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जनजागरण |
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जारी है आज़ादी की नई लड़ाई |
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संत समीर |
पांच जून-1989,
सम्पूर्ण क्रांति की वर्षगांठ का
यह वह दिन है जब बहुराष्ट्रीय साम्राज्यवाद के खिलाफ
'लोक स्वराज्य अभियान'
के रूप में आजादी बचाओ आंदोलन की
नींव पड़ी। आजादी बचाओ आंदोलन या कहें एक सपना,
जो पूरा हो सकने की उम्मीदों के
साथ देखा गया था। अस्सी के दशक के आखिरी दिनों में
जब यह आंदोलन अपनी आखें खोल रहा था तो इसकी
प्राण-प्रतिष्ठा के यज्ञ में सिर्फ मुट्ठी भर लोग
शामिल थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गणित विभाग और
अन्तरराष्ट्रीय गणित परिषद के पूर्व अधयक्ष प्रो.
बनवारीलाल शर्मा के साथ थोड़े से कार्यकर्ता थे,
पर अदम्य उत्साह से भरे थे। कुछ
वैसा ही उत्साह और जोश जैसे कि आर्कमिडीज को प्लवन
का नियम खोज लेने के बाद रहा होगा। प्रो. ब्रजेश्वर
वर्मा और डा. रघुवंश जैसे साहित्यकारों की मौजूदगी
में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गांधी
भवन में हुई छोटी सी विचारगोष्ठी में आंदोलनकारियों
ने एक हतप्रभ कर देने वाला तथ्य ढूंढ़ निकाला था और
वह था देश की बदस्तूर हो रही लूट का सबसे बड़ा कारण-
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जाल। बहुराष्ट्रीय निगम,
यानि धनी देशों के लिए भारत जैसे
देशों की लूट का सबसे कारगर हथियार। वर्तमान
अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में गैट,
डब्ल्यूटीओ का सारा विस्तार और
उदारीकरण, वैश्वीकरण की
सारी अवधारणाएं
इन्हीं के इर्द-गिर्द व्याख्यायित होती हैं।
उस दौर में बहुराष्ट्रीय शब्द
सामान्य तौर पर जागरूक और बुध्दिजीवी किस्म के लोगों
के लिए भी अनजाना सा था। अर्थशास्त्रियों को भी
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का जाल-बट्टा ज्यादा नहीं समझ
में आता था। लोगों के लिए यह जानना किसी आश्चर्य से
कम न था कि हिन्दुस्तान लीवर नाम की कंपनी के बनाए
लाइफबाय,
सनलाइट जैसे साबुन और किसी भी
वनस्पति घी का पर्याय बन चुके 'डालडा'
विदेशी उत्पाद हैं। पहले तो
लोगों को आर्थिक पेचीदगियां समझ में न आतीं,
पर जब वे समझते कि हम सबेरे जगने
से लेकर रात सोने तक की अपनी दिनचर्या में न जाने
कितनी विदेशी चीजें इस्तेमाल कर डालते हैं और अनजाने
में ही देश का हजारों करोड़ रुपया बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के मार्फत देश की सीमा से पार पहुंचाकर
अपने ही लोगों को कुछ और कंगाली की तरफ धकेल देते
हैं, तो दातों तले उंगली
दबाने वाली नौबत आ जाती और लोग अक्सर आंदोलन के
जुझारू कार्यकर्ता बन जाते हैं। आजादी बचाओ आंदोलन
का कारवां ऐसे ही आगे बढ़ता रहा और
धीरे-धीरे
नौजवानों की एक फौज तैयार होती गई। नि:स्वार्थ और
कठिन परिस्थितियों में भी संघर्ष से न डिगने का
आत्मबल लिए ये नौजवान बची-खुची आजादी को बचाने की
मुहिम से भी आगे बढ़कर एक नई आजादी लाने की बात कर
रहे थे। ऐसी आजादी जिसमें कोई किसी का शोषण नहीं
करेगा। अपनी संस्कृति,
अपने संसाधान और अपने लोगों की
प्रतिभा की बुनियाद पर खड़ा स्वदेशी,
स्वावलंबन व स्वरोजगार आधारित
समाज होगा। आंदोलनकारियों के दिलो-दिमाग में
आश्वस्ति और सहजता में जी रहे एक ऐसे समाज की
परिकल्पना आकार ले रही थी,
जहां आधी
रात को भी कोई स्त्री घर से बाहर निकले,
तो कम से
कम उसे आदमी नाम के प्राणी से डरने की जरूरत न महसूस
हो।
चाहे तो इसे कोई एक खूबसूरत खुशफहमी
करार दे सकता है या
'दिल को खुश रखने को गालिब खयाल
अच्छा है' जैसा कोई जुमला
भी उछाल सकता है, पर इसकी
तार्किक अभिव्यक्ति सात-आठ जनवरी सन्-1992
को महात्मा गांधी
के प्रसिध्द सेवाग्राम आश्रम में हुए सम्मेलन में
जारी
'आजादी बचाओ
आंदोलन की सेवाग्राम घोषणा'
में देखी जा सकती है। यही वह
सम्मेलन था जिसमें 'लोक
स्वराज्य अभियान' को
'आजादी बचाओ आंदोलन'
के राष्ट्रीय ढांचे में बदल गया।
प्रो. बनवारीलाल शर्मा,
प्रो. ठाकुरदास बंग तथा डा. ब्रह्मदत्ता शर्मा इसके
संयोजक बनाए गए। यहीं से जार्ज फर्नांडीज,
सुरेन्द्र मोहन,
रविराय,
स्वामी अग्निवेश
जैसे लोग भी आंदोलन की संचालन समिति में शामिल हुए।
यह बात अलग है कि साल भर बाद आंदोलन
के कार्यकर्ताओं ने तय किया कि संचालन समिति को
राजनीतिक सक्रियता वाले लोगों से दूर रखा जाए और इस
तरह गैर राजनीतिक संयोजन समिति का नए सिरे से गठन
किया गया। सेवाग्राम सम्मेलन में जारी हुई घोषणा कई
मायनों में बाद के तमाम जनसंगठनों के लिए एक आदर्श
घोषणा-पत्र जैसा साबित हुआ।
'सेवाग्राम घोषणा'
के नाम से जाने गए इस नीतिपत्र
में बहुराष्ट्रीय गुलामी के मकड़जाल,
बाजारवाद,
उपनिवेशवाद के विभिन्न रूपों,
सांस्कृतिक संकटों का गंभीर
विश्लेषण तो था ही,
आंदोलन ने इसमें वैकल्पिक व्यवस्था की अपनी सोच की
दिशा को भी रेखांकित किया था। वैकल्पिक व्यवस्था की
बात करते हुए इस घोषणा का निम्न अंश उल्लेखनीय है-''बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के खिलाफ मुक्ति संग्राम का एक अनिवार्य
हिस्सा है- उस वैकल्पिक विकास की रणनीति और दिशा का
निधर्ाारण, जो
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वर्चस्व से मुक्त होगा।
हमें ऐसा विकास चाहिए जो देशवासियों की मूलभूत
आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक हो सके। उसके साथ
ही, वह राष्ट्र को अपने
पावों पर खड़ा होने में सक्षम बना सके। अपने पावों पर
खड़ा राष्ट्र किसी के डर-दबाव या धौंस में नहीं आ
सकता। सच्चे विकास के रास्ते पर वही राष्ट्र चल सकता
है, जो अपनी नीतियों और
प्राथमिकताओं को अपनी आवश्यकताओं,
आकांक्षाओं एवं
संसाधानों के अनुरूप गढ़ सकता हो।
उधार
एवं ठेके पर विकास की नींव नहीं रखी जा सकती। सच्चे
विकास की किसी भी परिकल्पना में हर व्यक्ति को ईमान
की रोटी और इज्जत की जिन्दगी की गारंटी होती है। कोई
राष्ट्र विकसित है-इसका पैमाना यह कतई नहीं होना
चाहिए कि वह ढेर सारी अनाप-शनाप चीजों का फालतू
उत्पादन कर रहा है,
भले ही उसके नागरिकों की
बुनियादी जरूरतें न पूरी हो रही हों और वह दुनिया भर
के बाजारों में विज्ञापन,
झूठ और छल-छद्म के जरिए अपना माल खपा रहा हो और उसकी
बड़ी-बड़ी कंपनियों का अन्तरराष्ट्रीय कारोबार तमाम
देशों के सकल राष्ट्रीय उत्पादों से ज्यादा हो।
दुनिया के मुट्ठी भर राष्ट्रों के विकास को चलाए
रखने के लिए तमाम आन्तरिक संसाधानों का दोहन हो रहा
हो, वहां से संपदा की लूट
जारी हो, वहां पर पिट्ठू
सरकारें बिठा दी गई हों,
जो अपनी घरेलू
अर्थव्यवस्थाओं के दरवाजे विदेशी बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के लिए एक-एक करके खोलती जा रही हों।
ऐसा विकास विकास नहीं है,
बल्कि विकास के नाम पर विनाश है।
'वैश्वीकरण'
या 'उदारीकरण'
औपनिवेशीकरण के ही दूसरे नाम
हैं। स्वावलम्बन के लिए विकास की शुरुआत स्वदेशी से
होनी चाहिए। आत्मनिर्भरता एक व्यापक अवधारणा
है। इसकी सिध्दि विदेश व्यापार से नहीं की जा सकती
है। निर्यात संवर्धान या आयात प्रतिस्थापन से
आत्मनिर्भरता का कोई सरोकार नहीं। सहायता या अनुदान
स्वावलम्बी विकास के लिए विष सदृश हैं,
क्योंकि वे अपने साथ गुलामी की
ओर धकेलने वाली शर्तें भी ले आती हैं।''
स्पष्टत: सेवाग्राम घोषणा में आदर्श
का यूटोपिया नहीं बल्कि जमीनी व्यावहारिकता है।
दरअसल,
इस ऊंचे आदर्श और उदात्ता
भावनाओं के पीछे की सबसे बड़ी वजह थी,
वह ईमानदार पारदर्शिता,
जो आंदोलन की नींव पड़ने के साथ
ही विकसित होने लगी थी। कोई भी कार्यक्रम करना हो,
नए से नए कार्यकर्ता के सुझावों
की भी बराबर की अहमियत थी। फैसले मिल-बैठकर लिए जाते
थे। आय-व्यय में कोई गोपनीयता कभी नहीं रखी गई। पैसा
कहां से आया कहां गया, यह
सबके सामने खुला हुआ था। बैठकों में कोई भी
कार्यकर्ता कोई भी विरोधी
विचार या किसी के भी प्रति अपनी नाराजगी खुले मन से
रख सकता था। बैठक शुरू होने का समय तो नियत हो सकता
था,
पर खत्म
होने को लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता था। कभी-कभी शाम
को शुरू हुई बैठकें रात बारह या एक बजे जाकर खत्म
होतीं। निष्कर्ष अधूरा रहे तो कई किस्तों में भी
विवाद-संवाद चलते रह सकते थे।
ऐसा था आजादी बचाओ आंदोलन के
इलाहाबाद स्थित राष्ट्रीय कार्यालय का नब्बे के दशक
तक का माहौल। यह कार्यकर्ताओं की तपश्चर्या का
प्रतिफल ही है कि अभिभावक अपने बच्चों को आंदोलन के
कार्यक्रमों में शामिल होने की आज भी खुशी-खुशी
इजाजत दे देते हैं। लड़कियों को भी आंदोलन के काम से
रात-बिरात रुकना पड़ जाए तो माता-पिता के लिए किसी
शंका-कुशंका की बात कभी नहीं रही। जहां तक सन्-2000
तक मेरे सामने की बात है तो तब
आंदोलन की साप्ताहिक बैठकों में पचास-सौ कार्यकर्ता
बिना विशेष आमन्त्रण-निमंत्रण के भी जुट ही जाते थे।
सेमीनार वगैरह में तो गांधी
भवन के सभामण्डप के बाहर भी श्रोताओं
को खड़े रहने की नौबत अक्सर आ जाती थी।
इस पूरे माहौल का असर था कि कोई विरोधी
भी एक बार आंदोलन के कार्यालय में पहुंच जाए तो
प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। कई आंदोलन विरोधी
लोग इसी तरह समर्थक बने। आजादी बचाओ आंदोलन अगर
देश-समाज के लिए एक नई संभावना बनकर उभरना शुरू हुआ
तो इसके पीछे कम से कम सौ-सवा सौ ऐसे नौजवानों की
मेहनत लगी है जिनका कम ही जिक्र होता है। प्रो.
बनवारी लाल शर्मा,
मनोज त्यागी,
डा. कृष्ण स्वरूप आनन्दी,
रामधीरज,
अभय प्रताप,
डा. ए. के. अरुण,
प्रो. विष्णु प्रकाश श्रीवास्तव,
श्रीमती मधु भटनागर,
रूपेश कुमार,
शिराज केसर,
राजीव दीक्षित,
प्रदीप दीक्षित और मेरे जैसे
सिर्फ कुछ लोगों का ही नाम प्राय: लोग आंदोलन के
फराने मुख्य कर्ताधर्ताओं के रूप में जानते रहे हैं,
परन्तु युवक सिंह,
अमरेश ओझा,
सुनील-कर्नाटक,
बिहारीजी चन्द,
प्रेमचन्द वर्मा,
रामाज्ञा मौर्य,
अविनाश मिश्र,
सुजीत कुमार,
अमर सिंह,
ओमनाथ,
सतीश तिवारी,
अभिमन्यु आदि-आदि नामों की लम्बी
फेहरिश्त है जिनके योगदान को भुला देना कृतघ्नता
होगी। इन नामों को आगे बढ़ाया जाए तो सूची सैकड़ा पार
पहुंचेगी। ये शुरुआती दिनों के ऐसे योध्दा हैं जो जब
तक आंदोलन में रहे, भूत
की तरह दिन-रात काम में लगे रहे। हालांकि इनमें से
कुछ ही नाम रह गए हैं जो मौजूदा परिदृश्य में
कभी-कभार दिखाई देते हैं,
अन्यथा अधिाकतर ने अपना रास्ता बदल लिया या उन्हें
मजबूरन अपनी अलग राह चुननी पड़ी। कई सारे ऊर्जावान
युवक थे जो आंदोलन के लिए पूरा जीवन समर्पित करने को
तैयार थे। नौकरी की मानसिकता और कैरियर की चिन्ता से
वे ख़ुद को बहुत हद तक उबार चुके थे। दरकार थी तो
सिर्फ दो जून के रोटी-दाल के इन्तजाम की। लेकिन
दुर्भाग्य कि हमारे लिए कार्यकर्ताओं की आजीविका का
सवाल कभी प्राथमिकता न बन सका और इस तरह तमाम
क्रांतिवीर अपनी आजीविका के समाधन
तलाशते हुए नेपथ्य में कहीं खो गए।
आजादी बचाओ आंदोलन के इतिहास में
सन्-1998-99
तक का समय आशा,
उत्साह और सफलताओं के लिए याद
किया जाएगा। उस दौर तक नैराश्य,
ठहराव या बिखराव की कोई स्थिति
नहीं दिखाई देती। नैराश्य तो अब भी नहीं है,
पर ठहराव और बिखराव की कुछ
स्थितियों से हम इनकार नहीं कर सकते। बहरहाल,
एक दुरूह मुद्दे को,
जो आमजन की समस्याओं से सीधो
जुड़ा हुआ नहीं दिखता,
सिर्फ कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के
केन्द्र में ला देना कोई कम बड़ी बात नहीं है। यह अलग
सवाल है कि अपने काम का कितना श्रेय आंदोलन ले पाया
और कितना दूसरी संस्थाएं या राजनीतिक दल ले गए?
बात यह भी थी कि उस दौर तक के
अधिाकांश कार्यकर्ता प्राय: भगत सिंह,
सुभाष चन्द्र बोस,
महात्मा गांधी,
बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों की
मानसिकता में जी रहे थे,
इसलिए श्रेय लेने की किसी भी दौड़ या तिकड़मबाजी को भी
वे हेय ही मानकर चलते थे। अपनी इसी सोच के चलते
आजादी बचाओ आंदोलन ने जिस भी संगठन में संभावना देखी,
बगैर नफा-नुकसान सोचे,
उसकी हर तरह से मदद की। शुरुआती
दौर में आंदोलनकर्मी जितने संस्था-संगठनों और
राजनीतिक दलों तक जा सकते थे,
अपना विचार लेकर गए। दक्षिणपंथ
और वामपंथ का कोई भेद नहीं रखा गया। मन्तव्य यही था
कि यदि राजनीतिक पार्टियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों
द्वारा की जा रही लूट को समझने लगें तो देश के आम
आदमी तक यह बात बहुत जल्दी पहुंच सकती है। बात ठीक
भी निकली।
धीरे-धीरे
देश
के जनसंगठन तो इस मुद्दे की गंभीरता समझने ही लगे।
कांग्रेस को छोड़कर अधिाकतर पार्टियों ने भी इसे
चुनावी मुद्दा बनाना शुरू कर दिया। मुलायम सिंह यादव,
लालू प्रसाद,
वामपंथी संगठन,
जार्ज फर्नांडीज वगैरह ने तो
काफी जोर-शोर से आवाज उठानी शुरू कर दी। समाजवादी
विचारधारा
वाले जार्ज,
रविराय,
सुरेन्द्र मोहन जैसे लोग तो
आजादी बचाओ आंदोलन की संचालन समिति में भी शामिल हो
गए। लेकिन इन सबसे भी पहले धयान दिया था विद्यार्थी
परिषद और आर.एस.एस ने। इसी के परिणामस्वरूप 'स्वदेशी
जागरण मंच'
अस्तित्व में आया।
अपने सपनों को आमजन से एकाकार करने
के उद्देश्य से किया गया आंदोलन का पहला प्रभावी
आयोजन
19 अप्रैल-1990
की चिलचिलाती धूप में इलाहाबाद
की गलियों में निकाली गई डेढ़ हजार से ज्यादा
नौजवानों की साइकिल यात्र को माना जाएगा। इस यात्र
ने स्थानीय जनता के साथ-साथ विभिन्न जनसंगठनों और
राजनीतिक दलों का भी धयान इस नई गुलामी के खतरों की
ओर खींचा। एक अनजाने,
अबूझ और अलहदा से मुद्दे पर 'स्वदेशी
अपनाओ-विदशी भगाओ', 'जागो
फिर एक बार, विदेशी का
बहिष्कार', 'बाटा,
लिप्टन,
पेप्सी कोला-सब पहने हैं खूनी
चोला', 'बहुराष्ट्रीय
कंपनियों के खिलाफ लड़ाई-आजादी की नई लड़ाई'
जैसे नारे
गुंजाते गली-गली घूमते नौजवानों की इतनी बड़ी संख्या
किसी गैर राजनीतिक आयोजन के रूप में देखना इलाहाबाद
जैसे नगर में उस दौर के लिए किसी आश्चर्य और अजूबे
से कम नहीं था।
इस आयोजन ने इलाहाबाद के स्तर पर
आंदोलन की पैठ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके बाद तो धरने-प्रदर्शन,
बहिष्कार,
सत्याग्रह,
विदशी सामानों की होली आदि का
दौर शुरू हुआ तो उसका लंबा इतिहास है। आजादी बचाओ
आंदोलन के स्थानीय असर का अंदाजा इससे भी लगाया जा
सकता है कि शुरुआती दौर में पेप्सी जैसी ताकतवर
कंपनी भी इलाहाबाद में कई बार की कोशिश के बावजूद
प्रवेश कर पाने में सफल नहीं हो सकी थी। उसने
रातों-रात गुपचुप तरीके से तब अपनी एजेंसी का
उद्धाटन किया,
जब उसे एक दिन यह पता चला कि आंदोलन
के ज्यादातर प्रमुख कार्यकर्ता जनचेतना जगाने के
उद्देश्य से कुछ समय के लिए नगर से बाहर गए हुए हैं।
बहरहाल,
नब्बे के दशक का पूर्वार्धा
आजादी बचाओ के लिए खास है। इस दौर में उसने अपनी
जन्मभूमि में विदेशी सामानों की बिक्री में स्पष्ट
रूप से कमी लाने में सफलता पाई। शहर के कुछ इलाकों
में यहा तक असर था कि दुकानों पर लोग गर्व के साथ
स्वदेशी की मांग करते थे और विदेशी के मुरीदों को
अपने अगल-बगल के प्रति चौकन्ना रहना पड़ता था कि कहीं
कोई स्वदेशीभक्त न देख ले। शुरुआती घटनाओं में
11 जनवरी-1992
का दिन भी आंदोलन के इतिहास में
महत्तवपूर्ण है जबकि इलाहाबाद के पीडी टंडन पार्क
में नगर और पास-पड़ोस के स्कूल-कालेजों के दस हजार से
ज्यादा छात्र-छात्रओं ने 'स्वदेशी
संकल्प रैली'
निकाली। राष्ट्रीय स्तर पर भी
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुद्दे पर यह तब तक की
सबसे बड़ी रैली थी।
इसी दौर में आंदोलन द्वारा शुरू किया
गया सालाना आयोजन
'तरुणोन्मेष'
एक अलग किस्म का सफल प्रयोग था।
यह प्रयोग अभी तक जारी है। इसके तहत लगभग
60-70 विद्यालयों के
विद्यार्थियों के बीच हर साल वाद-विवाद,
संगीत,
पोस्टर निर्माण,
निबंध लेखन,
नेतृत्व क्षमता आदि पर आधारित
प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती रही हैं,
जिनसे युवा पीढ़ी में
राष्ट्रनिर्माण के प्रति सकारात्मक चेतना जगाने में
सहायता मिली। बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद के खिलाफ
चेतना जगाने में आंदोलन की फीचर एजेंसी 'स्वदेशी
संवाद सेवा- संपादक-संत समीर'
के महत्व को भी नहीं भुलाया जा
सकता। इस तरह के किसी मुद्दे पर विविधा प्रकार की
प्रकाशन सामग्री उपलब्धा कराने वाली यह अपनी तरह की
अकेली 'संवाद सेवा'
थी,
जिसकी प्रतिष्ठा इतनी बन चुकी थी कि स्थानीय और
प्रादेशिक क्या,
राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाएं भी अपने संपादकीय पृष्ठों
पर इसके आलेख प्रकाशित करती थीं। वर्तमान में यह
पीफलस न्यूज नेटवर्क 'पीएनएन'
के नए रूप में दिल्ली से संचालित
किया जा रहा है। मीडिया आधारित
'लेखन एवं
पत्रकारिता कार्यशाला' भी
आंदोलन का सामान्यत: सालाना आयोजन जैसा ही है,
जो अभी तक
जारी है।
इसी तरह इलाहाबाद में कुख्यात
बहुराष्ट्रीय कंपनी शेल को न आने देना,
यहां से अश्लील पत्र-पत्रिकाओं
का प्रकाशन बंद करवाना,
अलवर 'राजस्थान'
में शराब फैक्ट्रियों के खिलाफ
सफल संघर्ष, मारीशस के
रास्ते बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा देश के
90 हजार करोड़ रुपये की हर साल हो
रही लूट को अदालत के जरिए बंद कराना,
चार लाख विद्यार्थियों की तीन सौ
और दस लाख विद्यार्थियों की हजार किलोमीटर की अपने
तरह की अनूठी वृत्ताकार मानव शृंखलाएं बनाना तथा
'स्वानंद'
नाम से ट्रेडमार्क रजिस्टर कराकर
देश में उच्च गुणवत्ताा की स्वदेशी वस्तुओं का
निर्माण और विपणन प्रणाली की दिशा में काम करना,
स्वराज विद्यापीठ नाम से मुक्त
विश्वविद्यालय की स्थापना आदि कुछ ऐसे पड़ाव हैं,
जिन्हें
आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धिायों में गिना जा सकता
है।
संपर्क:
ए-139/2,
शिव मंदिर मार्ग,
मंडावली,
फाजलपुर,
दिल्ली-92 |