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खेती-किसानी |
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किसान अधिकारों के लिए संघर्ष |
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आशीष
कुमार
'अंशु'
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डा.
सुमन
सहाय एक महिला वैज्ञानिक हैं। अपने जीवन का एक लंबा
हिस्सा उन्होंने देश के बाहर सात समन्दर पार कनाडा,
संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी
में बिताया। उनके पास अलबर्टा विश्वविद्यालय
;कनाडाध्द,
शिकागो (अमेरिका) और हिंडेलबर्ग
(जर्मनी) में कई वर्षों के शोध और अध्यापन
का अनुभव है। बस एक छोटी सी घटना की वजह से
हिंडेलबर्ग में छात्रें को पढ़ाने का काम छोड़कर डा.
सहाय भारत आ गईं। सच कहा जाए तो अपने देश के लिए
सच्चा प्रेम ही उन्हें यहां खींच लाया। वरना वह
क्यों अपनी जमी-जमाई नौकरी और चैन की जिन्दगी को
छोड़कर गांवों की खाक छानने और किसानों को जागरूक
करने के लिए भारत आतीं। वह बताती हैं- ''बात
90 के दशक के आसपास की
है। उन दिनों पेटेन्ट काफी चर्चा में था। यह एक ऐसा
कानून था जिसे पश्चिमी देशों द्वारा बड़ी चालाकी के
साथ पूरे देश पर थोपा जा रहा था।''
वह
आगे कहती हैं-
''जब
मैंने संयुक्त राष्ट्र के एक सम्मेलन में पेटेन्ट की
खामियों और विकासशील,
पिछड़े देशों को इससे होने वाले नुकसान की बात उठाई
तो पूरे सदन में खलबली मच गई। उसके बाद जिस तरह से
एक के बाद एक खुलासे हुए उससे मैं समझ पाई कि बात की
गंभीरता उससे कहीं अधिक है जितना मैंने अनुमान लगाया
था।'' यह घटना भारत में
'जीन कैम्पेन'
की नींव रखे जाने की वजह बनी।
कैम्पेन का उद्देश्य सिर्फ इतना था कि देश के किसान
समझ पाएं कि किस तरह वे व्यवस्था द्वारा छले और ठगे
जा रहे हैं। चूंकि डा. सहाय आनुवांशिक वैज्ञानिक थीं,
इसलिए पेटेन्ट के गोरखधंधों
को समझने में उन्हें सुविधा
हुई। यह वास्तव में प्रसन्नता की बात है कि उनका
व्यक्तिगत प्रयास आज एक अभियान में तब्दील हो चुका
है। बहुत सारे लोग इस बात को सुनकर आश्चर्य करेंगे
कि इस अभियान की शुरुआत पोस्टकार्ड के माधयम से हुई।
डा. सहाय जब भारत लौटीं तो उनका यहां किसी से परिचय
नहीं था। जेपी आन्दोलन की बात सुनी थी उन्होंने।
उन्होंने सुना था कि भारत में यह एक सफल आंदोलन रहा,
बस उन्होंने
इस आंदोलन से जुड़े लोगों की तलाश शुरू की। उनसे
पोस्टकार्ड के माधयम से संपर्क किया। पत्र के माध्यम
से खड़े इस अभियान का सारा श्रेय डा. सहाय बनारस
हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष
मोहन प्रकाश को देती हैं। वे जेपी आंदोलन से लंबे
समय तक जुड़े रहे।
बहरहाल,
बात 'जीन
कैम्पेन' की करें तो यह
किसानों के अधिकार,
बौध्दिक संपदा अधिाकार,
खाद्य एवं आजीविका सुरक्षा,
परंपरागत देशी ज्ञान तथा जैव
विविधाता संरक्षण पर काम कर रही है। जीन कैम्पेन के
नाम से जीन कैम्पेन रांची जिला के कच्चाबरी कर्राध्द,
कुल्ली (बेड़ो),
और हजारीबाग जिलान्तर्गत पारसी
;ईचाकध्द और पन्नाखुंटी
(कटकमससाण्डी)
नामक गांवों में सामुदायिक बीज बैंक का सफल संचालन
कर रही है। एक बीज बैंक की स्थापना बिरसा कृषि
विश्वविद्यालय (रांची)
में की गई है। 'जीन
कैम्पेन' की उपलब्धियों
का जिक्र करते हुए डा. सहाय कहती हैं- 'जीन
कैम्पेन के अभियान का ही असर था कि भारतीय कानून में
किसानों
के अधिकार की बात की गई।'
ईमेल:hishkumaranshu@gmail.com
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