुआ' नाम से
स्थानीय जड़ी-बूटियों से पैंतीस दवाएं निर्मित की
हैं। उन्हीं का बटुआ बनाकर गांवों में 'दादी
मां का बटुआ' नाम से इसे
प्रचलित किया गया है। उससे सब प्रकार की सामान्य
बीमारियां गांव में ही ठीक हो रही हैं। यह दवाएं
स्थानीय जड़ी-बूटियों से बनी होने के कारण सस्ती एवं
गुणकारी भी हैं। गांवों में लोगों के स्वास्थ्य में
तेजी से सुधार
हो रहा है। स्वास्थ्य की दृष्टि से गांव आत्मनिर्भर
एवं स्वावलंबी हो रहे हैं।
मानव की शिक्षा जन्म से ही किसी न
किसी प्रकार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से
आरम्भ हो जाती है। बच्चा अपनी आंखों और कानों से
अपने चारों ओर चलने वाली गतिविधियों को ग्रहण एवं
महसूस करता है। बच्चों के व्यक्तित्व का विकास इसी
कोमल आयु में ही आरम्भ होता है। इसकी जानकारी बच्चे
को जन्म देने वाले माता-पिता को भी नहीं होती है।
अत: माता-पिता बच्चों के विकास का दायित्व प्राय:
ठीक से नहीं निभा पाते हैं। शिक्षा का अर्थ मात्र
लिखना और पढ़ना ही नहीं है। शिक्षा का अर्थ है,
मानव को मानवीय गुणों से पूर्ण
करना। तभी वह देश व समाज की चिंता कर पाता है और उसी
अनुसार अपनी जीवन रचना करता है। ऐसी शिक्षा
विद्यार्थियों को केवल विद्यालयों की चारदीवारी में
सीमित रखकर नहीं दी जा सकती है। इसके लिए आवश्यक है
परिवार, विद्यालय तथा
नागरिकों के व्यवहार में नई पीढ़ी के सर्वांगीण विकास
की दृष्टि से परस्पर पूरकता एवं सामंजस्य का निर्माण
करने की। संस्थान इस दिशा में कुछ चुने हुए गांवों
में प्रयास भी कर रहा है। व्यक्ति शहरी हो या
ग्रामीण, देश कृषि प्रधान
हो या औद्योगीकरण से युक्त,
लेकिन
प्राकृतिक संसाधान सामान्य रूप से केवल ग्रामीण
क्षेत्रों में ही उपलब्धा होते हैं। ऐसी स्थिति में
गांवों का अभावग्रस्त रहना देश एवं समाज के विकास की
दृष्टि से ठीक नहीं है।
गांवों में कृषि के साथ उपलब्धा
प्राकृतिक संसाधनों के आधार
पर कुटीर उद्योगों को जोड़ा गया तो गांवों में गरीबी
व बेकारी नहीं रहेगी। इसका प्रयोग चित्रकूट के
80 गांवों में
सफलतापूर्वक किया गया है। कुटीर उद्योगों को बढ़ावा
मिलने से गांवों में खुशहाली का उदय हो रहा है।
2010 तक चित्रकूट क्षेत्र
के 500
गांवों में यह कार्य सम्पन्न होगा।
गांव-गांव में कुटीर उद्योग चलाने की क्षमता बढ़ाने
के लिए ग्रामीण महिला एवं पुरुषों को स्वरोजगार
प्रशिक्षण देने का कार्य उद्यमिता विद्यापीठ कर रहा
है।
देश के हजारों गांवों में पेयजल का
संकट स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी बना हुआ है।
क्षेत्र के ग्रामीणों को समझाया गया कि सरकार के
भरोसे यह समस्या हल नहीं हो सकती है। इस समस्या से
निजात पाने के लिए स्वयं ही कुछ करना पड़ेगा।
ग्रामवासियों ने दीनदयाल शोधा संस्थान के मार्गदर्शन
में सामूहिक प्रयास किया। सामूहिक श्रमदान से वर्षा
जल का संग्रह किया गया। इससे केवल पेयजल की ही
समस्या का निराकरण नहीं हुआ,
बल्कि खेतों के लिए सिंचाई का
पानी भी उपलब्ध होने लगा। परिणामस्वरूप एक के बजाए
दो फसलें होने लगीं और अधिक मात्रा में मिलने लगीं।
इससे हर किसान की आय दुगनी हो गई और उनकी आर्थिक
सम्पन्नता भी बढ़ी। नानाजी की इच्छा है कि पूरे देश
में यह कार्य एक माडल के रूप में प्रस्तुत हो। सारे
देशभर में वह अकेले काम नहीं कर सकते हैं,
हां गांव का विकास कैसे हो,
इसके लिए
उदाहरण स्वरूप इन गांवों का विकास सबके लिए प्रस्तुत
कर सकते हैं। |