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जनसेवा |
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सब की अन्नपूर्णा,
सब को प्रसाद |
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राजेश कटियार |
सनातन
मान्यता के साथ यह अनुभव कई दफा हुआ है कि भगवान शिव
की नगरी काशी में कोई भूखा
नहीं सोता। ऐसा इसलिए क्योंकि
कंकड़-कंकड़ में बसने वाले शंकर की इस पवित्र नगरी पर
मां अन्नपूर्णा की विशेष कृपा है। तभी,
हर किसी
को किसी न किसी तरह भोजन मिल ही जाता है। कुछ दिन
गुजारने के बाद किसी को भी यह सुनाई पड़ सकता है कि
बाबा की नगरी में मां की कृपा से कोई भूखा नहीं
सोता। कोई यहां कुछ समय ठहरता है तो उसके मानस पटल
पर इस नगरी की कुछ स्मृतियां इतनी स्थायी हो जाती
हैं कि यह शहर अनजान नहीं रहता।
ऐसी
ही कुछ अनूठी स्मृतियों में एक मां अन्नपूर्णा का
प्रसाद है। अन्नपूर्णा सेवा समिति की अन्नपूर्णा
प्रसाद की एक अनूठी पहल ने इस नगरी में एक अलग पहचान
बनाई है। सुरभि शोध संस्थान के निर्देशन में कार्यरत
इस समिति की यह पहल काशी की परिधि से बाहर निकलकर
उत्तार प्रदेश के अन्य शहरों से होते हुए दिल्ली
पहुंची है। प्रसाद का मतलब मुफत का प्रसाद नहीं,
बल्कि काफी कम कीमत पर पौष्टिक
भोजन जिसे 'अन्नपूर्णा
प्रसाद' का नाम दिया गया
है। पहली बात काशी के इस प्रसाद की। यहां के
अन्नपूर्णा केंद्रों में सुबह से देर रात तक चहल-पहल
रहती है। प्रसाद का मूल्य आठ रुपए है। यह प्रसाद उन
तमाम मेहनतकशों के लिए एक उम्मीद है जो ऐसे महानगर
में रोजी-रोटी के चक्कर में आते हैं। ऐसे में उनको
न्यूनतम मूल्य पर सम्मानपूर्वक पौष्टिक भोजन मिल जाए,
तो बड़ी बात है। ऐसे लोगों की
जरूरत को धयान में रखकर सुरभि शोध संस्थान ने एक नई
पहल की और उसने ऐसे लोगों का आशीर्वाद बटोरा
जिन्होंने उसका प्रसाद चखा।
काशी ही क्या,
ऐसे महानगरों में दूरदराज से
कमाने की जुगाड़ में हजारों लोग आते हैं जो ज्यादातर
मजदूरी या रिक्शा चलाने का काम करते हैं। उनकी कमाई
इतनी नहीं होती कि परिवार साथ रख सकें। सारी कमाई
खाने पर खचॅ
करने की उनकी स्थिति नहीं होती।
उनके सामने रैन बसेरा और भोजन ही सबसे बड़ी समस्या
होती है। उनको सड़क के किनारे किसी ठेले वगैरह पर
किसी तरह पेट भरने वाला भोजन करते देखा जा सकता है।
कहा जा सकता है कि स्वास्थ्य के लिहाज से वहां का
वातावरण और भोजन दोनो
ही बेहतर नहीं होता है। इसलिए समिति की कुछ शुल्क के
साथ यह अनूठी पहल रंग ला रही है। उसके केंद्रों पर
मेहनतकश और रिक्शावाले सम्मान के साथ भोजन कर सकते
हैं। सुरभि शोध संस्थान के कर्ता-धर्ता सूर्यकांत
जालान का कहना है कि शारीरिक श्रम करने वालों को भी
सम्मान चाहिए। सम्मान के साथ भोजन चाहिए। इस
मूलमंत्र के साथ समिति का आठ रुपए में पौष्टिक भोजन
कराने का संकल्प है। उनकी यह बात टीस पैदा करती है
कि जो श्रमिक मकान बनाते हैं,
वह गृह प्रवेश के मौके पर नहीं
होते। उनका आशय यह है कि समाज में श्रम को यथोचित
सम्मान मिलना चाहिए। समिति के लोगों से बातचीत करने
पर मालूम पड़ा कि इस प्रकल्प के साथ अन्नपूर्णा का
नाम इसलिए जुड़ा ताकि हर स्तर पर पवित्रता कायम रखी
जा सके। सफाई का आलम यह है कि भोजन बनाने की सारी
प्रक्रिया सबके सामने है। इस कवायद में महिला-पुरुष
दोनो
ही हाथ बंटाते हैं। धीरे-धीरे
प्रसाद की खासतौर पर विविध किस्म के पराठों की चर्चा
प्रसाद केंद्रों के बाहर क्या निकली कि देखते-देखते
मधयमवर्गीय परिवारों में भी पराठे पैक होकर जाने
लगे। शायद ऐसे मधयमवर्गीय लोगों को मेहनतकशों के साथ
भोजन करना सुहाता न हो,
इसलिए वे पैकिंग पर ही निर्भर रहते हैं। कई दफा मुझे
भी इस प्रसाद को ग्रहण करने का मौका मिला। इसके बारे
में जैसा सुना था, वैसा
ही पाया।
इस
नगरी में सात केंद्रों पर हजारों लोग रोजाना प्रसाद
ग्रहण करते हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के
अस्पताल में भी यह सेवा शुरू हो चुकी है। पूर्वांचल
के एकमात्र इस मशहूर अस्पताल में रोजाना हजारों मरीज
आते हैं,
जिनमें ज्यादातर गरीब या निम्न
आय वर्ग के होते हैं। हर समय हजारों मरीज अस्पताल
में बराबर भर्ती रहते हैं। उनके साथ रहने वालों को
सस्ते दाम पर शुध्द भोजन मिले,
उसके लिए विश्वविद्यालय प्रशासन
ने अन्नपूण्र्ाा सेवा समिति के साथ समझौता किया और
बात बन गई। समिति की कैंटीन में विश्वविद्यालय के
छात्र और कर्मचारी भी भोजन करने लगे हैं। हालांकि
शुरुआत में छात्रों में एक झिझक थी। लेकिन धीरे-धीरे
उनकी झिझक पर प्रसाद भारी पड़ा। अब छात्रों को भी
यहां भोजन करते देखा जा सकता है। एक दिन रवींद्रपुरी
से साइकिल रिक्शा गुजर रहा था और एक व्यक्ति सड़क के
किनारे किसी से सूर्यकांत जालान के निवास के बारे
में पूछ रहा था। रिक्शावाले ने जालान का नाम सुनते
ही रिक्शा खड़ा किया और रास्ता बताने लगा। उत्सुकतावश
पूछने पर उस रिक्शावाले ने अपना नाम गुल मोहम्मद
बताया जो चार साल पहले काशी आया और तब से सुबह-रात
अन्नपूर्णा प्रसाद ग्रहण कर अपनी क्षुध
शांत करता है। उसने बताया कि त्यौहार के अवसर पर
त्यौहार जैसा ही स्वादिष्ट भोजन मिलता है।
सुरभि शोध संस्थान में रोजाना हरेक
केंद्र का प्रसाद आता है। कभी-कभी प्रसाद केंद्रों
का औचक निरीक्षण भी होता है। संस्थान के मुखिया
जालान खुद इस प्रसाद को चखकर लेते हैं ताकि कोई खामी
न रह सके। उन्होंने एक दिन मुझे भोजन में चटनी से
लेकर कढ़ी तक का पूरा पाक शास्त्र समझाया कि पूर्ण
भोजन किसे कहते हैं। पूर्ण भोजन के बारे में अभी तक
अपनी समझ उनसे अलग थी। शाम को थके हारे मेहनतकश
प्रसाद के पहले कुछ मनोरंजन कर सकें,
इसके लिए
केंद्रों पर परंपरागत मनोरंजन की व्यवस्था भी होती
है। यहां मेहनतकश भजन-कीर्तन कर सकते हैं। समिति की
कोशिश है कि इस शृंखला को और फैलाया जाए। दिल्ली के
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भी यह सेवा
शुरू हुई है। इसके अलावा गोरखपुर विश्वविद्यालय में
समिति के मार्गदर्शन में यह व्यवस्था चल निकली है।
काशी से निकली अन्नपूर्णा प्रसाद की यह
धारा
बाहर निकल रही है जो उन गरीब लोगों के लिए एक आशा है
जो सम्मान के साथ भोजन करना चाहते हैं। उनको ऐसा
प्रसाद देना उनके श्रम का सम्मान भी है,
जिसकी
अपने समाज को बड़ी जरूरत है। |