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 जनवरी,  2008

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जनजागरण

जब जनता को 'सूचना' मिलती है

अमित भट्टाचार्य

सूचना के अधिकार के द्वारा प्रशासन पर जनता का अंकुश स्थापित करने को लेकर श्री अरविन्द केजरीवाल के योगदान से आज पूरा देश परिचित है। उन्होंने 'सूचना के अधिकार' रूपी शस्त्र को पहली बार दिल्ली की दो स्लम बस्तियों: सुन्दर नगरी और सीमापुरी में प्रयोग किया। अगस्त, 2002 में उनकी संस्था परिवर्तन के कार्यकर्ताओं ने इन दो बस्तियों में दिल्ली महानगर निगम द्वारा करवाए गए लोकनिर्माण कार्यों की जानकारी इकट्ठी की।

अगले कुछ महीनों में परिवर्तन के कार्यकर्ताओं ने इन कालोनियों में नुक्कड़ सभाओं का आयोजन करके लोगों को उन कार्यों की जानकारी दी, जिन्हें एम.सी.डी. के अनुसार उनके इलाके में करवाया गया था। प्रत्येक ऐसे कार्यों पर किए गए खर्च का विवरण भी जनता को बताया गया। परिवर्तन के कार्यकर्ताओं द्वारा दी गई इन जानकारियों से वहां की जनता अवाक रह गई। कालोनी के लोग कई सालो से छोटे-छोटे कामों के लिए नेताओं और अफसरों के आगे-पीछे घूम रहे थे। जब उन्हें पता चला कि वे काम कागज पर पहले ही हो चुके हैं, तो उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। कई लोग जो विभिन्न राजनीतिक दलों के कट्टर समर्थक थे, उन्होने महसूस किया कि राजनीतिक दलों एवं राजनीतिज्ञों के प्रति उनका समर्पण बेमतलब था। परिवर्तन द्वारा दी गई जानकारी से पूरी कालोनी में जोरदार चर्चा छिड़ गई। कागजी कामों और उनके लिए हुए वास्तविक भुगतान से लोग स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। जब लोगों ने एक ऐसे मंच की मांग की जहां वे इस सब के लिए जिम्मेदार लोगों से हिसाब मांग सकें, तब जनता की भावनाओं को देखते हुए परिवर्तन ने कुछ अन्य सहयोगी संगठनों के साथ मिलकर 14 दिसंबर, 2002 को सुंदरनगरी में जनसुनवाई के कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में लगभग 1000 स्थानीय निवासियों के साथ-साथ स्थानीय विधायक, संबंधित कार्यकारी अभियंता, पत्रकारों एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया।

स्थानीय विधायक के आदमियों ने जनसुनवाई की कार्रवाई को कई बार रोकने की कोशिश की। लेकिन जनसुनवाई की कार्यवाही को लोगों का इतना जबरदस्त समर्थन प्राप्त था कि वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके। अपनी एक न चलती देख विधायक और उसके आदमी  अंतत: जनसुनवाई को बीच में ही छोड़कर चले गए। इसके बावजूद जनसुनवाई का कार्यक्रम चलता रहा। कालोनी के निवासियों के साथ परिवर्तन के कार्यकर्ताओं ने विभिन्न कार्यों को खुद जाकर देखा और जांचा परखा। इस सबसे कागजों में किए गए दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर स्पष्ट हो गया।

कुल मिलाकर इस जनसुनवाई में 68 ठेकों के बारे में खोजबीन और चर्चा की गई। इन 68 ठेकों के अंतर्गत एम.सी.डी. द्वारा कुल 1.3 करोड़ का भुगतान किया गया, परंतु काम केवल 33 लाख का ही हुआ था। कुछ किए गए कार्यों की गुणवत्ता घटिया थी, जबकि कई ऐसे काम थे, जिन्हें कागजों में ही करके भुगतान प्राप्त कर लिया गया था। इस जनसुनवाई से एक बात स्पष्ट हो गई कि सार्वजनिक कार्यों के लिए पैसे की कोई कमी नहीं है। अगर इस पैसे के खर्च पर जनता अपनी नजर रखे और अपने प्रतिनिधियों से हिसाब मांगे तो सार्वजनिक कार्यों की गुणवत्ता और मात्र दोनों में ही भारी वृध्दि हो सकती है।

जनसुनवाई की जांच के निष्कर्ष:

एम.सी.डी. द्वारा आबंटित ठेकों और जमीनी हकीकत की जांच करने से बड़े चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। इनमें से कुछ का विवरण नीचे दिया गया है:

जब कभी कालोनी की किसी गली में कोई सड़क बनाई जाती है, उस समय किनारे की नालियों को तोड़कर फिर से बनाए जाने का प्रावधान होता है। किंतु ठेकेदार वास्तव में नालियों पर प्राय: कोई काम नहीं करते, और अगर बहुत हुआ तो पहले से बनी नालियों को एक ईंट ऊंचा कर देते हैं। इस तरह के 35 मामलों की जांच करने पर पता चला कि एम.सी.डी. ने सभी 35 मामलों में नई नालियों के निर्माण के लिए भुगतान किया है, जबकि किसी भी मामले में नई नाली नहीं बनवाई गई। 19 मामलों में नालियों की ऊंचाई 1 ईंट ऊपर कर दी गई थी, जबकि शेष 16 मामलों में यह भी नहीं किया गया था।

बिजली की मोटरों के साथ 29 हैंडपंप लगाने के लिए 10 ठेके दिए गए। परंतु स्थानीय निवासियों से पूछताछ करने पर पता चला कि वास्तव में केवल 14 हैंडपंप ही लगाए गए हैं। शेष हैंडपंप लगाए ही नहीं गए। बिजली की मोटर किसी एक भी हैंडपंप में नहीं लगाई गई।

जब कभी किसी गली की सड़क का निर्माण किया जाता है तो किनारे की नालियों पर लोहे की जालियां लगाने का भी प्रावधान होता है। जांच किए गए ठेकों में लोहे की 253 जालियों के लिए पैसों का भुगतान किया गया था, जबकि वास्तव में केवल 30 जालियां ही लगाई गई थीं।

ठेके की शर्तों के अनुसार गली की सड़क में वंफर्कीट की परत 10 से.मी. मोटी होनी चाहिए, जबकि अधिकतर मामलों में यह मोटाई मात्र 5 से.मी. ही थी।

कुछ ऐसी छोटी सड़वफों के निर्माणकार्य का पता चला, जिनका अस्तित्व केवल कागज पर ही था। जमीन पर उनका नामोनिशान तक नहीं था।

दो मामलों में यह बात सामने आई कि एक ही काम के लिए एम.सी.डी. द्वारा दो बार भुगतान किया गया। अर्थात काम तो एक बार किया गया परंतु बिल दो बार प्रस्तुत किए गए और उन पर भुगतान भी किया गया।

तारकोल मिश्रित बारीक गिट्टी डालने के पहले सड़कों के नीचे बड़ी एवं मंझोली गिट्टियों की दो परतें बिछाई जानी चाहिए। ऐसे 8 ठेकों की जांच से पता चला कि 6 मामलों में गिट्टी की एक परत बिछाई गई थी, जबकि दो मामलों में गिट्टी की एक भी परत नहीं बिछाई गई। सड़क निर्माण में लाल बजरी की एक परत बिछाने का भी प्रावधान है, परंतु जांच से पता चला कि किसी भी मामले में ऐसा नहीं किया गया।

स्थानीय जनता पर प्रभाव:

जनसुनवाई के परिणाम स्वरूप सुंदर नगरी और सीमाफरी की जनता के मनोबल में आश्चर्यजनक वृध्दि हुई। पहली बार उन्हें अनुभव हुआ कि सरकार को इस तरह सरेआम, लोगों के सामने, साफ-साफ तौर पर अपने किए के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। जनसुनवाई के पहले जनता के बीच कार्यकारी अभियंता जैसे बड़े सरकारी अधिकारियों एवं विधायक जैसे जनप्रतिनिधियों को लेकर एक हौवा बना रहता था। लेकिन जनसुनवाई के बाद यह हौआ टूट गया।

जनसुनवाई के तुरंत बाद सुंदरनगरी और सीमाफरी के प्रत्येक ब्लाक में मुहल्ला सुधार समितियां बनाई गईं। इन समितियों में प्रत्येक गली के प्रतिनिधि शामिल थे। इन समितियों ने अपने क्षेत्र में हो रहे सार्वजनिक कार्यों का ब्यौरा रखना शुरू कर दिया। जब तक उन्हें संबंधित ठेके  की सभी शर्त एवं प्रावधान नहीं दिखाए  गए, उन्होंने काम ही शुरू नहीं होने दिया। जनता की इस जागरूकता के बड़े अद्भुत परिणाम निकले। कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:

सुंदरनगरी के एफ-1 ब्लाक में एक सड़क फिर से बनाई जानी थी। इस पर जनवरी, 2003 में कार्य शुरू हुआ। स्थानीय जनता ने काम शुरू करने के पहले मांग की कि जब तक उन्हें ठेवफे की सभी शर्तों की जानकारी नहीं दी जाती, वे काम नहीं होने देंगे। अगले ही दिन सहायक इंजीनियर ने आकर लोगों को ठेके की विषयवस्तु के बारे में जानकारी दी। उसने बताया कि इस सड़क के निर्माण में 58 ड्रम तारकोल, दो ट्रक लाल बजरी और दो ट्रक गिट्टी लगाई जानी है। तत्पश्चात स्थानीय जनता ने यह सुनिश्चित किया कि इन सामग्रियों का सड़क निर्माण में वास्तव में उपयोग हो। परिणाम स्वरूप इलाके में जो सड़क बनी, वह आस-पास की अन्य सड़कों से कई गुना बेहतर थी।

सीमाफरी के ई-57 ब्लाक में लोगों ने जब देखा कि ठेके के प्रावधानों के विपरीत गली का रास्ता बनाने में लाल बजरी की जगह साधारण रेती का इस्तेमाल किया जा रहा है और सीमेन्ट तथा रेती का अनुपात 1: 2 की बजाय 1: 20 रखा जा रहा है, तो लोगों ने तुरंत काम रोक दिया। ठेकेदार और सहायक इंजीनियर को लोगों ने कार्यस्थल पर बुलाया और पूछताछ की। दोनों ने बेईमानी पकड़े जाने पर लोगों से माफी मांगी और निर्माण्ा सामग्री को बदलने के लिए तैयार हो गए। परंतु लोग मामले को इस तरह रफा-दफा करने के लिए तैयार नहीं थे। लगभग 30 लोगों ने जाकर कार्यकारी इंजीनियर से बात की और मांग की कि संबंधित सहायक इंजीनियर को निलंबित किया जाए। कार्यकारी इंजीनियर ने लोगों से माफी मांगी और प्रार्थना की कि सहायक इंजीनियर को माफ कर दिया जाए। लेकिन लोग टस से मस नहीं हुए। इस पर सहायक इंजीनियर लोगों के पैरों पर गिर पड़ा। इस स्थिति में लोगों का दिल पसीज गया। फिर भी उन्होंने कार्यकारी इंजीनियर से मांग की कि सहायक इंजीनियर को तुरंत स्थानांतरित कर दिया जाए और निर्माण कार्य किसी अन्य ठेकेदार के द्वारा ठेके के प्रावधानों के अनुरूप करवाया जाए। कार्यकारी इंजीनियर ने सारी मांगें तुरंत मान ली। सहायक इंजीनियर को स्थानांतरित कर दिया गया तथा निर्माण कार्य ठेके की शर्तों के अनुरूप जनता की निगरानी में पूरा किया गया।

सुन्दरनगरी के ओ ब्लाक में गली की एक सड़क का निर्माण कार्य फरवरी, 2003 में शुरू हुआ। इस काम के बारे में जानकारी प्राप्त करने पर लोगों को पता चला कि कुछ महीने बाद ही गली में सीवर डालने का काम शुरू होने वाला है और जब सीवर का काम शुरू होगा तो सड़क को तोड़ दिया जाएगा। सार्वजनिक धान के इस दुरुपयोग के पीछे की मंशा को समझते हुए लोगों ने सड़क बनाने का काम रोक दिया और मांग की कि सड़क बनाने का काम सीवर डालने का बाद ही शुरू किया जाए। प्रशासन को जनता की यह मांग भी माननी पड़ी।

राजनेताओं, सरकारी अधिकारियों एवं ठेकेदारों की प्रतिर्किया:

जनसुनवाई के प्रति स्थानीय राजनेताओं एवं सरकारी अधिकारियों का रवैया शुरू में असहयोगात्मक ही रहा, परंतु जब उन्हें लगा कि उनका असहयोग उनके लिए हानिकारक सिध्द होगा तो उन्होंने सहयोग करना शुरू कर दिया। स्थानीय विधायक पहली जनसुनवाई में आने के लिए ही तैयार नहीं था। परिवर्तन के कार्यकर्ताओं द्वारा विशेष आग्रह किए जाने पर वह आया तो जरूर, लेकिन अपने 40 आदमियों के साथ। ठेके के प्रावधानों को सार्वजानिक न करने पर जब स्थानीय लोगों ने सभी कार्यों को रोकना आरंभ किया तो संबंधित इंजीनियरों में हड़कंप मच गया। जनसुनवाई के दौरान बौखलाहट में कार्यकारी इंजीनियर ने कई बार आरोप लगाया कि परिवर्तन के लोग उसके विभाग को अनावश्यक ही बदनाम कर रहे हैं। लेकिन आखिर में सभी को जनता के दबाव के आगे झुकना पड़ा। अब सुंदर नगरी और सीमाफरी में होने वाले सार्वजानिक कार्यों में धखाधड़ी कर पाना एम.सी.डी. के इंजीनियरों के लिए असंभव हो गया है। प्रारंभ में स्थानीय जनता की जागरूकता को देखते हुए ठेकेदारों ने सुंदरनगरी एवं सीमाफरी में ठेके लेना बंद कर दिया। लगभग एक महीने तक पूरे इलाके में कोई काम नहीं हुआ। स्थानीय जनता भी ठेवफदारों की ब्लैकमेलिंग के आगे झुकने को तैयार नहीं थी। लोगों ने साफ कर दिया कि यदि ठेकेदार काम के नाम पर सरकारी पैसे का गबन करना चाहते हैं, तो बेहतर है कि वे उनके इलाके में काम न करें। अंतत: ठेकेदारों को झुकना पड़ा और उन्होंने इलाके में काम फिर से शुरू किया। नई परिस्थितियों में नेताओं और इंजीनियरों का शिकंजा उन पर काफी हद तक ढीला हो चुका है। अनुचित मुनाफा कमाकर उसे नेताओं और अफसरों में बांटने की विवशता से उन्हें मुक्ति मिल चुकी है।

दोषी व्यक्तियों के विरुध्द कानूनी कार्यवाही:

'परिवर्तन' ने जनसुनवाई की विस्तृत रिपोर्ट दिल्ली सरकार को भेजी और दोषी व्यक्तियों के विरुध्द कानूनी कार्यवाही करने की मांग की। सरकार की ओर से कोई कार्यवाही नहीं किए जाने पर परिवर्तन ने मई, 2004 में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली फलिस को निर्देश दिया कि वह पूरे मामले की जांच कर अदालत में 6 महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश करे। वर्तमान समय में दोषी अधिकारियों के विरुध्द न्यायिक प्रर्किया जारी है। इस न्यायिक प्रर्किया का कोई परिणाम निकले या न निकले परंतु जनसुनवाई के माधयम से नेताओं, नौकरशाहों एवं ठेकेदारों में जनता का जो भय स्थापित हुआ है, वह अपने आप में अत्यंत प्रभावी है। पूरे देश की जनता यदि सीमाफरी और सुंदरनगरी में 'परिवर्तन' के प्रयास को दोहरा दे तो भारत का कायाकल्प होने में तनिक भी देर नहीं लगेगी।

 संपर्क : 'परिवर्तन' जी-3, सुंदरनगरी, नंदनगरी एक्सटेंशन, दिल्ली-110093

 राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन