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 जनवरी,  2008

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नवांकुर : एक शाश्वत संकल्प

भारतीय पक्ष ब्यूरो

दलितों और वंचितों के अधिकारों को लेकर समय-समय पर दुनिया के अलग-अलग देशों में सभा, संगोष्ठी, आंदोलन आदि होते रहे हैं। इन सबकी गूंज गाहे-बगाहे विश्व के सभी देशों की सत्ता और समाज का धयान आकर्षित करती रही है और फिर इन प्रतिष्ठानों के माध्यम से समय-समय पर कुछ कल्याणकारी योजनाओं और नीतियों की घोषणाएं भी होती रही हैं। लेकिन, इस संसार में एक वर्ग ऐसा है जिन्हें ईश्वर ने शारीरिक अथवा मानसिक रूप से अक्षम बना वंचितों की श्रेणी में रख दिया है। जबकि एक दूसरा वर्ग भी है जिसे ईश्वर ने नहीं बल्कि इस समाज और यहां की सामाजिक व्यवस्था ने वंचितों अथवा दलितों की श्रेणी में शामिल होने को अभिशप्त कर दिया है।

इनमें दूसरा वर्ग अपनी शारीरिक मानसिक सक्षमता के चलते अपने सामाजिक-आर्थिक अधिकारों की लड़ाई कहीं अधिक मजबूती के साथ धरना, प्रदर्शन, आंदोलन जैसे लड़ाई के उन तमाम तरीकों के साथ लड़ सकता है। मगर पहले वर्ग के वंचितों के साथ यह सुविधा नहीं है, वह अपनी लड़ाई-लड़ने में अपनी शारीरिक अक्षमता के कारण कमजोर पड़ जाते हैं। परिणाम यह होता है कि दूसरे वर्ग के लोगों को उनका अधिकार उनकी अपनी लड़ाई के चलते, अपने संघर्ष के चलते  सम्मान और स्वाभिमान के साथ प्राप्त हो जाता है। जबकि पहला वर्ग अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए किसी और की दया और सहानुभूति पर निर्भर रहता है।

ऐसे अनेक संवेदनशील स्वयंसेवी समूहों और संगठनों की आवश्यकता है जो इन्हें सहायता प्रदान कर सकें। इस परिप्रेक्ष्य में दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कालेज के कुछ छात्रों की ओर से एक विशेष पहल के रूप में विकलांगों, विशेषकर नेत्रहीन छात्र-छात्राओं की सहायता के लिए नवांकुर नामक एक संस्था का गठन किया गया है। बिना किसी सरकारी सहायता या अनुदान के काम करने वाली इस संस्था ने गत  वर्षों में विश्वविद्यालय के नेत्रहीन छात्र-छात्राओं को नया हौसला दिया है। उनमें नया जज्बा पैदा किया है ताकि इन्हें ऊंची और लंबी उड़ान भरने के लिए उन्मुक्त आकाश मिल सके।

21 अगस्त 2006 को गठित इस संस्था के सदस्यों ने नेत्रहीन बच्चों को पढ़ाने, उनके लिए अधययन सामग्री जुटाने और उन्हें अधययन के दौरान लेखन और पाठ के जरिए मदद करने के साथ, उनके पाठयक्रम से संबंधित रिकार्डिंग और एसाइनमेंट को पूरा करने, वार्षिक परीक्षा में उनके लिए लेखन कार्य करने, उनके छात्रावासों में जाकर उनकी समस्याओं को जानने और उनके निदान की कोशिशों के अलावा उनकी सृजनात्मक क्षमता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नेत्रहीन छात्र-छात्राओं के लिए स्वरचित कविता-पाठ जैसी प्रतियोगिताओं के जरिए उन्हें पुरस्कृत और प्रोत्साहित करने का काम भी किया है। संस्था की परामर्शदात्री हंसराज महाविद्यालय की प्राधयापिका डा. रमा के कुशल एवं अनुभवी मार्गदर्शन में कार्य करने वाले इन छात्र-छात्राओं के समूह ने भविष्य  की योजनाओं को भी आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। बकौल 'नवांकुर' के वर्तमान अधयक्ष महेन्द्र प्रजापति, भविष्य में पाठयक्रम में शामिल पाठय-पुस्तकों के अलावा श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियों को भी रिकार्डिंग एवं ब्रेल माध्यम में उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर हम काम कर रहे हैं। इस संस्था ने जरूरतमंद नेत्रहीन छात्र-छात्राओं के लिए हंसराज कालेज में एक केन्द्र बना रखा है, जहां जरूरतमंद नेत्रहीन छात्र-छात्राएं उनसे संपर्क कर सकते हैं। नवांकुर जैसी संस्थाओं को उसकी कार्य पध्दति और भावनाओं को देखते हुए एक शाश्वत संकल्प के रूप में चिन्हित किया जा सकता है।

संपर्क% 5825/7, न्यू चंद्रावल, दिल्ली

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन