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 जनवरी,  2008

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समग्र विकल्प की जीवन-विद्या

रामबहादुर राय

जिन लोगों की 'वैकल्पिक चिंतन' में दिलचस्पी है और जो उसकी खोज में हैं उन्हें 'जीवन विद्या' सूचना होनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि इसके बारे में पहले जाना-सुना नहीं गया होगा। देश में सैकड़ों ऐसे लोग हैं जिन्होंने जीवन विद्या के बारे में अपने दोस्तों से सुन रखा होगा। क्योंकि पिछले कई सालों से विभिन्न क्षेत्रें में यह प्रयास अनेक स्तरों पर चलाया जा रहा है। परिस्थितियां जैसे-जैसे संकटपूर्ण होती जा रही हैं, उसमें विकल्प की खोज के लिए आतुरता बढ़ रही है। लाखों लोग होंगे जो अपने-अपने स्तर पर इसके लिए सक्रिय हैं। वे यह मानने लगे हैं कि जब तक विकल्प नहीं मिल जाता तब तक जिससे जुड़े हैं, वहां सक्रिय रहना एक सामाजिक दायित्व है। दूसरे हिस्से में छोटे-बड़े समूह हैं। इसमें वे लोग भी हैं जो संस्थाओं के बंधन से परे हो गए हैं। तीसरे प्रकार के वे लोग हैं जो निजी तौर पर सक्रिय हैं और विकल्प के प्रयासों में लगे हुए दिखते हैं। इन सबमें एक समानता है कि हर कोई जिससे जुड़ा है, उसकी सीमाएं पहचानने लगा है।

यह मैं तीसरे प्रकार की जमात का जिक्र कर रहा हूं। इसमें बहुरंगी छटा है। इसका यह अनोखापन ही कहा जाएगा कि यह जमात आंधी-तूफान के बावजूद उखड़ी नहीं, टूटी नहीं और इसमें शामिल लोग ठिठके नहीं। उनकी यात्र जारी है। उन्हें विकल्प की मंजिल थकाती नहीं, चाहे जितनी सुदूर लगती हो। ऐसी ही एक यात्र की तैयारी देखने का अवसर पिछले दिनों आया। बागपत का यह पलड़ी गांव है। महानगर दिल्ली से अधिक दूर नहीं है। रास्ता अगर ठीक-ठाक हो तो जल्दी पहुंचा जा सकता है। उसी गांव से मैत्री संवाद यात्र शुरू हुई है। उसके निमंत्रण का पर्चा आमतौर पर होने वाले सम्मेलनों से बिल्कुल अलग था। उसे एक बार पढ़कर नहीं समझा जा सकता है। पहली बार उस पर्चे को पढ़ते हुए यह समझ में आता है कि जीवन सरल नहीं है, जटिल हो गया है। उसकी जटिलता को वह पर्चा प्रकट करने की कोशिश करता है।

पर्चे से सर्वशुभ अभियान की जैसे ही जानकारी मिली, है यह सवाल कौंधता है कि यह है क्या? इस तरह का अभियान पहली नजर में धार्मिक फट देता है। इतना तो साफ-साफ लगता है कि यह अराजनैतिक काम है। ऐसा अभियान है जो समाज के उत्थान से जुड़ा हुआ है। आयोजकों को भी इसका एहसास रहा होगा, इसीलिए पर्चे में इसके दो मतलब बताए गए। पहला कि यह सबके लिए सुखद कल्याणकारी प्रयास है। दूसरा कि इसमें स्वत्व, स्वतंत्रता एवं स्वराज्य का लक्ष्य है। इसी का विस्तार करते हुए यह बताया गया है कि यह अभियान परिवारमूलक ग्राम स्वराज्य व्यवस्था की चेतना जगाएगा।

यह अभियान कुछ सूत्रें पर आधारित है। इसे समझने के लिए उन सूत्रें का अर्थ सही ढंग से जानना जरूरी है। इस मायने में यह दूसरे राजनीतिक अभियानों से भिन्न है। इसका जो लोग संयोजन कर रहे हैं, वे ऊंचे लक्ष्यों से प्रेरित हैं। उन्होंने उन सूत्रें को संगति से समझा है। उसका अभ्यास किया है। ऐसे करीब दो दर्जन नामी-गिरामी व्यक्तियों की संयोजन समिति के प्रयासों से मैत्री संवाद यात्र शुरू हुई है। 'पिछले 25 वर्षों के सतत् प्रयासों के क्रम में हमें जो बातें समझ में आर्इं, उन्हें आपके साथ बांटने की हम अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते हैं। विपश्यना साधना, किसान व जन-आंदोलन, सर्वोदय, ग्राम-विकास, वैकल्पिक कृषि व तकनीकी आदि में सक्रिय भागीदारी व सफल गति करते हुए हम 'जीवन विद्या' तक पहुंचे। यहां पहुंचकर हमें एक समग्र विकल्प व समाधान की संभावना दिखी।' यह स्वीकारोक्ति उस पत्र में की गई जिसे मैत्री संवाद यात्र के लिए बतौर निमंत्रण भेजा गया था।

कंझावला के आंदोलन से मशहूर हुए समर सिंह उन लोगों में से एक हैं जो मानते हैं कि जीवन विद्या तक पहुंचना एक उपलब्धि है। इसलिए यह प्रश्न तुरन्त उठता है कि जीवन विद्या क्या है? 'जीवन विद्या एक ऐसा हुनर है जिसका आधार मानवीय मूल्य है। उसे शिक्षा के जरिए समाज में जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है। यह एक ऐसा माधयम है जिससे विविधा अंतरद्वंद्वों को समझा जा सकता है। उनके समाधान खोजे जा सकते हैं।' राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने आजादी की साठवीं सालगिरह पर देशवासियों के सामने जीवन विद्या को इन शब्दों में रखा। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा, 'जीवन विद्या अपने आप को समझने की प्रक्रिया है। उसके आधार पर समाज में सीखने का वातावरण बनेगा, जिसके अंतर्गत ज्ञान का शोध होगा। अपने आप को समझना होगा और यह समझना होगा कि अनन्त संभावनाएं हैं। इससे एक मनौवैज्ञानिक क्रांति आ सकती है। इससे एक ऐसा समाज गठित होगा जिसका आधार मानवीय संबंध होगा। जीवन विद्या की सही समझ मानवीय विवेक में एक बड़ा बदलाव ले आएगी।'

उसे जानने समझने में रुचि का कारण उस व्यक्ति के आस-पास का वातावरण भी होता है। एक धारणा इसके विपरीत भी है कि आज जैसा माहौल है, उसमें कलाम जैसे लोगों के भाषण को नीरस मानकर उपेक्षित कर दिया जाता है। उस पर कोई ध्यान नहीं देता। मीडिया में नया रिवाज बनता जा रहा है कि ऐसे भाषणों को किसी कोने-अंतरे में डाल दो। इससे आज भी मीडिया के स्टार का भी पता चलता है।

समय के साथ-साथ जीवन विद्या का अपना संघर्ष भी तेज हुआ है। उसे समझने और जांचने के लिए जरूरी है कि जीवन विद्या के बारहवें सम्मेलन के उहापोह पर नजर दौड़ाएं। यह सम्मेलन कानफर में उस समय हुआ जब राष्ट्रपति के भाषण को कई महीने बीत गए थे। अक्टूबर के उस सम्मेलन को समझने के लिए 'परिवार मानव' पत्रिका के संपादकीय से मदद मिलती है। उस सम्मेलन से जीवन विद्या के इतिहास की थाह ली जा सकती है। बारहवें सम्मेलन का एक मतलब यह है कि जीवन विद्या का अभियान डेढ़ दशक फराना हो गया है। इसके विचारक ए. नागराज शर्मा हैं जिन्हें अब बाबा नागराज के नाम से जाना जा रहा है। वैसे तो उन्हें देखने से यह नहीं लगता कि वे कोई बाबा हैं, न वेश में और न हावभाव में। बाबाओं की छवि के विपरीत वे एक गृहस्थ लगते हैं। पिछले 50 सालों से उन्होंने अमरकंटक में धूनी रमाई है। वहीं उन्हें मधयस्थ दर्शन सूझा जो सहअस्तित्वाद के रास्ते में जीवन विद्या की मान्यता प्राप्त कर रहा है। उसके अनेक प्रायोगिक केन्द्र उभरे हैं।

इन केन्द्रों पर जो प्रयोग हो रहे हैं, उससे जीवन विद्या उस बहती नदी की तरह हो गया है जिसके प्रवाह की दिशा में तटबंध बनते हैं। उन तटबंधों से जीवन विद्या रूपी नदी को समझना आसान होना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि अभी भी वह अबूझ पहेली बनी हुई है। इसके कई कारण होंगे। एक कारण साफ है कि बाबा नागराज की पुस्तकें गूढ़ हैं। उन्हें पहली बार पढ़ कर दूसरी बार पढ़ने के लिए साहस की जरूरत पड़ती है। फस्तक को हाथ में लेते ही पाठक दर्शन के बीहड़ जंगल में पहुंच जाने के भयावह अनुभव से गुजरता है। ऐसी स्थिति में उसे लगता है कि इन फस्तकों को समझने के लिए गुरु ज्ञान चाहिए। वह कहां से आए?

क्या जीवन विद्या पर जो सम्मेलन हुए हैं, वे इस आवश्यकता को पूरा कर रहे हैं? हर सम्मेलन में शरीक हुए और इस अभियान के सूत्रधार रणसिंह आर्य ने भी माना है कि एक समय में सम्मेलन उन्हें मात्र औपचारिकता लगने लगे थे। फिर भी उनमें उनका जाना होता रहा। जिससे इतना तो हुआ कि जीवन विद्या से जुड़े लोगों की क्षमता बढ़ी, वे बेहतर अध्ययन कर सके। जीवन विद्या को अपने में उतारने का अनुभव कुछ लोगों को हुआ, कुछ लोग उसे दूसरों को समझाने लायक बने। इन सम्मेलनों से वह सूत्र निकला जिसमें विद्या का रहस्य समाया हुआ है।

पलड़ी गांव जहां से मैत्री संवाद  यात्र शुरू हुई, वह किसानों का इलाका है। जिन लोगों को आठवें दशक के किसान आंदोलन की याद है, वे इस इलाके की उस समय की हलचलों से भलीभांति परिचित हैं। उस समय किसान यूनियन का झंडा लहराता था। महेन्द्र सिंह टिकैत एक मात्र नेता बनकर उभरे थे। उनकी हर अदा को रिपोर्ट करने के लिए मीडिया की गहमा-गहमी रहा करती थी। उसी इलाके में जीवन विद्या से प्रेरित होकर जो यात्र चलाई जा रही है, वह मीडिया से ओझल है। आयोजकों ने भी मीडिया को दूर ही रखा है। जो लोग इस अभियान में लगे हैं, उनकी नजर भविष्य पर है। वे यह जानते हैं कि बड़े बदलाव के लिए मूलगामी प्रयास जरूरी हैं। 26 फरवरी, 2007 को यात्र शुरू करने के पहले पलड़ी में ही एक गोष्ठी का भी आंदोलन किया गया था। गोष्ठी का माहौल लीक से हटकर था। आमतौर पर लोग अपनी बात जोर-शोर से रखने के लिए ऐसे अवसरों का उपयोग करते हैं। लेकिन वहां पूरा वातावरण समझने और समझाने से भरा हुआ था। एक अधयापक सचमुच उसी तरह वहां लोगों को समझा रहा था जैसे कि वह बच्चों को पढ़ा रहा हो।

उन्हें सुनने पर ऐसा महसूस हुआ कि अभिव्यक्ति की संस्कृति के जमाने में मर्यादा का पाठ पढ़ाया जा रहा है। इससे मनुष्य बदलेगा या व्यवस्था बदलेगी, इसका सही उत्तार नहीं दिया जा सकता। यह बहस फरानी है और उसकी हकीकत भी उजागर हो चुकी है कि व्यक्ति सुधार से व्यवस्था में बदलाव नहीं होता। इसी तरह व्यवस्था के बदल जाने से व्यक्ति में सुधार नहीं आ जाता। इस खतरे से जीवन विद्या के सिपाही कितना सतर्क हैं? उन्हें औरों की तरह यह तो पता है कि विकास की जिस होड़ में भारत पड़ गया है, वह उसका फैसला नहीं है। संभवत: जीवन विद्या भारत को  उसकी अपनी राह पर चलाने की आकांक्षा से प्रेरित है।

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन