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 जनवरी,  2008

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नेत्रहीनों की शिक्षा को किया संभव

हर्षिता

राजधानी दिल्ली में एक जगह है बुध्द विहार। यहां के फैज प्रथम में दिव्य ज्योति निवास नाम से नेत्रहीन बच्चों का एक आश्रम है। दिल्ली के विभिन्न महाविद्यालयों में पढ़ने वाले नेत्रहीन छात्रों को यहां रखा जाता है। इनके रहने, खाने, दवा, पढ़ाई आदि की व्यवस्था यहां नि:शुल्क है। कोई भी नेत्रहीन छात्र महाविद्यालय में पढ़ने का प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर इस आश्रम में रह सकता है और जब तक उसे पढ़ना है पढ़े।

इनमें से अधिकांश इन्टरमीडिएट और स्नातक के छात्र हैं। इसका संचालन नार्थ एक्स ब्लाईंड वेलफैयर एण्ड एजुकेशंस सोसाइटी नामक एक संस्था करती है। आश्रम के संस्थापक हैं डा. रामचन्द्र गुप्ता। आश्रम की स्थापना क्यों और केसे हुई? इस संदर्भ में डा. गुप्ता कहते हैं, 'कुछ साल पूर्व की बात है। हर वर्ष की तरह उस साल भी मैं दीवाली के दिन मंगोलपुरी के एक नेत्रहीन विद्यालय के छात्रों के बीच मिठाई बांटने गया था। हालांकि दीवाली के अवसर पर मैं वर्षों से इस तरह के लोगों के बीच मिठाई बांटता आ रहा था, पर उस दिन वहां के नेत्रहीन छात्रों की दयनीय स्थिति देखकर मुझे बहुत दु:ख हुआ। जहां पूरा देश दीवाली के जश्न में डूबा हुआ था, वहीं ये बच्चे भूख से तड़प रहे थे। पता चला कि विद्यालय चलाने वालों के पास उस दिन दाल, चावल कुछ नहीं था, इसलिए खाना नहीं बना था। तत्काल मुझसे जो कुछ बन पाया मैंने व्यवस्था की और घर लौट आया। तभी मेरे मन में आया कि इन नेत्रहीन बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए। उसी रात मैंने अपने कुछ इष्ट मित्रों को अपनी योजना बताई और वे भी सहर्ष तैयार हो गए। हम कुल दस मित्र थे और तय हुआ कि एक व्यक्ति हर महीना पांच हजार रफपए देगा। इस तरह इस आश्रम का जन्म हुआ। थोड़े ही समय में आश्रम की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। इस कारण काफी नेत्रहीन छात्र आश्रम में आए और इनकी मदद के लिए समाज भी आगे आया। आज स्थिति यह है कि समाज के सहयोग से ही यह आश्रम नेत्रहीनों की सेवा में लगा है।' आश्रम के उद्देश्यों के बारे में उन्होंने बताया कि नेत्रहीन बच्चे पढ़-लिखकर एक सम्मानजनक जीवन जी सकें और देश के विकास में इनका योगदान हो, यही मुख्य उद्देश्य है।

पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को कई तरह के व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं ताकि बच्चे खुद अपने पैरों पर खड़ा हो सके। आश्रम में प्रत्येक मंगलवार को सुंदर काण्ड का पाठ भी होता है। बच्चे अन्य जगहों पर भी सुंदर काण्ड का पाठ करते हैं। इससे जो आमदनी होती है बच्चों पर ही खर्च की जाती है। उल्लेखनीय है कि इस समय पूरे देश में एक करोड़ से अधिाक लोग नेत्रहीन हैं। किसी गरीब घर का नेत्रहीन बच्चा तो छोटी उम्र में ही एक हाथ से पतलून संभालता है तो दूसरे में भीख का कटोरा थामे रहता है। गांव के ऐसे बच्चे भीख मांगते-मांगते शहर पहुंचते हैं। यहां कुछ बच्चे भीख ही मांगते रहते हैं, तो कुछ किसी नेत्रहीन विद्यालय में पढ़ने लगते हैं। दिल्ली में कई ऐसी संस्थाएं हैं, जो नेत्रहीन छोटे बच्चों के लिए विद्यालय चलाती हैं। किन्तु बड़े बच्चों के लिए गिने-चुने विद्यालय ही हैं। इनमें से एक दिव्य ज्योति निवास है। यह पूर्णत: आवासीय है। डा. रामचन्द्र गुप्ता के अनुसार यहां रह रहे नेत्रहीन छात्रों को महाविद्यालय से लौटने के बाद उनकी पढ़ाई पूरी करवानs के लिए एक शिक्षक रखा गया है। उल्लेखनीय है कि ये छात्र कक्षा में शिक्षक के व्याख्यान को सुनने के साथ-साथ टेप कर लेते हैं। जब कभी उन्हें कुछ दिक्कत होती है तो वे आश्रम के शिक्षक के माध्यम से उसे हल करते हैं। शिक्षक के अलावा आश्रम में और चार-पांच वेतनभोगी कर्मचारी हैं। इनका काम इन छात्रों की हर समस्या का निदान करना है।

संपर्क: एम-1/165, बुध्द विहार, फैज-प्रथम, दिल्ली-110034

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन