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जनसेवा |
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कुष्ठ सेवा को समर्पित जीवन |
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संजीव कौरा |
कार्य]
अच्छा,
बुरा,
सफल, असफल सभी किस्म के
हो सकते हैं। लेकिन दान हमेशा अच्छा ही होता है। क्योंकि
दान त्याग व बलिदान के वाहक सुपात्र और जरूरतमंद को
दिया जाता है। हालांकि,
कुछ धूर्त जनों से 'दान'
के भी दुरुपयोग की संभावना बनी
रहती है। लेकिन इस प्रवृत्ति को सच्चे दानदाता के
सिर पर नहीं थोपा जा सकता। महारोग कुष्ठ जैसी विपदा
के बीच जाकर अगर कोई अव्यवसायी चिकित्सक अपनी जान की
परवाह किए बिना ईमानदारी से उपचार कर लोगों को
पुनर्जीवन देता है, तो
इससे बड़ा दान और क्या होगा। कुष्ठ रोगियों के बीच
जाकर काम करना तो आज भी अपने में बड़ा काम है। बाबा
आप्टे ने अपना पूरा जीवन इस काम के लिए दिया। पर कई
और भी हैं जिन्हें दुनिया शायद नहीं जानती है। ऐसे
लोगों में से ही एक हैं अरविंद शुक्ल। उन्हें देखने
से मालूम नहीं पड़ता कि यह व्यक्ति कुष्ठ रोगियों
की सेवा में अपना जीवन दे चुका है। अधयापक पिता के
पुत्र अरविन्द मधय प्रदेश के रीवा शहर के निवासी
हैं। घर देखने से कबीर की पंक्ति 'मन
लागो मेरो यार फकीरी में'
याद आ जाती है। 21 नवम्बर
1984 को एक पेड़ के नीचे,
रहीम खान नाम के कुष्ठ रोगी की
सेवा से आरंभ किया गया कार्य आज काफी बड़ा रूप ले
चुका है। उनका काम आज रीवा शहर से मात्र 27
किलोमीटर दूर गड्डी स्थित
'पीड़ित मानव सेवा संस्थान,
कुष्ठ सेवा आश्रम'
के नाम से विख्यात है। पहले इस
जगह के लिए कोई रास्ता नहीं था। किन्तु अरविन्द
शुक्ल की मेहनत, ईमानदारी
और जनसेवा से प्रभावित होकर प्रशासन ने न केवल वहां
तक सड़क बना दी वरना
पानी का भी इंतजाम किया।
देश के
40 लाख कुष्ठ रोगियों में से मध्यप्रदेश
के दो लाख रोगी हैं। विंधय पर्वतमाला में बसे इस
आश्रम की पहुंच लगभग 5
हजार रोगियों
तक है। आश्रम में एक तालाब का निर्माण और उसके पास
औषधिा वाले वृक्षों को रोपा गया है। प्रशासन से
62 एकड़ जमीन काफी
जद्दोजहद से मिली है। साधय के लिए साधन शुध्दि का
आदर्श अरविंद शुक्ल ने अपने सामने रखा। वे अकेले
नहीं हैं, इसका एक उदाहरण
उनकी रीवा से राजघाट की पदयात्रा है। भारत डंकल
प्रस्ताव में शामिल न हो,
इसके खातिर जनजागरण के लिए वे निकल पड़े थे। वे बगैर
किसी तामझाम और प्रचार के अपने दस-बारह साथियों के
साथ उपवास करते हुए दिल्ली पहुंच गए और राजघाट पर
उपवास को चालू रखा। वहां उन्हें देश के प्रतिष्ठित
सामाजिक कार्यकर्ता सुन्दरलाल बहुगुणा और मेधा
पाटकर आदि मिले और उनका उपवास
तुड़वाया।
अरविंद शुक्ल समझ गए थे कि देश अभी
तैयार नहीं,
किन्तु हथियार भी तो नहीं डाले
जा सकते थे। उन्होंने अपने रोगियों
के लिए आयुर्वेद से ही ईलाज करने के निश्चय को जारी
रखा। जाहिर है,
ये काम अपने आप में बहुत कठिन है।
उनके आश्रम में देशी जड़ी बूटियों को खोजकर खरीदा
जाता है और उनसे दवाएं भी बनाई जाती है। दवा तैयार
करने के लिए खास पध्दति अपनाई जाती है। कुष्ठ
रोगियों पर मालिश आदि का भी प्रयोग किया जाता है।
एक प्रश्न यह भी हो सकता है कि क्यों
नहीं उपलब्धा एलोपैथी की दवा देकर काम चलाया जाए?
मगर मामला सिर्फ दवा देने का
नहीं बल्कि दवा के दूसरे प्रभाव का भी है। उन्हें जो
भी छोटे-मोटे पुरस्कार मिले,
सब आश्रम के काम में दे दिए। धन
जुटाने में एक मजेदार घटना हुई। देश के एक बड़े क्लब
के सदस्य ने उन्हें अपने शहर में आमंत्रित किया और
उनके लिए विशेष रूप से एक पार्टी का आयोजन किया गया,
जिसमें खूब महंगी शराब भी थी।
इसके बाद अरविंद भाई को बोलने के लिए आमंत्रित किया
गया। वे असहज हुए पर फिर भी बोले। बाद में उन्हें
पांच सौ रुपए उनके काम के लिए भेंट में मिले। सबने
अलग अलग फोटो भी खिंचवाई
और न्योता दिया कि यदि वे उनके यहां भी पार्टी में
आएं तो स्वागत होगा और 'दक्षिणा'
में पांच सौ रुपए भी मिलेंगे।
मृदुल मुस्कान के साथ वे ये किस्सा बताते हैं।
किन्तु ऐसे लोगों को भी उन्होंने प्रणाम किया और
समाज में तमाम अच्छे लोग खोजे,
जो अपनी तनख्वाह
में से कुछ रुपए प्रतिमाह भेजते हैं। आश्रम को तो
ऐसे दानी भी मिले हैं जिन्होंने वहां कुंआ तक खुदवा
दिया और नाम पट्ट भी नहीं लगवाया।
कभी चन्द्रशेखर की
भारत यात्रा में एक महीना पद यात्री रहे अरविंद
शुक्ल अभी भी अभावों में रहकर कुष्ठ रोगियों की सेवा
में जुटे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि समाज और
जनकल्याण में जुटे ऐसे लोगों को व्यापक सहयोग मिले
ताकि दुखियारे लोगों को अधिक से अधिक राहत मिले।
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