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एक मिशाल |
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पसारे हाथ को सहारा दें |
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आलोक गोस्वामी |
बात
शुरू होती है
1954 से जब बसवराज बालक ही थे।
कर्नाटक का गुलबर्गा जिला,
सेडम नगर। शाखा में जाना शुरू
किया, खेल-खेल में समाज
और देश की स्थिति में रुचि जगी। किशोरावस्था और फिर
युवावस्था में मन में यह बात घर करती गई कि जो हो,
काम वह करूंगा जो सबका भला करे,
नौकरी नहीं करूंगा। बसवराज युवा
हुए तो जैसा आम घरों में होता है,
शादी-ब्याह की चर्चा चलने लगी।
बस, भाग खड़े हुए,
घर वालों को कह गए,
न-न शादी नहीं करूंगा। अगला पड़ाव
था काशी। शिव बाबा की नगरी का दर्शन हुआ तो मन ठहर
गया। 1967 चल रहा था तब।
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के नगर प्रचारक श्याम जी
गुप्त मिल गए। उन्होंने युवा बसवराज को प्रथम वर्ष
संघ शिक्षा वर्ग में भेज दिया। अगले साल द्वितीय
वर्ष और 1969 में तृतीय
वर्ष। प्रचारक निकलने का मन में पक्का निश्चय कर
लिया। भाउफराव जी ने कहा, 'असम
जाओ, वहां काम संभालो।'
बिस्तर बंधा गया। मगर अचानक
भाउफराव का बिहार का कार्यक्रम बन गया तो बसवराव जी
से साथ चलने को कहा। बोले, 'चलो
साथ, तुम्हें बिहार में
ही रहना है।' 16 दिन में
16 जिले घूम डाले। प्रवास
के अंतिम दिन संथाल परगना में डेरा जमा। देवघर।
भाउफराव ने बसवराज से कहा, 'अब
तुम्हें यहीं रहना है।'
संथाल परगना यानी विकट जनजातीय इलाका। बहुत पिछड़ा।
उम्र तब 22 वर्ष थी।
देखते-देखते सात साल हो गए। बसवराज कन्नड़ से अच्छी
स्थानीय भाषा बोलने लगे। इस बीच मुंगेर जाना-आना
होता था। वहां तीन स्वयंसेवक मिलकर बाल भारती विद्या
मंदिर चलाते थे। सातवीं तक का स्कूल, 300-400
छात्र। अच्छा काम था। बस,
वह स्कूल
बसवराज के दिल में ऐसा घर कर गया कि उठते-बैठते उसी
के जैसे और स्कूल खोलने की कल्पना बनने लगी।
इस बीच वज्रपात हुआ। सेडम से खबर आई,
पिताजी अब नहीं रहे। बसवराज ने
तुरंत घर की ओर रुख किया। गुलबर्गा लौटे तो कुछ दिन
बाद फिर वही मुंगेर का स्कूल याद आया। ठान लिया,
हो न हो,
सेडम में छोटा सा स्कूल खोलेंगे
और वास्तव में कुछ ही दिन बाद स्कूल शुरू हो गया।
संघ के दायित्व भी बढ़ते गए। तालुका कार्यवाह,
जिला और फिर गुलबर्गा,
बीदर,
बीजापुर के विभाग कार्यवाह। इधार 1974
में इमरजेंसी लगी,
जेल में बंद हो गए। 1977
में छूटे तो जनता पार्टी से
जुड़ने का बहुत दबाव आया। बसवराज जी ने साफ कह दिया,
राजनीति में मन रमता नहीं। इस
बीच स्कूल बढ़ता गया जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। नए
स्कूल खुलते गए। 1974 में
विधान
परिषद चुनावों में हिस्सा लिया मगर
173
वोट से हार गए। 1990
में फिर विधान
परिषद के लिए ही माधयमिक शिक्षा संघ के भाजपा
समर्थित उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा,
इस बार 400
वोट से जीते। 1990
की याद करते हुए बसवराज जी बताते
हैं, 'माननीय हो. वे
शेषाद्रि जी ने मुझसे जब यह कहा कि सबकी इच्छा है,
तुम राजनीति में जाओ तो मैं क्या
कह सकता था।' पार्टी की
जिम्मेदारियां बढ़ती गईं,
प्रदेश भाजपा उपाधयक्ष बने फिर 2003-2004
के दौरान प्रदेश महामंत्री रहकर
काम किया। आगे चलकर अखिल भारतीय मंत्री और राष्ट्रीय
कार्यसमिति सदस्य बनाए गए। इस बीच 1999
के लोकसभा चुनाव आए। भाजपा ने
गुलबर्गा लोकसभा क्षेत्र से इन्हें चुनाव लड़ाने का
फैसला लिया। बसवराज जीत गए। लोकसभा सांसद बने। यह
13 माह की वाजपेयी सरकार
का कालखण्ड था। लोकसभा के अनुभव बताते हुए वे कहते
हैं, 'सदन में बैठकर
आवश्यक काम-काज किया, पर
बार-बार लगा कि मैं इस जगह के लिए नहीं बना हूं।
मेरे जीवन का उद्देश्य इस रास्ते पूरा होने वाला
नहीं है।' आखिरकार
2004 में पार्टी की जवाबदेही
पूरी करने के बाद बसवराज जी ने गहन चिंतन किया और इस
नतीजे पर पहुंचे कि सेडम और आस-पास हैदराबाद-कर्नाटक
के इस अति पिछड़े क्षेत्र में ज्ञान-दीप का उजास
फैलाना चाहिए। पूर्ववर्ती निजाम की रियासत का अंग
रहा यह क्षेत्र वास्तव में आजादी के बाद
40-44 साल तक घोर दरिद्रता का
शिकार रहा था। न स्कूल, न
कालेज, न अस्पताल। न
नौकरी-पेशे के अवसर थे, न
खेतों को पानी। चारों और विपन्नता। 'आखिर
ऐसा क्यों? मेरा गांव,
मेरा नगर,
मेरा क्षेत्र इतना पिछड़ा क्यों?
क्यों नहीं यहां के लोग
स्वाभिमानी बनते? क्यों
नहीं यहां के बच्चे ढोर चराने की बजाय स्कूल जाते?'
विचारों के इस मंथन से भविष्य के
वटवृक्ष का बीज उपजा। इस समय तक बसवराज जी सेडम और
आस-पास करीब 80 विभिन्न
संस्थाओं के स्कूल आरम्भ करवा चुके थे। उन्होंने
प्रण किया कि शिक्षा के जरिए ही इस पिछड़े क्षेत्र
में उजास फैलाने में लग जाऊंगा। और आज तीन साल के
काम के बाद बहुत संतोष का भाव उनके चेहरे पर दिखता
है। बसवराज जी बताते हैं, 'गुलबर्गा
जिले के 21 स्थानों पर
विद्याभारती से संबध्द स्कूल चल रहे हैं।'
6000 छात्रों के साथ उनका सीधा
संपर्क है।
कैसे हुई यह शुरुआत?
प्रेरणा कहां से मिली?
विचार कैसे कौंधा?
इन प्रश्नों को सुनकर उनके चेहरे
पर मुस्कुराहट दौड़ जाती है और फिर गंभीर मुद्रा में
कहते हैं, 'आपको मालूम ही
है कि हमारे डा. कलाम (पूर्व राष्ट्रपति) और अटल जी
(पूर्व प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी) का सपना है कि भारत
2020
तक विश्व के अग्रणी देशों में एक
बने। हम भी यही चाहते हैं कि इन दोनों विभूतियों का
सपना पूरा हो और हम उसमें अपना किंचित सहयोग दें।'
संकल्प साधा
और
जुट गए। लोग भी साथ आते गए। इंफोसिस समूह ने दिल
खोलकर भारतीय शिक्षण समिति के सभी प्रकल्पों में
सहयोग दिया है।
2004
में हैदराबाद-कर्नाटक अभिवृध्दि
विभाग के अंतर्गत शिक्षण समिति की आगे की योजनाओं का
खाका तैयार किया गया। और योजनाएं भी कैसी अनूठी,
जरा गौर करिए। 2400
स्कूलों में प्रति स्कूल
2000 रुपए मूल्य की पुस्तकों का
वितरण, सत्साहित्य
प्रकाशन, 2000
व्याख्यानों का आयोजन,
जिसमें अपने-अपने क्षेत्र के ख्यातनाम लोग समाज के
विभिन्न वर्गों का मार्गदर्शन करते हैं,
किसानों को आत्महत्या नहीं
आत्म-स्वाभिमान की राह पर ले जाने की 30
लाख रुपए की योजना,
गरीब वर्ग की महिलाओं को
स्वावलंबी बनाने के लिए निश्चित अंतराल पर
सिलाई-कढ़ाई सिखाने की 34
केन्द्रों में व्यवस्था और सिलाई मशीन वितरण। गरीब
छात्रों के लिए बनी योजना की जानकारी देते हुए
बसवराज जी कुछ भावुक हो गए थे। वे बताते हैं,
'हर साल मैट्रिक और बारहवीं पास
करने वाले 600 गरीब
किन्तु मेधावी
छात्रों को
2400 रुपए छात्रवृत्तिा देते
हैं। उनके शिक्षण शुल्क में भारी छूट देते हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले
चुनिंदा (इंफोसिस इनका चयन करती है) इंजीनियरिंग
छात्रों को हर साल 20,000
और मेडिकल छात्रों को हर साल 30,000
रुपए पढ़ाई पूरी होने तक दिए जाते
हैं।' बसवराज जी को अपनी
संस्था द्वारा संचालित 21
स्कूलों के 6000 से अधिाक
छात्रों में से अधिकांश के नाम और उनके घर,
माता-पिता की सीधी जानकारी है।
कैसे? उन्होंने यह तय
किया हुआ है कि साल में कम से कम एक बार हर छात्र से
वे सीधो बात करें। और छात्र भी उनके व्याख्यान सुनने
को उतावले रहते हैं। इसका कारण केवल यही है कि
बसवराज भी अपने भाषण में कोई भारी-भरकम बौध्दिक
शब्दावली प्रयोग नहीं करते बल्कि बहुत सरल,
कथा-कहानियों,
संस्मरणों के माधयम से उनमें
देशभक्ति, संस्कार,
संस्कृति और स्वावलंबन की लौ
जगाते हैं। वे कहते हैं,
पहले यवनों की फिर अंग्रेजों की 12
सौ साल पुरानी गुलामी की गंदगी
पूरी तरह से मिटाने में वक्त लगेगा। शायद आप जानते
होंगे, देश के 6.4
लाख
गांवों में हनुमान मंदिर है और उन हनुमान जी का
जन्मस्थान यही हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र है।
किष्किन्धाा यही है। पर यहां के लोगों में अपने मान
का भाव नहीं है। यह दयनीय स्थिति है यहां की। और इसी
को बदलने का बीड़ा उठाया है बसवराव जी ने।
बदलाव भी आया है। धीरे-धीरे लोग
जागे हैं,
40-44 साल के अंधोरे से बाहर
झांकने की कोशिश शुरू हो चुकी है। अब हाथ पसारने
नहीं, बल्कि पसारे हुए
हाथ को कुछ देने की कुव्वत पैदा हो रही है। तीन साल
पहले देखा एक छोटा सा सपना आज आकार ले चुका है।
2004 में संस्था का भवन
खड़ा करने और अन्य मूलभूत सुविधाएं
जुटाने के लिए बसवराज जी ने
40 लाख
रुपए का बजट रखा था।
लोग हंसे कि कहां से आएगा इतना पैसा।
मगर तीन साल के ही भीतर
40 लाख
नहीं डेढ़ करोड़ रुपए ढांचागत सुविधाओं
के प्रबंधा में ही खर्च हुए हैं। वे कहते हैं,
'धान के लिए हम सत्ता के आगे
हाथ नहीं फैलाते। हमारा संबल तो इस क्षेत्र का जन-जन
है। उसी के सहयोग से और हनुमान जी के आशीर्वाद से यह
सब हो रहा है।' |