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जनजागरण |
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मैती : रस्म नहीं,
आंदोलन भी |
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गीता पंत |
आज के दौर में
'ग्लोबल वार्मिंग'
एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है और
इस गंभीर समस्या के भावी खतरों से पूरा विश्व खौफजदा
हो चला है। ऐसे में उत्ताराखण्ड के चमोली जनपद में
चल रहा आंदोलन एक बड़ी मिसाल कायम करता है। मैती जैसे
पर्यावरणीय आंदोलन कुछ लोगों के लिए सिर्फ रस्मभर
हैं जबकि इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में जाएं तो पता
चलता है कि यह एक ऐसा भावनात्मक पर्यावरणीय आंदोलन
है जिसे व्यापक प्रचार मिले तो पर्यावरण प्रदूषित ही
ना हो। मैती यानि शादी के अवसर पर वैदिक मंत्रेच्चार
के बीच दूल्हा-दुल्हन द्वारा फलदार पौधों
का रोपण। पर्यावरण के रक्षार्थ इस तरह के भावनात्मक
आंदोलन की शुरुआत हुई आज से करीब एक दशक पूर्व।
चमोली जनपद के राजकीय इंटर कालेज ग्वालदम के जीव
विज्ञान के प्राधयापक कल्याण सिंह रावत द्वारा मैती
आंदोलन की शुरुआत हुई जो
धीरे-धीरे
परम्परा का रूप
धारण
करती जा रही है। यह आंदोलन आज गढ़वाल में जन-जन तक
पहुंच चुका है। मैती का अर्थ होता है
'मायका'
यानि जहां
लड़की जन्म से लेकर शादी होने तक अपने माता-पिता के
साथ रहती है। और जब उसकी शादी होती है तो वह ससुराल
जाती है लेकिन अपनी यादों के पीछे वह गांव में बिताए
गए पलों के साथ ही शादी के मौके पर रोपित वृक्ष से
जुड़ी यादों को भी साथ लेकर जाती है। इसी भावनात्मक
आंदोलन के साथ शुरू हुआ पर्यावरण संरक्षण का यह
अभियान दिनों-दिन आगे बढ़ता जा रहा है। मैती आंदोलन
के साथ लोगों को जोड़ने का जो काम कल्याण सिंह रावत
ने किया अब वह परम्परा का रूप ले चुका है। अब जब भी
गढ़वाल के किसी गांव में किसी लड़की की शादी होती है
कम से कम चमोली जनपद में तो विदाई के समय मैती बहनों
द्वारा दूल्हा-दुल्हन को गांव के एक निश्चित स्थान
पर ले जाकर फलदार पौधा
दिया जाता है। वैदिक मंत्रें द्वारा
दूल्हा इस पौधो को रोपित करता है तथा दुल्हन इसे
पानी से सींचती है,
फिर ब्राह्मण द्वारा इस नव
दम्पत्ति को आशीर्वाद दिया जाता है। दूल्हा अपनी
इच्छा अनुसार मैती बहनों को पैसे भी देता है। आज
जनपद के कई गांवों में मैती संगठन मौजूद हैं। यह
गांव की बहनों का संगठन है। गांव की सबसे मुखर व
जागरूक लड़की मैती संगठन की अधयक्ष बनती है। जिसे
'दीदी'
के नाम से जाना जाता है। मैती
संगठन के बाकी सदस्यों को मैती बहन के नाम से फकारा
जाता है। शादी की रस्म के बाद दूल्हा-दुल्हन द्वारा
रोपे गए पौधों
की रक्षा यही मैती बहनें करती हैं। इस पौधों
को वह खाद, पानी देती हैं,
जानवरों से बचाती हैं। मैती
बहनों को जो पैसा दूल्हों के द्वारा इच्छानुसार
मिलता है,
उसे रखने के लिए मैती बहनों द्वारा
संयुक्त रूप से खाता खुलवाया जाता है। उसमें यह राशि
जमा होती है। खाते में अधिाक
धानराशि
जमा होने पर इसे गरीब बच्चों की पढ़ाई पर भी खर्च
किया जाता है। मैती के पीछे श्री रावत जी की यह सोच
थी कि सालभर में कई शादियां गांवों में होती हैं।
प्रत्येक शादी में अगर एक पेड़ लगे तो एक बड़ा जंगल बन
जाएगा,
जंगल से फल व ईंधान प्राप्त होगा,
घास पैदा होगी,
जो गांव के लोगों के बीच
नि:शुल्क बांटी जाएगी। साथ ही शुध्द वायु भी लोगों
को मिलेगी। पर्यावरण सुंदर होगा। अगर यहां के संदर्भ
में देखें तो यहां की अर्थव्यवस्था जल,
जंगल,
जमीन से जुड़ी हुई है। लेकिन आज प्राकृतिक संपदा खतरे
में है। ऐसे में मैती आन्दोलन वैश्विक होते हुए
पर्यावरणीय समस्या का एक कारगर उपाय हो सकता है।
बशर्ते इसके लाभों को व्यापक रूप से देखा जाए। आज
सरकार पर्यावरण संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च
कर रही है,
लेकिन समस्या दूर होने के बजाए बढ़ती
जा रही है। ऐसे में पर्यावरण को बचाने के लिए मैती
को एक सफल कोशिश कहा जा सकता है। (चरखा) |