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सहकार |
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कोयलांचल में चलता चेतना अभियान |
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भारतीय पक्ष ब्यूरो |
झारखंड
के
धनबाद जिले के एक प्रखंड गोविंदपुर में गांव है
सहराज। प्रखंड वेंफद्र से मात्र
20 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव
की स्थिति देखकर यह विश्वास करना कठिन हो सकता है कि
यहां से मात्र 28
किलोमीटर की दूरी पर झारखंड के समृध्दतम शहरों में
से एक धनबाद शहर है। शहर से इतना निकट होने पर भी
पिछड़ेपन में देश के सुदूर इलाकों की श्रेणी में खड़े
इस क्षेत्र में न केवल विकास के आधुनिक साधनों का ही
अभाव है,
बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी
आवश्यक सुविधाएं भी नहीं हैं। यह देखकर धनबाद के कुछ
भावप्रवण और दृढ़प्रतिज्ञ नवयुवकों ने एक संकल्प किया
और इस पूरे क्षेत्र में नवनिर्माण हेतु चेतना अभियान
प्रारंभ किया गया। फलस्वरूप शीघ्र ही सहराज में एक
आवासीय विद्यालय के रूप में शिक्षा का एक दीपक जलने
लगा।
दिगंत परिवार द्वारा चलाए जा रहे इस
चेतना अभियान की कहानी
9
नवंबर, 1983
से शुरू होती है जब श्री
शैलेंद्र ने नवनिर्माण का एक आंदोलन खड़ा करने के
उद्देश्य से दिगंत पथ नामक पत्रिका का प्रकाशन
प्रारंभ किया। पत्रिका के पाठकों का परिवार बढ़ता गया
और वही
धीरे-धीरे
दिगंत परिवार बन गया। पत्रिका के माध्यम से दिगंत
परिवार से जुड़े कुछ युवकों ने इस इलाके के गांवों
में जनजागरण करने का निश्चय किया। पांच जनवरी,
1986 को टुंडी प्रखंड के एक गांव
नटवारी से काम प्रारंभ किया गया। झारखंड का यह
क्षेत्र उस समय आदिवादी-दिवूफ,
बाहरी-भीतरी,
ग्रामीण-शहरी जैसे भेदभावों से
विषाक्त हो रहा था। फिर भी दिगंत परिवार के युवकों
को देखकर स्थानीय जनजातीय लोगों को इनकी भावनाओं की
अनुभूति हुई और 26 जनवरी,
1986 को नटवारी में पहला चेतना
स्थल प्रारंभ किया गया। चेतना स्थल अर्थात एक स्थान
जहां प्रतिदिन शाम को लोग एकत्र होते। वहां चेतना
दीप जलाया जाता था और रघुपति राघव राजा राम का
सामूहिक गायन होता। इसके पश्चात् विभिन्न विषयों पर
चर्चा की जाती। किसानों की समस्या और शिक्षा
स्वास्थ्य आदि की स्थिति से लेकर विकास कार्यक्रमों,
प्रखंड विकास कार्यालय में फैले
भ्रष्टाचार, अंधविश्वास,
कुरीतियों और नारी शोषण जैसे
गंभीर विषय तक इस चर्चा में शामिल होते थे।
धीरे-धीरे चेतना स्थल पर पुस्तकालय भी बनाया गया।
ग्रामीणों ने चेतना स्थल हेतु भवन निर्माण के लिए
जमीन दान में दी। कुछ शहरी क्षेत्र के लोगों के
सहयोग से और कुछ ग्रामीणों के श्रमदान से वहां एक
छोटा-सा भवन तैयार हो गया। नटवारी में चल रहे इन
कार्यों का समाचार आस-पास के गांवों में फैल रहा था
और वहां भी चेतना स्थल बनाए जाने की सुगबुगाहट
प्रारंभ हो रही थी। परिणामस्वरूप केवल दो वर्षों में
ही कल्याणपुर, कदैया,
रोतरा,
बरवारांड,
चैनपुर,
महाराजगंज आदि 25-30
गांवों
में चेतनास्थल बन गए।
क्षेत्र में विकास के लिए दिगंत
परिवार ने तीन आयाम निश्चित किए। पहला आर्थिक,
दूसरा
शिक्षा और तीसरा सांस्वृफतिक। इन तीनों के लिए
प्रयत्न प्रारंभ किए गए। आर्थिक विकास के लिए बंजर
टांड मुक्ति आंदोलन प्रारंभ किया गया। पठारी इलाका
होने के कारण यहां की जमीन उफंची-नीची है। उंफची
भूमि पर पानी नहीं रफकने के कारण प्राय: ऐसी भूमि पर
खेती नहीं की जाती। ऐसी भूमि को ही स्थानीय भाषा में
टांड कहा जाता है। दिगंत परिवार ने टांड भूमि को
खेती योग्य बनाने और उस पर खेती करने के लिए लोगों
को प्रोत्साहित करना प्रारंभ किया। इसके लिए नटवारी
आदि गांवों में कई सफल प्रयोग भी किए गए।
विकास के दूसरे आयाम शिक्षा का इस
पूरे क्षेत्र मे घोर अभाव था। गोविंदपुर प्रखंड के
सहराज गांव के मुखिया स्वर्गीय लखीकांत हेम्ब्रम ने
इस क्षेत्र में एक आवासीय विद्यालय खोलने का सुझाव
दिया। सुझाव के साथ-साथ उन्होंने लगभग तीन एकड़ भूमि
भी दी। दिगंत परिवार का उत्साह बढ़ा। इस सिलसिले में
23 मार्च,
1995 को एक बड़ी बैठक की गई
जिसमें आस-पास के कई गांव सम्मिलित हुए। इस ज्ञान
यज्ञ में सहयोग के लिए सभी का आ''वान
किया गया। ग्रामीणों ने पूर्ण सहयोग भी दिया। बीस
दिनों में ही पांच कमरों का एक भवन बनकर तैयार हो
गया। इस भवन की ईंटें भी ग्रामीणों ने ही बनाई थीं।
इस प्रकार स्थानीय लोगो की सहायता और श्रमदान से
चेतना महाविद्यालय नामक आवासीय विद्यालय प्रारंभ हो
गया। 11 बच्चों को लेकर
शुरू किए गए इस आवासीय विद्यालय में इस समय लगभग
150 बच्चे रहते हैं।
आस-पास के गांवों से लगभग 250
बच्चे पढ़ने आते हैं। छात्रावास
का शुल्क हालांकि नाममात्र का ही है,
परंतु जिन बच्चों के परिवारों की
आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती,
उन्हें नि:शुल्क ही रखा जाता है।
विद्यालय के प्रधनाचार्य श्री हेनोलाल हेम्ब्रम ने
बताया कि विद्यालय का कभी प्रचार नहीं किया गया,
परंतु दूर-दूर से लोग यहां अपने
बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए आते हैं। विद्यालय
में बच्चों के सर्वांगीण विकास की चिंता की जाती है।
पाठयक्रम की शिक्षा के अतरिक्त उन्हें स्वावलंबन
हेतु प्रशिक्षण भी दिया जाता है। नैतिक और शारीरिक
शिक्षा के साथ-साथ बच्चों में सांस्वृफतिक अभिरुचि
बनाए रखने के भी प्रयास किए जाते हैं। विद्यालय में
संथाल बच्चों की बहुलता के कारण संथाल संस्वृफति के
संरक्षण का यहां विशेष प्रयत्न किया जाता है। इन सब
आर्थिक-शैक्षिक प्रयत्नों के साथ-साथ जन-जागरण के
लिए दिगंत परिवार द्वारा समय-समय पर संगोष्ठियां भी
आयोजित की जाती हैं। इस प्रकार चेतना स्थल,
चेतना महाविद्यालय,
आंदोलनों,
प्रशिक्षणों और
संगोष्ठियों के माधयम से दिगंत परिवार कोयलांचल की
धरती पर नवनिर्माण का एक व्यापक कार्य खड़ा करने में
जुटा है। |