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 जनवरी,  2008

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राजभाषा के सम्मान के लिए संघर्ष

कुंदन सिंह चम्याल

देश के संविधान ने हिन्दी को भारतीय संघ की राजभाषा घोषित किया। हिन्दी को उसका स्थान मिले, इसके लिए समय-समय पर कई महत्वपूर्ण नियम भी बने, लेकिन हिन्दी को उसका वह अधिकार, वह प्रतिष्ठा नहीं मिली जो उसे मिलनी चाहिए थी। जहां प्रजा की भाषा को ही उसका स्थान न मिला हो, वहां प्रजातन्त्र एक ढकोसले से अधिाक कुछ नहीं हो सकता। देश में सच्चे अर्थों में प्रजातन्त्र स्थापित हो, इसके लिए प्रजा की भाषा को उसका स्थान, उसका अधिाकार मिलना बेहद आवश्यक है। अपने अधिाकारों की लड़ाई लड़ने में सबसे बड़ा हथियार अपनी भाषा ही है। आज देश में कई व्यक्ति एवं संस्थान हिन्दी के प्रतिष्ठापन के लिए जी जान से लगे हुए हैं। ऐसा ही एक संगठन है, 'राजभाषा संघर्ष समिति, दिल्ली'। प्रदर्शनात्मक व खर्चीले कार्यव्रफमों से बचते हुए, रचनात्मक कार्यव्रफमों को हाथ में लेकर उनका उत्कृष्ट कृरीति से क्रियान्वयन ही राजभाषा संघर्ष समिति की कार्य प्रणाली है। इस संगठन से जुड़े लोगों के लिए हिन्दी केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं है, यह उनके लिए देश की अस्मिता की लड़ाई है।

दिल्ली की तत्कालीन साहिब सिंह वर्मा सरकार ने कई आश्वासनों व घोषणाओं के बाद भी जब दिल्ली राजभाषा विधोयक प्रस्तुत नहीं किया तो हिन्दी के लिए काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं ने स्वयं को ठगा हुआ महसूस किया। अत: एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस की गई जो इस तथा इस प्रकार के सभी मुद्दों को जोरदार ढंग से उठा सके। इसलिए काफी विचार-विमर्श के बाद 29 जून, 2001 को 'राजभाषा संघर्ष समिति' नाम से हिन्दी की आवाज उठाने वाले इस संगठन का पंजीकरण हुआ।

प्रमुख उपलब्धियां:

1- राष्ट्रीय रक्षा अकादमी व संयुक्त रक्षा सेवा (एन.डी.ए. तथा सी.डी.एस.) की प्रवेश-परीक्षाओं में चयन का माधयम केवल अंग्रेजी चला आ रहा था, जिससे हिन्दी माध्यम के लाखों प्रतिभावान छात्र प्रवेश से वंचित रह जाते थे। समिति ने हिन्दी माधयम के समर्थन में 11वीं व 12वीं के छात्रों में व्यापक हस्ताक्षर अभियान चलाकर हजारों छात्रों के हस्ताक्षर करवाए और विभिन्न बुध्दिजीवियों से पांच हजार पत्र भी सीधो प्रधानमंत्री जी को भिजवाए। सांसद श्री बालकवि बैरागी व श्री रासासिंह रावत से संसद में कई प्रश्न भी उठवाए गए। इस प्रकार के कई दीर्घकालिक प्रयत्नों के फलस्वरूप अंतत: जनवरी, 2004 में सरकार ने उक्त परीक्षाओं में द्विभाषिक प्रश्नपत्रों (अंग्रेजी के साथ हिन्दी भी) की मांग स्वीकार कर ली।

2- 2004 में दिल्ली विश्वविद्यालय में एम.ए. इतिहास की प्रवेश-परीक्षा में प्रश्न पत्र हिन्दी में न दिए जाने पर समिति ने व्यापक अभियान छेड़ा और न्यायालय में इस निर्णय को चुनौती दी।

3- केंद्रिय व राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों द्वारा राजभाषा हिन्दी की उपेक्षा के विरुध्द समय-समय पर समिति ने हजारों पत्र लिखे और नोटिस भेजे, जिनमें से कई के सकारात्मक परिणाम निकले। समिति इस प्रकार के पत्र निरंतर भेजती रहती है।

4- समिति ने देश के समस्त भाषाई संगठनों को एक मंच पर एकत्रित करने के लिए मई 2003 में विभिन्न संस्थाओं का एक विचार-विमर्श सम्मेलन हरिद्वार में आयोजित किया। इसके अलावा समिति ने भारतीय भाषा प्रतिष्ठान, राष्ट्रीय परिषद् (मुंबई) व मातृभाषा विकास परिषद् (दिल्ली) आदि देश भर के कई अन्य संगठनों से अपने निकट संबंधा स्थापित किए हैं, जिससे हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं की आवाज को जोरदार तरीके से उठाया जा सके।

डा. वेद प्रताप वैदिक, श्री कृष्ण कुमार ग्रोवर, श्री भगवती प्रसाद देवपुरा, श्री विश्वमोहन तिवारी (सेनानिवृत्ता एयर वाइस मार्शल), डा. मधु गुप्ता शास्त्री व के. रूद्रसेन सिंधु जैसे जाने-माने लोग समिति के संरक्षक मंडल में शामिल हैं। इनके अलावा कई वरिष्ठ विद्वान समिति के सक्रिय सदस्य हैं और बड़ी संख्या में बुध्दिजीवी समिति के कार्यों के प्रति सकारात्मक भाव रखते हैं।

समिति ने एक त्रैमासिक पत्रिका 'राजभाषा चेतना' का भी प्रकाशन शुरू किया है। पत्रिका में राजभाषा/राष्ट्रभाषा हिन्दी से संबंधित विचारोत्तोजक लेखों के साथ ही समिति की गतिविधियों, पत्र व्यवहार व प्राप्त सफलताओं का विवरण भी प्रकाशित होता है। यद्यपि पत्रिका धनाभाव से जूझ रही है, फिर भी जिस प्रकार संपादक प्रो. जयदेव आर्य के मार्गदर्शन में यह अपनी लोकप्रिय बनाए हुए है, वह एक उदाहरण है।

संपर्क: राजभाषा संघर्ष समिति, ए-4/153, सैक्टर - 4, रोहिणी, दिल्ली-85

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन