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 जनवरी,  2008

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एक मिशाल

  जलाने नहीं बचाने की जुगत   

गुंजन कुमार

आज से पांच साल पहले इग्नू में हर महीने लगभग 14 क्विंटल रद्दी कागज जमा होता था। जिसे इकट्ठा करके जला दिया जाता था। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये कागज केवल सूचना-पट्ट से हटाए गए और कूड़ेदान में फेंके गए कागज के टुकड़े थे। लेकिन अब डा. एसएस बिष्ट इन कागजों को जमा कर के इनका पुन: उपयोग कर रहे हैं। अभी भी देश के सभी विश्वविद्यालयों- महाविद्यालयों एवं अन्य दफ्तरों में कागजों का अत्यधिक इस्तेमाल होता है। रोजमर्रा के कामों में उपयोग किए गए इन कागजों को जला दिया जाता है। जबकि होना यह चाहिए कि इसे रिसाइकिल कर पुन: कागज बनाया जाए। डा. एस.एस. बिष्ट ने इन कागजों को पुन: उपयोग करने के लिये अपने सीनियर अधिकारियों को पत्र भी लिखे, लेकिन वहां से कोई संतोषप्रद जवाब नहीं मिला। तब उन्होंने अपने विभाग में ही इसका पुन: उपयोग करना शुरू कर दिया। अपने विभाग का चीफ होने के कारण उन्हें यहां कोई परेशानी नहीं हुई।

डा. बिष्ट अब सूचना-पट्ट से उतारे गए सूचना पत्र के दूसरी तरफ अपने विभाग कर्मियों की उपस्थिति लगाते हैं। इनके विभाग में लगभग 150 सुरक्षा गार्डों के अलावा अन्य कर्मचारी भी हैं। अटेंडेंस रजिस्टर के साथ वे विभागीय फाइल में भी इन्हीं कागजों का उपयोग करते हैं। इससे इग्नू को अपने सुरक्षा विभाग के लिए कागज नहीं खरीदना पड़ रहा है और विश्वविद्यालय को सालाना हजारों की बचत होती है। यही नहीं डा. बिष्ट ने अपने परिसर में कागज जलाने पर रोक लगा दी है और इन कागजों को कबाड़ी को बेचा जाने लगा है। प्रत्येक माह लगभग 14 क्विंटल कागज से इग्नू को लगभग 6 हजार मासिक आय होने लगी है। 2001 से शुरू की गई इस पध्दति से इग्नू को अभी तक तकरीबन छह लाख की आय प्राप्त हुई है। डा. बिष्ट का मानना है कि यदि इग्नू का प्रत्येक विभाग इस पध्दति को अपना ले तो विश्वविद्यालय को हर तरह से लाभ होगा। कागज पुनर्प्रयोग अभियान की शुरुआत करने पर डा.  बिष्ट का कहना है, 'गार्ड जब कागजों को जलाने के लिये इकट्ठा करता था तो मैं उस ढेर को उलट-पुलट कर देखता था। कई बार बहुत ही उपयोगी कागजात भी हाथ लगे जो मैंने संबंधित विभाग को सौंप दिए। उसी समय मुझे अपने पूर्वानुभव को यहां उपयोग में लाने की सूझी।' डा. बिष्ट मूलत: उत्ताराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के रहने वाले हैं। ये इग्नू, दिल्ली में 1990 से सुरक्षा अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। इससे पहले ये भारतीय सेना में शार्ट सर्विस कमीशन के तहत काम कर चुके हैं। अपने सामान का अधिाक से अधिाक इस्तेमाल करना इन्होंने फौज में ही सीखा है। इनका वही अनुभव यहां भी काम आया। उसी के कारण डा. बिष्ट अपने विभाग में इस तरह की पहल कर के विश्वविद्यालय को हजारों की बचत करवाने लगे। पूर्णरूपेण उपयोग किए गए कागज कबाड़ी को बेचकर विश्वविद्यालय के लिए वे आय का सृजन भी कर रहें हैं।

डा. बिष्ट का मानना है कि यदि यहां इन पेपरों को रिसाइकिलिंग करने की मशीन लगा दी जाए तो आय में और वृध्दि हो सकती है। कागजों का पुन: उपयोग शायद ही किसी सरकारी दफतर में होता है।  सभी जगहों पर इन पेपरों को जलाने का रिवाज है। जिससे पर्यावरण के अलावा संबंधित कार्यालय को आर्थिक नुकसान भी होता है। ऐसे में डा. बिष्ट की यह पहल दूसरों के लिए उदाहरण बन गई है।

ईमेल: martgunjan@gmail.com

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन