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 जनवरी,  2008

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पैसा जिसका-मांगे वही हिसाब

                                      भंवर मेघवंशी

डूंगरफर जिला पांच ब्लाकों और 237 ग्राम पंचायतों में बंटा हुआ है। 2 फरवरी को इस जिले में रोजगार गारंटी योजना लागू की गई। अब तक इस कार्यक्रम के लिए 2 लाख 37 हजार 228 परिवारों ने अपना पंजीयन करवाया है, जिनमें से 2 लाख 26 हजार 407 लोगों को जाब कार्ड जारी किए गए हैं तथा 1 लाख 29 हजार 590 लोगों ने काम के लिए आवेदन किया। अब तक इस जिले में तकरीबन 8.52 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। 31 मार्च 2006 तक 11 लाख 63 हजार 800 मानव दिवस अर्जित किए गए हैं तथा 1 लाख 4 हजार 368 लोगों को इसके तहत काम मिला। वर्तमान में डेढ़ लाख लोग विभिन्न कार्यों में रोजगार प्राप्त कर रहे हैं।

इतने बड़े पैमाने पर डूंगरफर जिले में पहली बार लोगों को रोजगार मिला है। पहली बार गांवों में करोड़ों रुपए आ रहे हैं तथा खर्च हो रहे हैं। जल, जंगल, जमीन के विकास के लिए काम हो रहा है। कार्यक्रम नया है मगर उसका क्रियान्वयन करने वाली व्यवस्था में लगे लोग तो वे ही फराने हैं जिनकी आदत पड़ी हुई है जनता से छुप कर अनियमितता करने की। इसलिए रोजगार गारंटी कानून लाने के लिए वर्षों से संघर्षरत रहे सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं की चिंता स्वाभाविक ही कही जाएगी कि कहीं यह ऐतिहासिक कानून भी भ्रष्टाचार की चपेट में आकर दम नहीं तोड़ दे। इसलिए डूंगरफर को एक माडल जिला बनाने के लिए रोजगार एवं सूचना का अधिकार अभियान अस्तित्व में आया तथा तय हुआ कि इस जिले में रोजगार गारंटी कार्यक्रमों के तहत चल रहे कार्यों का मौके पर ही सामाजिक अंकेक्षण किया जाए।

लोकसभा सचिवालय की आडिट व वित्त मामलों के संयुक्त सचिन अमिताभ मुखोपाधयाय, जो कि गुजरात के आडिटर जनरल भी रह चुके हैं, का कहना है, ''हम तो कागज से कागज मिलाकर अंकेक्षण करते हैं और पाते हैं कि कागज पर तो सब आंकड़े सही हैं, लेकिन मौके पर काम हुआ या नहीं, जिन लोगों के नाम मस्टररोल में दर्ज हैं, वे काम पर आए या नहीं, उन्हें मजदूरी पूरी मिली अथवा नहीं तथा सामग्री की सप्लाई हुई या नहीं, इन बातों का भौतिक सत्यापन हम नहीं करते हैं, उसके लिए सोशल आडिट जरूरी है।''

अंतत: 15 अप्रैल 2007 का वह बहुप्रतिक्षित दिन भी आ गया जब देश भर से 165 संगठनों के 908 लोग डूंगरफर पहुंचे। इनमें सामाजिक कार्यकर्ता, प्रोफेसर, पत्रकार, छात्र, वकील, रिसर्चर तथा विषय विशेषज्ञों के अलावा बड़ी संख्या में मजदूर व किसान लोग भी शामिल हुए। इन्हें बताया गया कि डूंगरफर जिले में चल रहे रोजगार गारंटी कार्यों के प्रत्येक कार्यस्थल पर पैदल चल कर जाना होगा तथा खाना गांव में एक-एक घर में एक व्यक्ति को जाति अथवा धर्म का भेद किए बिना मांग कर खाना होगा।

पदयात्रियो में रोजगार गारंटी के सामाजिक अंकेक्षण के प्रति गजब का उत्साह देखा गया। देश के 19 राज्यों के अलावा जर्मनी, अमेरिका और पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश से भी लोग यह प्रयोग देखने के लिए शामिल हुए। इसमें बांग्लादेश का दस सदस्यीय दल वहां पर 'नीजेराकोरी' नामक संगठन से जुड़ा हुआ है। 'नीजेराकोरी' का मतलब होता है-हम खुद के बूते खड़े हैं, हमें किसी की मदद नहीं चाहिए।

और फिर 17 अप्रैल का दिन आ गया जब रोजगार गारंटी कार्यक्रम को पारदर्शी तरीके से चलाने के लिए सामाजिक पहरुए गांवों के लिए निकल पड़े। रंग-बिरंगे पर्दे, पुरुष-महिला कठपुतलियां, नारे लिखी तख्तियों से सजे-धजे 31 दल ढोलक की थाप पर नाच रहे थे। इनमें से हर टोली के पास एक मेगा माइक भी था, जिसके जरिए 'मिल गई भाई मिल गई, रोजगार की गारंटी' तथा 'हमारा पैसा, हमारा हिसाब- के नारे लगाए जा रहे थे और 'जागो-जागो रे आदिवासी भाई-बहन, ऊंघ तमें केम आवे- जैसे गीत गाए जा रहे थे। 'देश की जनता मांग रही है, पैसे-पैसे का हिसाब' चारों तरफ बस यही गूंज थी। रोजगार एवं सूचना का अधिकार अभियान के पंडाल में पर्व-त्यौहार सरीखा माहौल था। झंडा दिखा कर रवाना करने की प्रक्रिया बहुत ही रोचक हो गई थी। इस अनूठे प्रस्थान ने पदयात्रियों में जिस जोश का संचार किया उसी से ऊर्जा प्राप्त कर ये टोलियां 7 दिनों तक लगभग 8 पंचायतों में गईं।

सामाजिक अंकेक्षण का कार्य 18 अप्रैल को शुरू हुआ, क्योंकि 17 अप्रैल की शाम तक तो पदयात्री टोलियां ट्रकों में लदकर सामग्री सहित गांवों में पहुंची ही थीं। अलसुबह पदयात्री जागे और चल पड़े कार्यस्थलों पर, जहां देखा गया कि अधिकतर कार्यों में महिलाएं और बुजुर्ग लोग ही लगे हुए थे। डूंगरफर जिला प्रशासन ने पदयात्र के मद्देनजर काफी फख्ता प्रबंध किए। अधिकांश कार्यस्थलों पर रोजगार गारंटी बोर्ड लगाए गए थे। काम पर लगे लोगों के लिए पानी तथा दवाई का इंतजाम किया गया था। कहीं-कहीं छाया की भी व्यवस्था देखी गई। मौके पर जाब कार्ड थे तथा 98.9 प्रतिशत स्थलों पर मस्टररोल उपलब्धा थे, जो लोगों को दिखाए जा रहे थे। यह अपने आप में बहुत बड़ा बदलाव था, क्योंकि इससे पहले के अनुभव रहे हैं कि मस्टररोल मांगने पर यह बहाना किया जाता था कि- हवा में उड़ गए हैं, बकरी खा गई है, फट गए हैं। कई बार तो कान्टेंक्टर मस्टररोल लेकर ही भाग जाता था, लेकिन राष्ट्रीय सूचना का अधिकार कानून लागू होने के कारण सभी सरकारी दस्तावेज आम जनता को देखने के लिए खोल दिए गए थे। उसी का परिणाम रहा कि डूंगरफर की जनता के लिए समस्त मस्टररोल सार्वजनिक किए गए।

पदयात्र के अलावा एक साइकिल यात्र भी प्रारंभ की गई। हर जगह जहां से पदयात्री निकल रहे थे। उनके आगे-पीछे सचिव, सरपंच, पटवारी  वगैरह घूम रहे थे। उनके आने की सबको खबर थी, इसलिए सब कुछ ठीक-ठाक दिखलाई पड़ रहा था। एक औचक निरीक्षण के लिए मोबाइल टीम भी गठित की गई। हर दिन पदयात्री दल, साइकिल समूह तथा मोबाइल टीम रिपोर्ट भिजवा रहे थे, जिसका सार संक्षेप यह था कि-क्षेत्र के आदिवासी मजदूर प्रभावशाली लोगों के दबाव और  शोषण के शिकार हो रहे हैं। कुछ जगहों पर यह भी देखा गया कि जहां आदिवासी और गैर आदिवासी दोनों वर्ग के श्रमिक रोजगार गारंटी कार्यों में लगे हुए हैं वहां पर आदिवासी लोग उपस्थिति दर्ज करवाने के बाद या तो कार्यस्थल से चले जाते हैं या रहते भी हैं तो काम नहीं करते हैं। गैर आदिवासी मर्द मेट बनने को प्राथमिकता देते हैं, जबकि औरतें पानी पिलाने को। यह तथ्य भी उजागर हुआ कि पानी पिलाने के काम में अधिकांशत: सवर्ण जाति की औरतों को लगाया जाता है। जहां पर केवल आदिवासी श्रमिक कार्यरत हैं वहां पर जरूर पानी पिलाने को आदिवासी महिलाएं हैं, लेकिन जहां पर आदिवासी और गैर आदिवासी दोनों प्रकार के श्रमिक हैं, वहां पर पानी पिलाने वाली महिलाएं भी अलग-अलग हैं और उनके लिए अलग मटकियों का भी इंतजाम किया गया है। पदयात्री समूहों की रिपोर्टों के मुताबिक टास्क देने और नपती लेने में प्राय: आदिवासी श्रमिकों के साथ भेद-भाव किया जा रहा था। उनसे अधिक काम लिया जाता था। मगर कम पैसा दिया जाता है। असफर ब्लाक में एक स्थान पर इसके विपरीत स्थिति भी पाई गई, जहां पर गैर आदिवासियों को आदिवासी मजदूरों की तुलना में काफी कम मजदूरी मिली। इस पर शोरगुल भी मचा लेकिन वहां के कनिष्ठ अभियंता ने कहा कि-''हम क्या कर सकते हैं, सामान्य जाति के लाग जनजाति मजदूरों की अपेक्षा बहुत काम करते हैं। इसलिए उन्हें तो कम दाम ही मिलेगा।'' एक और बात जो कुछ जगहों से उभरी कि निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी नहीं चाहते कि यह कार्यक्रम सफल हो, इसलिए वे जानकारी नहीं देते। काम मांगने की रसीदें नहीं दी जाती  हैं, जाब कार्ड मेटों के घर पर रखे जाते हैं। व्यक्तिगत नपती कहीं भी नहीं की जाती। जिला प्रशासन इसका कारण इंजीनियरों की अत्यंत कमी होना बताता है। क्रेश की व्यवस्था कहीं नहीं दिखी, जबकि काम पर 85 प्रतिशत महिलाएं ही लगी हुई हैं। श्रमिकों को लीड और लिफ्रट का लाभ भी नहीं दिया जा रहा था। ग्रामीण औरतें चाहती थीं कि उन्हें काम के बदले आधा पैसा और आधा गेहूं दिया जाए, क्योंकि नगद पैसा उनसे उनके पति ले लेते हैं और दारू या अन्य चीजों में खर्च कर देते हैं इतना ही नहीं जब वे बाजार से अनाज खरीदने जाती हैं तो वहां बहुत महंगे दामों पर अनाज दिया जाता है।

डूंगरफर के ग्रामीण क्षेत्र में चल रहे कार्यों पर अंधो, असहाय, विकलांग तथा बुजुर्ग स्त्री-पुरुषों के भी काम पर लगे होने के समाचार मिले क्योंकि वहां पर जैसे ही बच्चा जवान होता है, वह अपनी पत्नी को लेकर कमाने निकल जाता है। पीछे रह जाते हैं बूढ़े मां-बाप। उनकी कोई संभाल करने वाला होता नहीं है। ऐसे लोग भी काम पर आ रहे थे। चूंकि ऐसे बुजुर्गों तथा चुनौतीपूर्ण शारीरिक स्थिति वाले मजदूरों की कार्यक्षमता कम होती है, इसलिए काम के लिए बनाए जा रहे 4 या 5 लोगों के समूह में इनको कोई भी रखने के लिए तैयार नहीं होता है। ऐसे वृध्द व विकलांग लोगों के लिए कम टास्क देने की अथवा अन्य सामाजिक सहायता उपलब्ध करवाने की जरूरत भी पदयात्रियों ने जगह-जगह महसूस की। ऐसा नहीं है कि डूंगरफर में सब कुछ अच्छा ही था या कि सब कुछ बुरा ही। सकारात्मक उदाहरण काफी थे, तो कुछ नकारात्मक चीजें भी उभरीं। मस्टररोलों में फर्जी हाजिरी भरने, अग्रिम भुगतान में से कुछ रुपए मार लेने, न्यूनतम मजदूरी पूरी नहीं देने जैसी आम शिकायतें यहां भी पाई गईं, लेकिन बहुत ही कम। डूंगफर में कार्यरत 1 लाख 50 हजार मजदूरों में से मात्र 145 हाजिरियां ही फर्जी पाई गईं। उन पर भी प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई की। पदयात्रियों को 290 कार्यस्थलों पर 50 से अधिक शिकायतें मिली जो कि 2 प्रतिशत अनियमितता भी नहीं कहीं जा सकती हैं। एक वक्त था जब देश के प्रधानमंत्री ने माना था कि 100 में से 85 पैसा चोरी हो रहा है जबकि डूंगरफर प्रयोग ने साबित किया कि जनता अगर निगरानी करे तो 100 में से 2 पैसा भी चोरी करना संभव नहीं हो सकता है।

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन