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धर्मसत्ता |
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कुल जमा साढ़े तीन शब्दों का रहस्य |
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संजय तिवारी |
तपस्या
कुल जमा साढ़े तीन शब्दों का योग है,
लेकिन यही
साढ़े तीन शब्द जब साढ़े तीन हाथ के शरीर के साथ संयोग
करते हैं तो परिणाम क्रांतिकारी होते हैं। समय-समय
पर कुछ पवित्र आत्माएं हमारे बीच आती हैं और तपस्या
को युगानुकुल संदर्भों में परिभाषित कर जाती हैं। वे
अपना जीवन होम करते हैं और उस होम से जो हव्य
प्राप्त होता है उससे पूरा समाज अमरत्व प्राप्त करता
है।
स्वामी सत्यानंद सरस्वती भी उन्ही
कुछ श्रेष्ठ आत्माओं में हैं जो इस युग में हमारे
मधय आईं। श्रध्दा की परिपाटी का निर्वहन करने के लिए
उनके शिष्य उन्हें परमहंस का संबोधान
देते हैं लेकिन वे उपाधिायों और संबोधानों
से ऊपर की चेतना जान पड़ते हैं जो स्वयं अपने बारे
में कहते हैं-
''जब तुम
सत्यानंद की बात करते हो तो यह मत समझना कि यह शरीर
सत्यानंद है। यह शरीर आज है कल नहीं रहेगा। लेकिन
सत्यानंद हमेशा रहेगा,
जहां-जहां लोग अभावग्रस्त हैं धयान से देखना तुम्हें
वहां सत्यानंद दिखाई देगा। उन गरीबों के बारे में
सोचना, उनकी सेवा करना,
सत्यानंद को सेवा मिल जाएगी।''
बीसवीं सदी योग पर गहन अनुसंधान
और विस्तार की सदी थी। इसकी शुरूआत विवेकानंद से
होती है। बाद में परमहंस योगानंद ने इस कार्य को
बहुत तार्किक विस्तार दिया। लेकिन यह वो दौर था जब
योग और धयान को मोक्ष मार्ग और पूरब के रहस्यवाद से
जोड़कर देखा गया। अचानक ही थियोसाफिकल सोसायटी के उदय
ने पश्चिम में पूरब के रहस्यवाद और फनर्जन्म के
प्रति गहरा आकर्षण पैदा कर दिया था,
ज्यादा से ज्यादा लोग पूरब की इस
अछूती विद्या के बारे में जानना चाहते थे। पाल
ब्रंटन जैसे लेखकों ने भी इस आकर्षण को विस्तार
दिया। लेकिन अगला दौर जो शुरू हुआ वह योग को चमत्कार
से आगे ले जाकर इसके वैज्ञानिक प्रयोग को लोगों के
सामने रखनेवाला था,
मुख्य रूप से
इसमें दो लोगों का नाम प्रमुखता से आता है। स्वामी
सत्यानंद सरस्वती और स्वामी राम। साठ से लेकर अस्सी
के दशक के मधय इन दो योगियों ने योग को पश्चिम की
प्रयोगशालाओं में परखा। यूरोप और अमेरिका की आधाुनिक
वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में असंभव सी दिखनेवाली
शारीरिक क्षमताओं को वहां के लोगों के सामने रखा और
यह साबित कर दिखाया कि योग से कुछ भी संभव है।
खुद स्वामी सत्यानंद कोई योगाभ्यासी
नही थे। वे वेदान्त के विद्यार्थी थे,
1956 में उनके गुरु स्वामी
शिवानंद सरस्वती ने उनसे कहा कि ''सत्यानंद
जाओ और दुनिया को योग सिखाओ,''
गुरू के इस आदेश के बाद वेदान्त
का एक विद्यार्थी दुनिया को आसन-प्राणायाम सिखाने
निकल पड़ता है। जब वे आश्रम से निकले तो उनके तन के
वस्त्र के अलावा उनके पास कुछ नहीं था। सात साल तक
दर-दर भटकने के बाद न तो उन्हें कोई ऐसा मिला जो यह
कहे कि स्वामी जी मुझे योग सिखा दीजिए,
न ही कोई ऐसा मिला जो यह कहता कि
आईये मैं आपका एक शिविर लगवा देता हूं। छिट-फट लोग
मिले भी तो चर्चाएं ही होती रहीं,
लेकिन सात साल बाद त्रयंबकेश्वर
में अपने ईष्टदेव से की गयी प्रार्थना फलित हुई,
उन्होंने अपने इष्ट से आशीर्वाद
मांगा-प्रभु मुझे बीस साल दे दो ताकि मैं अपने गुरु
से किया प्रण निभा सकूं। यहीं से सत्यानंद के जीवन
में ऐसा मोड़ आता है कि वे योग के शीर्ष फरुषों में
शामिल हो जाते हैं। बिहार के मुंगेर में उन्हें
प्रेरणा मिली थी कि योग का कोई व्यवस्थित शिक्षण
संस्थान होना चाहिए। इसलिए 1963
में उन्होंने
मुंगेर में ही बिहार स्कूल आफ योग की स्थापना की। अब
सीखनेवाले लोग भी आने लगे और सिखाने के लिए बुलावा
भी मिलने लगा।
अगले बीस सालों तक सत्यानंद ने तूफान
की भांति पूरी दुनिया में योग को लोगों के बीच
पहुंचाया। इसी दौर में उन्होंने दुनिया के
48 देशों की सघन
यात्रएं कीं। अमरीका के बाहर यूरोप,
आस्ट्रेलिया,
न्यूजीलैण्ड,
ग्रीस,
कुवैत,
ईरान,
ईराक से लेकर
नैरोबी और घाना जैसे देशों में योग की आधाारशिला
रखी। फ्रांस,
इटली,
जर्मनी और आस्ट्रेलिया में तो सत्यानंद योग के
पर्याय ही हो गये। स्वामी सत्यानंद एक प्रवचन में
बताते हैं ''मैं यहां से
जर्मनी जाता,
छोटे-छोटे विज्ञापन देता अखबारों में
और लोग योग सीखनेवाले मिल जाते। इनसे जो
धान
एकत्र होता था उसे लेकर मैं अमरीका चला जाता,
वहां की प्रयोगशालाओं को किराए
पर लेता और प्रमाण के तौर पर परीक्षण कराता। फिर
वहां अखबारों, रेडियो आदि
में इसकी खूब चर्चा होती। और बाहर का कमाया पैसा
बाहर ही खर्च करके मैं वापस लौट आता।''
स्वामी
सत्यानंद के इस प्रयास का परिणाम यह हुआ कि पश्चिम
में योग के प्रति लोगों में रुचि बढ़ने लगी। अब ऐसे
लोग भारत आते तो योग के बारे में और जानने की कोशिश
करते। इस तरह
धीरे-धीरे
भारतीय आश्रमों में योग-भिक्षुओं की संख्या बढ़ने
लगी।
इसी दौर में बिहार स्कूल आफ योग ने
योग पर सैकड़ों फस्तकों का प्रकाशन किया जो शरीर के
भारतीय विज्ञान और दर्शन पर अमूल्य
धारोहर
हैं. बिहार स्कूल आफ योग की फस्तकें कालजयी हैं।
हठयोग में पहली बार ऐसे-ऐसे आसन समूहों को जोड़ा गया
जो वर्तमान में प्रभावी रोगों का त्वरित इलाज करते
हैं। ये आसन शुध्दरूप से स्वामी सत्यानंद के
वैज्ञानिक प्रयोगों और उस अलौकिक शक्ति की देन थे
जिसके बारे में सत्यानंद सरस्वती कहते हैं कि
करनेवाला तो कोई और था,
मेरा शरीर तो सिर्फ माधयम बना।
आज स्वामी रामदेव से लेकर हजारों योग शिक्षक उन
प्रारंभिक आसनों का अभ्यास सिखाते हैं जिसका
आविष्कार बिहार स्कूल आफ योग और स्वामी सत्यानंद के
प्रयास से हुआ। स्वामी सत्यानंद ने 20
वर्षों तक यही सब
किया।
लेकिन यह उनके जीवन का एक हिस्सा है।
1983 में उनके
साथ ऐसी घटना घटी जहां से उनका जीवन फिर एक नयी दिशा
में बह चला। 1983 में वे
आस्ट्रेलिया में थे जहां भयानक रूप से
दुर्घटनाग्रस्त हो गये। उनका जीवन तो बच गया लेकिन
लंबे समय तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा,
थोड़ा स्वास्थ्य सुधारा तो
डाक्टरों ने देश वापसी की छुट्टी तो दी,
लेकिन कहा कि कुछ दिनों तक आपको
अस्पताल में ही रहना होगा। तय हुआ कि उन्हें बंबई के
किसी अस्पताल में रखा जाएगा। जैसे ही वे बंबई पहुंचे
उनको वह याद आ गया जो योग प्रचार और प्रसिध्दि में
भूल गया था। उन्हें याद आया कि भगवान भोलेनाथ से
मांगे गये 20 साल पूरे हो
चुके थे। यह दुर्घटना शायद इसी बात का संकेत थी कि
अब वह आत्मा वापस जा रही है। अब वह धवज-पताका रखने
का समय आ गया था जिसे उठाये 20
सालों तक सत्यानंद ने दुनिया में
योग का दिग्विजयी अभियान चलाया। यहीं से स्वामी
सत्यानंद के जीवन में छह साल का संक्रमण काल आता है।
इस संक्रमण काल में ही स्वामी सत्यानंद का अंत हो
जाता है और नये स्वरूप में हमारे समाज को जो
संन्यासी मिलता है वह स्वामी सत्यानंद नही,
परमहंस
सत्यानंद है।
एक बार फिर कंधाो पर आधी
धाोती डाले यह योग प्रचारक बिहार
स्कूल आफ योग के अहाते को छोड़ संसार सागर में फन:
गोता लगा देता है। दुनिया को हवाई जहाज से नापने
वाला यह संन्यासी कभी काशी के भिखारियों के बीच रहता
तो कभी त्रयंबकेश्वर में साधाुओं की चीलम भरता। जो
कुछ खड़ा किया वह पीछे छोड़ आये। दुनिया जिस सत्यानंद
को योग के धाुरंधार के रूप में जानती थी उससे जुड़ी
कोई भी पहचान स्वामी सत्यानंद के साथ नहीं थी। एक
बार फिर उनके इष्ट ही उनको रास्ता बताते हैं। जैसा
कि स्वामी सत्यानंद कहते हैं
''उनको जो शब्द
सुनाई दिया वह था चिताभूमौ। मैंने पता किया तो पता
चला कि चिताभूमौ रिखिया को कहते हैं जो देवघर के पास
है। यहीं पर मां सीता ने समाधिा ली थी।''
चिताभूमौ पहुंचकर उन्होंने उन
सबसे मुक्त होने की तपस्या शुरू की जो 20
सालों में उनके नाम के साथ जुड़
गया था। उन्होंने पंचाग्नि साधाना शुरू की,
खुद स्वामी सत्यानंद कहते हैं कि
हम जो भी कर्म करते हैं उसका यश निर्माण होता है। यह
हमें कर्मबंधानों से बांधाता है,
बिना इससे मुक्त हुए ईश्वर से
मिलन संभव नही।''
पांच वर्षों की तपस्या के बाद स्वामी
सत्यानंद को ईश्वर वहीं मिल गया जहां वे तपस्या करने
बैठे थे। वे कहते हैं,
''तुम लोग वसुधौव कुटुंबकम् की
बात करते हो, मेरी समझ
में नहीं आता। मैं तो एक रिखिया पंचायत की भी ठीक से
चिंता नहीं कर पा रहा हूं और तुम लोग विश्व बंधुत्व
बनाने में लगे हो।''
रिखिया पंचायत के लोग ही अब उनके ईश्वर स्वरूप हैं,
अब उनके उत्थान के बारे में
सोचना यही सत्यानंद की 'इच्छा'
है। अपनी दुनियाभर की यात्रओं
में उन्होंने एक बात अनुभव कर लिया था कि गरीब आदमी
की बात करने वाला अब कोई नहीं होगा,
न सरकारें और न ही वे कंपनियां
जो नयी सामाजिक व्यवस्था गढ़ने में लगी हुई हैं।
पूंजी का केन्द्रीकरण और संसाधानों पर पैसेवालों
द्वारा कब्जे की बढ़ती मानसिकता के कारण गरीब के लिए
बचे-खुचे रास्ते भी बंद हो जाएंगे,
इसलिए पांच वर्षों की पंचाग्नि
साधाना के बाद उन्होंने राजसूय यज्ञ की शुरुआत की।
यह यज्ञ बारह वर्षों तक चलेगा और हर साल दिसंबर में
सीता कल्याणम महोत्सव का आयोजन किया जाता है। आखिर
अब स्वामी सत्यानंद क्या पाना चाहते हैं?
स्वामी सत्यानंद कहते हैं पहली
बार अब मुझे चिंता होने लगी है,
अभी तक जीवन में जो कुछ किया
समें कभी चिंता नहीं की,
सफलता-असफलता जो भी मिली हो,
कभी चिंतित नहीं हुआ। लेकिन अब
होती है, अब रिखिया
पंचायत के बारे में ही दिन-रात सोचता रहता हूं कि
किसे इस साल रिक्शा देना है,
किसके घर की छत ठीक करवानी है,
सीता कल्याणम के लिए सौभाग्य
मंजूषा का वितरण कैसे होगा?
स्वामी सत्यानंद अब पालक की
भूमिका में हैं, वे उस
इलाके के पितृफरुष हो गये हैं,
जो हमारे नक्शे पर एक उपेक्षित
और पिछड़ा हुआ निशान है। वे उस संन्यास में प्रवेश कर
गये हैं जो सेवा लेता नहीं सेवा देता है। वह समाज
में आश्रय नहीं खोजता,
वह समाज को आश्रय
देता है।
यह अपने आप में एक अलग विषय है कि
कैसे उन्होंने स्थानीय संसाधानों,
कौशल और तकनीक की मदद से पूरे
समाज में नयी लहर पैदा कर दी है। मसलन सस्ते घर
बनाने के अपने प्रयास में वे 40-50
हजार रुपये में
स्थानीय संसाधनों की मदद से घर बनवा देते हैं। इस
काम में दुनियाभर में पैफले उनके वे शिष्य मदद करते
हैं जो इंजिनीयरिंग के जानकार हैं। सत्यानंद अब
रोजी-रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं। यही वह कार्य
है जो एक स्वामी को परमहंस बना देता है। श्रेष्ठ को
परमपद पर आसीन कर देता है। जब हम यह प्रक्रिया
समझेंगे तब शायद वे साढ़े तीन शब्द समझ में आने लगें
जिसे तपस्या कहते हैं।
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sanjaytiwari07@gmail.com |