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 जनवरी,  2008

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एक मिशाल

पर्यावरण प्रेमी का कर्तव्य

विमल भाई

मोबिल आयल में सने हाथों से उन्होंने मुझे षिकेश की बस का टिकट थमाया। मैं पांच दिन के अपने उपवास के बाद लौट रहा था। टिकट के पैसे उन्होंने नहीं लिए, बोले-गाड़ी ठीक कर रहा हूं, जरा जल्दी में हूं। 'पर्यावरण प्रेमी' प्रताप पोखरियाल के चौड़े हाथ एक मैकेनिक के हाथों से कहीं ज्यादा काम करने वाले हैं। उत्तारकाशी में इनकी मकान-दुकान है। पत्नी दुकान पर बैठती हैं। घर की छत पर गमले भरे हैं और मकान के पीछे अनेका वनौषधियों से भरा जंगल लगा है। इनके आंख में लोहे का टुकड़ा चला गया था सो आंख में खराबी है, कम दिखता है।

उत्तारकाशी को तीर्थनगरी घोषित करवाने के महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम देने में जुटा यह साधारण सा दिखने वाला आदमी एक बड़े काम में भी जुटा है। वो है पेड़ लगाना। उनका पागलपन है पेड़ लगाना-लगवाना। शराब-मांस बंदी जैसे आंदोलनों में ये अपनी रोजी-रोजगार चौपट कर बैठे। इन्होंने अब तक तकरीबन सात लाख पेड़ लगाए हैं। प्रताप जी अपने को 'पर्यावरण प्रेमी' कहलाना पंसद करते हैं, उन्हें बस खाली जमीन चाहिये। विद्यालयों में जाकर बच्चों को पेड़-पर्यावरण की शिक्षा देना भी उनका पसंदीदा काम है।

हजारों एकड़ जमीन में उन्होंने पांच विशाल जंगल खड़े किये हैं। उनका पैतृक गांव भैंत, उत्तारकाशी जिले में  है। वहां उन्होंने अपनी जमीन पर ही पेड़ लगाये हैं। किसी गैर सरकारी संगठन के प्रोजेक्ट का बोझ उनके माथे पर नहीं है। पौधो लगाने के वक्त वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीकरूप में तीन बीज बोते हैं। बाद में इस छोटे गढ़े को सूखी पत्तिायां डाल भर देते हैं। छोटे-छोटे गढ़े सीढ़ीदार क्यारी के रूप में बनाते हैं ताकि वर्षा का जल भी आराम से सही रूप में पहुंचे। उनका सच्चा साथी तो कुदाल है। वे कहते हैं, 'प्रकृति ही मेरी किताब है, कुदाल मेरी कलम है। पेड़ों के तने उसके पन्ने हैं, शाखायें उसके वाक्य, पत्तियां उसके स्वर और व्यंजन हैं।' उनकी लिखी वृक्ष वन्दना लोग बडे चाव से गाते हैं। जहां-जहां भी वे जाते हैं, पेड़ लगाते हैं। विवाहों में जाने पर पहले से निश्चित होता है पेड़ लगाना। सिर्फ पेड़ लगा देना ही काफी नहीं होता, उसे बड़ा करना, उसकी उपयोगिता के हिसाब से लगाना भी एक बड़ा काम है। पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता व समझ पैदा करना भी आसान नहीं है।

दरअसल, ये सब किसी भी गैर सरकारी संगठन का बड़ा प्रोजेक्ट हो सकते हैं। देश को कर्जों में डालकर विश्व बैंक के उधार पर बहुत सारे प्रोजेक्ट उत्ताराखण्ड में चल रहे हैं, किन्तु इस तरह से एकनिष्ठा से काम अपने आप में एक मिसाल है। आलोचना के शिकार वे भी होते हैं, पर उनके लगाये वृक्षों को भला कौन नकार कर सकता है? आज के समय में ऐसे प्रयास अनुकरणीय हैं। अपनी जमीन अपना पैसा और सब ओर शुध्द हवा पानी। पेड़ लगाना महत्व का काम तो है पर उसे पालना-संभालना कहीं ज्यादा महत्व का काम है। यह कहना गलत नहीं होगा कि देश के वन विभाग का काम एक पर्यावरण प्रेमी कर रहा है।

ईमेल:  bhaivimal@gmail.com

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन