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जनजागरण |
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लोक शक्ति अभियान की साधना |
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प्रदीप
सिंह |
आजादी
से साठ वर्ष के भीतर ही चुनावी
लोकतंत्र की पोल खुल गई। नीयति से किया गया वादा
मात्र छलावा बन कर रह गया। एक ओर जहां देश में
अवसरवादी ताकतों ने समाज को तहस-नहस किया है। वहीं
राजनीतिक पार्टियों ने देश की शानदार विरासत,
परंपराओं और पध्दतियों को
छिन्न-भिन्न कर दिया। अंग्रेजों
द्वारा स्थापित व्यवस्था देशी शासकों द्वारा पोषित
होती रही, जो जनता की
अपेक्षाओं पर न तो खरी उतरी और न ही भारतीय
परिप्रेक्ष्य के अनुसार ढल सकी। इसके परिणामस्वरूप
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय लोगों का
मोहभंग इस व्यवस्था से शुरू हुआ। अब एक नई व्यवस्था
की छटपटाहट शुरू हो गई है। राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे
राजनीति के अपराधीकरण,
सत्ता के सर्वोच्च प्रतिष्ठान की
आकंठ भ्रष्टाचार में संलिप्तता,
भोगवादी भूमंडलीकरण,
सत्ता का बढ़ता केंद्रीयकरण और
जातिवादी सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ देश के जाने-माने
बुध्दिजीवियों ने पहल की है। लोकशक्ति अभियान नाम की
यह संगठन देश के कई भागों में सक्रिय है। यह संगठन
देश के युवाओं को सेवा,
समर्पण और
सामाजिक-राजनीतिक मूल्यों के प्रति प्रतिबध्द होकर
राजनीति करने का पाठ पढ़ा रहा है।
लोकशक्ति अभियान के मुख्य आवाहक
प्रो. आनंद कुमार कहते हैं कि अत्यंत खतरनाक तथ्य यह
है कि चुनावी लोकतंत्र की आड़ में प्राय: सभी
राजनीतिक
धाराएं
धनबल,
बाहुबल के दो पाटों में फंस गई
हैं। मुम्बई, निठारी से
लेकर कलिंग नगर और नंदीग्राम तक जनसाधारण
की अपेक्षाओं और की अवहेलना का सच सामने है। पश्चिम
बंगाल के नंदीग्राम में सत्ताारूढ़ भाकपा और अन्य
दलों की राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई ने सैकड़ों
लोगों को बेघर कर दिया। लोगों की हत्याएं हुईं।
महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। दुखद बात यह है
कि जनता की सरकार बनने का दावा करने वालों ने यह सब
नंगा नाच किया। दूसरी तरफ नर्मदा बचाओ आंदोलन और
नक्सलवादी आंदोलन भी दिख रहा है। जनसाधारण
का यह संघर्ष चुनावी राजनीति के आगे का रास्ता खोजना
जरूरी समझ रहा है।
इसके लिए रचनात्मक कार्य,
जनांदोलन और जनता को मिले वोट का समन्वय नए दौर की
जरूरत है। आज देश में सैकड़ों
ईमानदार और सज्जन शक्तियां जनविरोधी
ताकतों से अपने स्तर पर दो-दो हाथ कर रही हैं। इन
ताकतों
के समन्वय और नए पथ में संघर्ष के लिए पिछले दिनों
दिल्ली के गांधी-शांति
प्रतिष्ठान में लोक शक्ति जन अभियान ने एक राष्ट्रीय
संवाद का आयोजन किया था। सामाजिक सम्स्याओं
का समाधान
और बेहतर राजनीतिक विकल्प के इस संवाद का उद्धाटन जन
आंदोलनों की प्रतीक बन चुकी मेधा
पाटेकर ने किया। सम्मेलन में कई
जनसंगठनों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ बुध्दिजीवियों
ने भी भागीदारी की। वक्ताओं के तीखे तेवर और आक्रोश
को देखकर वर्तमान व्यवस्था से मोहभंग का अंदाजा सहज
ही लग रहा था।
भारत के जनसंगठनों के प्रतिनिधियों
के साथ बर्मा,
नेपाल,
तिब्बत,
भूटान के लोकतांत्रिक आंदोलनों
में प्रमुख भूमिका निभाने वाले अतिथि भी इस संवाद
में मौजूद थे। बेहतर राजनीतिक विकल्प और आंदोलनों के
समन्वयन के लिए बने संयोजक मंडल में आनंद कुमार,
मुकुट सिंह,
सुरेन्द्र कुमार,
र्फुल्ल,
सामंत राय और सोमैया सक्रिय थे।
राजनिति में बढ़ रही धनशक्ति,
सांप्रदायिकता और राजनीतिक दलों
के बिगड़ते स्वरूप तथा इन दलों के राजनीतिक
कार्यकर्ताओं की अंधी
आस्था ने राजनीति को जनता से दूर करके सत्ता की तरफ
मोड़ दिया है। राजनेता जनहित की बजाए स्वहित को
प्रमुखता दे रहे हैं। वर्तमान समय में एक दर्जन
राज्यों के मुख्यमंत्रियों के ऊपर आय से अधिक
संपत्ति रखने की जांच चल रही है। अपराधी
पहले मुश्किल से पंचायत चुनाव भी जीत पाते थे,
लेकिन अब देश की कैबिनेट में
दुर्दांत लोग शामिल हैं। आजादी के साठ वर्ष बाद की
राष्ट्रीय दशा और राजनीतिक तस्वीर बहुत आशाजनक नहीं
है। अंग्रेजों और जमींदारों से छीनी गई सत्ता समाज
सेवकों के हाथ से निकलकर नव सामंती तत्वों के हाथ
में चली गई है। इन नए शासकों के लिए समाज की
बुनियादी समस्याएं कोई महत्व नहीं रखती हैं।
उदारीकरण की आड़ में देश पर बढ़ता विदेशी कर्ज व देश
के अंदर कमजोर होती राष्ट्रीय एकता की इनको कोई
चिंता नहीं है। विदेशी कंपनियों के हित में जनहित को
तिरोहित किया जा रहा है। संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं
और जनता को दमनकारी कानूनों की आड़ में जेल में डाल
देना आम बात हो गई है। निहत्थी और निरीह जनता के
आंदोलन को कानून और व्यवस्था के लिए खतरा बताकर
निर्ममता से गोली चलाकर कुचल देना कानून की रक्षा
करना हो गया है। लोकशक्ति अभियान,
शासक वर्ग के इस चरित्र के खिलाफ
संघर्ष कर रहा है। देश में कई भागों में इसके
निष्ठावान कार्यकर्ता अपने जीवन का होम कर रहे हैं।
उड़ीसा में लोकशक्ति अभियान का जहां सुखद परिणाम
सामने आ रहा है वहीं इसे प्रशासनिक दमन का सामना भी
करना पड़ रहा है। लोकशक्ति अभियान का मानना है कि
1996
से शुरु हुई राजनीति की नकारात्मक
प्रवृत्तियों के फलस्वरूप आम जनमानस में गंभीर
असंतोष पैदा हुआ है। एक तरफ सरकारी गोदामों में अनाज
सड़ रहा है और दूसरी तरफ देश के कई भागों में भूख से
मौतें हो रही हैं। इस सारी समस्या की जड़ हमारी
राजनीति है। इसके लिए राजनीति को राष्ट्रीय आंदोलन
के मूल्यों और जेपी के लक्ष्यों से फिर से जोड़ा जाए।
समाज में राजनीतिक कार्यकर्ताओं को राजनीति का सही
अर्थ स्पष्ट किया जाना चाहिए।
लोक शक्ति अभियान का मानना है कि
चुनावी लोकतंत्र की खामियां और शासकवर्ग का जनविरोधी
चरित्र अब बेनकाब होकर जनता के सामने आ गया है। देश
के अंदर हजारों जनांदोलन बेहतर भविष्य का सपना संजोए
संघर्ष कर रहे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि इन
सबका आपस में समन्वय किया जाए। राष्ट्र निर्माण के
संदर्भ में आगामी
2009
का आम चुनाव शुभ और अशुभ शक्तियों
का महाभारत बनेगा। इसलिए लोक शक्ति अभियान का आह्नान
है कि अभी से 2009 के आम
चुनाव के बीच देश के सभी लोकसभा और विधानसभा
निर्वाचन क्षेत्रें में लोकशक्ति में आस्था रखने
वाले व्यक्तियों,
संगठनों,
आंदोलनों को राजनीति और
अपराधियों के गठजोड़ करने वाली जमातों का खुला
मुकाबला करना होगा। इसके लिए लोकशक्ति अभियान ने
विभिन्न क्षेत्रें में सक्रिय हस्तक्षेप शुरू कर
दिया है। 2009 का चुनाव
राजनीति के अपराधीकरण
के खिलाफ जनमत संग्रह होगा।
ईमेल:pradeep.pratap@gmail.com |