भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक व्यवस्था की पक्षधर हिन्दी मासिक पत्रिका

 जनवरी,  2008

पिछले अंक

हमारे बारे में

संपर्क करें

सदस्य बनें

अपना ई- मेल देखें

 जी-मेल

 हाट-मेल

 याहू-मेल

 रेडीफ-मेल

 सिफी-मेल

हिन्दी समाचार-पत्र

 अमर उजाला

 जागरण

 भाष्कर

 नवभारत टाइम्स

 प्रभासाक्षी

 सहारा समय

 बी.बी.सी हिन्दी

 घर बचओ- देश बचाओ अभियान

 

जनजागरण

रामानुजगंज का व्यवस्था परिवर्तन

                                     श्रीनाथ मेहरा

एक लंबे समय से देश में व्यवस्था परिवर्तन की जरूरत महसूस की जा रही है। अतीत में सामाजिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर ऐसे परिवर्तन के लिए काफी प्रयत्न भी हुए हैं लेकिन थोड़े से प्रयास के बाद फिर वही फराना ढर्रा या कहें बने बनाए ढ़ांचे पर हम वापस आ जाते हैं।

ऐसे माहौल में देश में पहली बार सामाजिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर प्रत्यक्ष बदलाव की गंगोत्री बना वनवासी बहुल राज्य छत्ताीसगढ़ का छोटा सा नगर, रामानुजगंज। इसके भगीरथ बने जुझारू एवं प्रखर व्यक्तित्व के धनी श्री बजरंगलाल। बजरंगलाल अग्रवाल पंद्रह वर्ष की छोटी आयु से ही सामाजिक जीवन में सर्किय हो गए थे। पंद्रह वर्ष की ही आयु में वे आर्य समाज से जुड़े। तबसे ही उनके मन में व्यवस्थाओं को लेकर असंतोष पलता रहा। 1975 में आपातकाल लगा तो वे भी जेल में बंद कर दिए गए। आपातकाल के बाद जनता ने कांग्रेस सरकार को उलटते हुए जनता पार्टी को शासन सौंपा। श्री अग्रवाल को लगा कि अब शायद व्यवस्था परिवर्तन हो। परंतु उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ जबकि उनके दो मित्र, एक केंद्रीय मंत्री और दूसरे मधयप्रदेश में गृहमंत्री जैसे उच्च राजनीतिक पदों पर थे। 25 दिसंबर 1984 में राजनीति की सीमाओं को देखते हुए उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया। उन्हें विश्वास हो गया कि केवल सत्ताा के माधयम से समाज में परिवर्तन संभव नहीं है। उसी समय से उन्होंने रामानुजगंज में ही एक पहाड़ी के नीचे एक छोटा-सा आश्रम बनाकर अनुसंधान प्रारंभ किया।

इस अनंसुधान की पूरी प्रर्किया पूर्णत: भारतीय थी। देशभर के विद्वानों का इसमें सहयोग लिया गया। प्रचार से पूर्णत: दूर रहकर शोध में लगे रहने के बाद भी कई बार शासन का प्रहार उन्हें सहना पड़ा। 4 नवम्बर, 1999 को शोध के निष्कर्षों को उन्होंने एक सादे समारोह में देश को समर्पित कर दिया। अपने इस अधययन से उन्हाेंने व्यवस्था परिवर्तन का मार्ग भी अपने सुझावों का व्यावहारिक स्वरूप दिखाने के लिए उन्होंने रामानुजगंज को ही चुना।

जनवरी, 2000 में श्री बजरंगलाल ने रामानुजगंज नगरपालिका का चुनाव लड़ा और उसके अधयक्ष चुने गए। उनका चुनाव घोषणा पत्र केवल चार लाइन का था कि वे चुनाव जीतकर न आफिस जाएंगे, न कोई काम करेंगे। सड़क, पानी, बिजली आदि का कोई काम वे नहीं देखेंगे। वे तो सिर्फ इतना करेंगे कि शुक्रवार की शाम साढ़े पांच बजे शहर के लोग नगरपालिका कार्यालय में बैठकर सब फाइल देखें और निष्कर्ष निकालें। वे जो भी निष्कर्ष निकालेंगे, उसे कार्यान्वित करने-कराने का दायित्व अध्यक्ष का होगा। चुनाव जीतने के बाद कुछ माह तक तो उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों और कानूनों का अधययन किया। उनकी पहल पर 25 सितम्बर, 2001 को नगरपालिका की बैठक में प्रस्ताव पारित कर निम्नलिखित महत्वपूर्ण संशोधन किए गए।

1. नगरपालिका परिषद में मतदाता परिषद नाम से एक ऊपरी सदन होगा, जिसमें नगर के प्रत्येक परिवार का एक सदस्य शामिल होगा। 2. शुर्कवार की बैठक में मतदाता परिषद जो निर्णय करेगी, वह परिषद का विधिवत प्रस्ताव माना जाएगा। 3. परिषद में कोई भी प्रस्ताव 80 प्रतिशत के बहुमत से ही पारित होगा, अन्यथा उस प्रस्ताव को खारिज माना जाएगा।  4. नगरपालिका परिषद के 20 प्रतिशत सदस्य भी अध्यक्ष के विरूध्द अविश्वास प्रस्ताव ला सकते हैं। अध्यक्ष को मतदाता परिषद में अपना बहुमत सिध्द करना होगा। 5. यदि नगरपालिका चोरी, लूट, एवं डकेती रोकने में विफल रहती है तो यह उसकेर् कत्ताव्यपालन की अवहेलना मानी जाएगी।

बाईस सितम्बर, 2002 को नगरपालिका अध्यक्ष बजरंगलाल ने विश्वास मत हासिल किया। इसमें उन्होंने कुल पड़े 80 प्रतिशत मतदान में से 72 प्रतिशत के बहुमत से समर्थन हासिल किया। इससे श्री बजरंगलाल को कानूनी एवं नैतिक सम्बल मिला। श्री बजरंगलाल के नेतृत्व में रामानुजगंज नगरपालिका की नई कार्यप्रणाली से अच्छे परिणाम सामने आने लगे। चोरी, मारपीट, भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त हो गए। कर की पूरी वसूली होने लगी। फलस्वरूप नगरपालिका की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। बीते वर्षों की अपेक्षा, नगर में कई गुना अधिक विकास कार्य हुए। मूल सुविधाएं - सड़क, बिजली, पानी, साफ-सफाई में उल्लेखनीय सुधार हुआ। जब श्री बजरंगलाल ने अपना कार्यभार संभाला था, उस समय नगरपालिका पर लाखों रुपयों का कर्ज था, लेकिन पांच वर्ष बाद नगरपालिका के बैंक खाते में दो करोड़ रुपए मुनापेफ के जमा थे।

सफल व्यवस्था संचालन से नागरिकों में स्वाभिमान का भाव जगा। प्रत्येक कार्य को पूरी पारदर्शिता से करने के कारण उनमें आत्मविश्वास भी मजबूत हुआ। दैनिक कार्यों में प्रशासकीय हस्तक्षेप भी कम होते गए। नगर के आसपास का क्षेत्र नक्सल प्रभावित था। परंतु नक्सलियों ने भी रामानुजगंज के अहिंसक परिवर्तन को समर्थन दिया।

इतने सफल एवं सार्थक परिवर्तन के बाद भी निहित स्वार्थों के कारण राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर इसका विरोध भी हुआ। कुछ लोग बिना किसी संवैधानिक या सरकारी अनुमति के नियम-कानूनों में पेफरबदल को सहन नहीं कर पाए। रामानुजगंज नगरपालिका के प्रस्तावों को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर का बताकर उनका विरोध हुआ और शिकायतें भी की गईं। लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री अजित जोगी ने नगरपालिका का पक्ष लिया और कहा कि इन आधारों पर यदि नगरपालिका को भंग किया जाता है तो फिर यही लोग चुनकर नगरपालिका में आ जाएंगे और फिर इनके परिवर्तनकारी कार्यों के अच्छे परिणाम ही तो आ रहे हैं। लेकिन फिर भी श्री जोगी ने कहा कि इनके परिवर्तन को वैधानिक मान्यता नहीं दी जा सकती। श्री जोगी के बाद भाजपा की सरकार बनी, लेकिन उसने भी अपेक्षित सहयोग नहीं दिया।

श्री बजरंगलाल नगरपालिका कार्यालय नहीं जाते थे। शुर्कवार की बैठक में पारित प्रस्तावों पर आगे कार्य होता था। शुर्कवार की बैठक में ही सभी बिल देखकर सबके बीच में ही उन पर हस्ताक्षर कर दिए जाते थे और वे अन्य सामाजिक कार्यों में अपना समय बिताते थे। शुर्कवार की बैठक में नगरपालिका संबंधी चर्चाओं के अतिरिक्त शहर की अन्य समस्याओं पर भी चर्चा होती थी और समाधान भी निकलते थे। इस बैठक में शहर के अनेक बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी आते रहते थे। समस्याओं की रोकथाम हेतु निरंतर चर्चा जारी रहती थी।

नगरपालिका क्षेत्र में स्थानीय फलिस के कार्यों को दो भागों में बांटा गया था। जुआ, शराब, वेश्यावृत्ति, गांजा, छुआछूत, कालाबाजारी, तस्करी, आदिवासी-हरिजन कानून, बाल विवाह, बाल श्रम एवं न्यूनतम मजदूरी जैसे मामलों में फलिस को कहा गया कि वह हस्तक्षेप नहीं करे। इस प्रकार के मामलों को जनता के ऊपर छोड़ दिया गया। फलिस एवं प्रशासन को निर्देश दिया गया कि वह चोरी, डकेती, बलात्कार, मिलावट, कम तौल, धोखाधड़ी, जालसाजी, आतंक, हिंसा, बल प्रयोग आदि की रोकथाम पर अपना धयान केंद्रित करे। जनता को भी हिदायत दी गई कि ऐसे मामलों में वह फलिस को सहयोग दे एवं ले भी।

नगर में साम्प्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए किसी भी पंथ के अनुयायियों को गुप्त बैठक करने की साफ मनाही की गई। तय किया गया कि ऐसी बैठकों में दो अन्य धर्मों के दो प्रतिनिधि केवल दर्शक के रूप भाग लेंगे। नगर में जातीय टकराव टालने के लिए किसी भी जाति या समुदाय की अलग से कोई धर्मशाला या निर्माणकार्य करने की मनाही की गई। तय किया गया कि पूरे नगर का सभी कुछ सांझा होगा, चाहे वह छूत हो या अछूत।

बजरंगलाल ने रामानुजगंज में मिली  सफलता के आधार पर पूरे देश में व्यवस्था परिवर्तन का एक रास्ता ढूंढा है। वर्तमान में उन्होंने लोक स्वाराज मंच और ज्ञान यज्ञ मंडल नामक दो संस्थाओं के माधयम से देशभर में जनजागरण प्रारंभ किया है। वे वर्तमान में त्रिसूत्रीय संविधान संशोधन और नई व्यवस्था के प्रारूप पर dविचार मंथन के लिए प्रयत्नशील है।

 संपर्क% बजरंग अग्रवाल, बनारस चौक, अम्बिकाफर, सरगुजा (छत्तसगढ़)

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन